गंड योग....
(नोटः- इस लेख के सभी कलाकार वास्तविक हैं... पहचान छुपाने के लिए उनके नामों थोड़ा सा परिवर्तन किया गया है... यदि किसी के जीवन से या चरित्र से घटनाएं मेल खाती हों तो इसे संयोग न समझें यह लेखक का जान बूझ कर किया गया दुस्साहस है ... इसके लिए आप जो चाहें उखाड़े ... लेखक खोल कर तैयार है... ज्यादा दिमांग नहीं लगाते ... लेख ही खोल रहा हूं ... कुछ और नहीं गंदे लोग गंदी सोच.... जिसको बुरा मानना है वो अवश्य बुरा माने क्योंकि वो अपना कुछ उखाड़ नहीं सकता, क्योंकि हम खोलने या खुलवाने पर विश्वास नहीं करते... दूसरों की औकात बताने से पहले अपनी औकात देखाते हैं ... जिसकी यूएसपी अभी ठीक-ठाक है...)ये प्रकृति भी बड़ी अजीब चीज है .. लगता है जैसे सबकुछ पहले से किसी प्रोग्रामर ने प्रोग्राम करके सृष्टी के यूपीएस में फिट कर दिया हो.... दिमांग मत खुजलाईये... मैने ऊपर जो हैडलाइन दी है वो सही है... उसमें कहीं भी गलती नहीं ....जो मात्रा आप खोज रहे हैं ... वो है ही नहीं... बेवजह डिस्टर्ब कर दिया मुझे... हां तो में बात कर रहा था प्रकृति की ... सृष्टी की ...हम रोजाना न जाने कितने ख्वाब बनाते और बिगाड़ते हैं.... अगर मनचाहा हो जाये तो चीखते और चिल्लाते हैं कि देखा मैने कर डाला... अगर न हो पाये तो खा जाते हैं जान खुदा की... और अंत में एक ही जवाब आता है ... जो उसे मंजूर होगा वही होगा... बहुत से लोग हैं जो ज्योतिष... धर्म और भगवान को नहीं मानते... उनसे पूछिये तो जवाब आता है ... जिसे देखा ही नहीं उसे क्या मानें.... आदि आदि.... लेकिन देखा तो हमने हवा को भी नहीं है... फिर भी वो है.. देखा तो हमने प्रांण को भी नहीं है लेकिन वो हैं....ऐसी ही है ज्योतिष मानिये या न मानिये ... ज्योतिष की गहराईयों में यदि आप डुबकी लगायेंगे तो ... अपना अगला पिछला सब निर्धारित पायेंगे... सिर्फ भविष्य ही क्यों इंसान की फितरत.... वक्त की आंधियां सब तो नियत है.... चलिए सबसे पहले बात करते नीयत की... ज्योतिष में कई योग होते हैं... लगभग 27 .... इन योगों का स्वभाव बिल्कुल इंसान से मिलता जुलता है.... जैसे कुछ इंसान होते हैं जो दूसरों का दुख दूर करने में दिन रात लगे रहते हैं ... वैसा ही योग है पुष्य योग... कुछ इंसान हमेशा दूसरों को काटने के लिए दौड़ते रहते हैं ... वैसा ही है सर्प योग.... इसी तरह एक योग होता है गंड योग.... अब समझे ऊपर जो लिखा था सही था.... 27 योगों में यह योग सबसे विशिष्ट होता है .... जिस तरह सांप को दूध पिला कर पटाया जा सकता है... शेर को शोर करके भगाया जा सकता है.... उसी तरह हर बुरे आदमी से कुछ न कुछ हांसिल किया जा सकता है... अच्छा तो देता ही है.... लेकिन एक योग और एक आदमी से कुछ भी हांसिल नहीं किया जा सकता....बल्कि जब ये आते हैं उल्टा सब ले जाते हैं जो भी आपके पास है... चांहे जितना जोर लगा लीजिये... वो योग होता है गंड योग और वो आदमी होता है ... इस योग का स्वामीं... नाम अब कुछ भी दे दे ...चांहो तो उपर की गलती यहां सुधार लो.... आपके आसपास भी ऐसा तमाम लोग होंगे... मेरे आस पास तो पूरी की पूरी लिस्ट छपी पड़ी है..... पता है मुझे जरा सी देर में आपकी फट जाती है.... लेकिन में बताये देता हूं अपनी लिस्ट के कुछ लोगों को... मेरी नहीं फटती... भला क्यों फटेगी... सच्चाई बताऊं भाई पहले ही फटी हुई है... तो अब क्या फटेगी इन गंड योग वालों से .... जब में जवान हुआ तो मुहब्बत का वायरस भी लग गया... एक लड़की को घुमाने पार्क में गया ,,, जैसे ही गुंटर गूं शुरू की.. तभी कान के पास से तेज तेज तालियों की अवाज आयी.... इससे पहले कि में अपनी महबूबा में थोड़ा और डूबता हाय हाय शुरू हो गयी.... एक पल को तो मैं भी डर गया... कि में काम यहां उठा रहा हूं हाय हाय पीछे से आ रही है.... चोंक कर नजर घुमायी तो दो गंडस्वामी हमारा रास देख ... इंटरटेनमेंट टैक्स वसूलने आ धमके थे.... पहले शेर की तरह डराने की कोशिश की फिर सांप की तरह पटाने की कोशिश की लेकिन नहीं माने ... मानते भी कैसे थे भी तो साले गंडस्वामी गंडेश्वर... और मेरा भी तो गंड योग चल रहा था.... सब ले गये जो भी बाप से झूठ बोलकर में आज लाया था.... हो गया मेरा तो प्रेक्टीकल... यही बोलकर तो पैसे मांगे थे.... कोई नहीं दिन गुजरे....फिर महीने और साल....एक दिन मैं देखता हूं कि चंदन के पेड़ पर कई सांप लिपटे हुए हैं... में चंदन का पुजारी था.. सो लगा हटाने... ठाकुर होने के नाते सारे तिकड़म कर डाले... दाम साम दंड भेद और काम तक लगा दिया दांव पर.... जनाब सर्प तो हट गये... लेकिन इसी बीच शुरू गो गया चंदन का गंड योग... ये देखते ही मेरी फिर फट गयी... ठीक वैसे ही जैसे दस साल पहले फटी थी... पिछली बार तो दो ही गंडस्वामी थे... इस बार तो पूरी की पूरी जमात ही गंडेश्वरों से भरी पड़ी थी... मैने आव देखा न ताव सरपट दौड़ लिया... जब रुका तो मुंह हे बस एक ही आवाज निकली हे ईश्वर चंदन की रक्षा करना.... करता भी तो क्या ये गंडस्वामी तो दस साल पहले वालों से भी ज्यादा विकराल थे.... एक एक कर इनके बारे में बताऊं... बड़ा मजा आरिया है मीयां... ले लो ले लो... चुप करके सुनों पहले की कहानी.... गंडेश्वर नम्बर वन... इन महासय का गंड योग बहुत ही विशाल था... इतना विशाल कि नीलम भी अपनी प्रलयंकारी शक्ती भूल टुकड़े टुकड़े हो जाये ... जो इनके हाथ लग जाये तो... इन्हें बस चाहिए था... किस किस से... अपनी मां से बहन से बाप से ... नौकरी देने वाली कम्पनी से वहां काम कर रहे दूसरे लोगों से .... और चंदन से ... इन्होंने इतना मांगा इतना मांगा कि... क्या कम्पनी क्या सहकर्मी... सब की मां-बहन एक हो गयी... जिस वक्त चंदन पे सांप लिपटे हुए थे और उसे डसे जा रहे थे ... ये उस वक्त भी चंदन से मांग रहे थे... थे ना बड़े वाले गंडेश्वर.....
अब बात गंडेश्वर नम्बर दो की.... ये महासय... क्या लिखूं इनके बारे में ... मेरी तो डिक्शनरी़ ही छोटी पड़ गयी यार.... इन गंडेश्वर के गंड योग का तरीका ही बड़ा शातिराना था... ये बात तो शुरू करते थे देने से... फिर धीरे धीरे धीरे धीरे जब लेना शुरू करते ... तो सब ले मारते.... हां सब ... गंदा दिमाग गंदा ही सोचेगा... लेकिन ये वो भी नहीं छोड़ते थे... अब तो खुश.... जो चांहते थे लिख दिया ना... अब आगे बढ़ने दो.... इनका एक पैंतरा मुझे सबसे ज्यादा पसंद आया.... किसी से कुछ लेने से पहले ये उसे अच्छे से जांचते परखते थे... गलती का कोई मौका ही नहीं छोड़ना चाहते थे... क्या पता किसी दिन जल्दबाजी में लेने गये और दूसरे दिन पता चला कि लेने के बजाय देने पड़ गये... यानि सबसे पहले तय करते कि गोद भरने का कोई चांस तो नहीं है.... जिन दिनों चंदन की मरहम पट्टी चल रही थी... रोजना पहुंच जाते उसके पास कभी भगवान के नाम पर तो कभी बाल बच्चों के नाम पर... हद तो तब हो गयी जब इन्होंने चंदन से एक दिन परमानेंट जुगाड़ मांग डाली... पता है क्या बोले... अरे यार अब रोज रोज कूंदा फांदी नहीं होती... वैसे भी दांत रहे नहीं जो रहे हैं वो टूट जायें इससे पहले ही... मैस का इंतजाम कर दो... वैसे भी अब ढाबों के खाने में मजा कहा रहा... बेचारा चंदन उसको तो जैसे फिर से सांप सूंघ गया हो... उसे कुछ न सूझा क्या करे... मैने भी मौके की नजाकत देख उसे गंड योग का ज्ञान दे डाला... हथियार कोई और बचा ही नहीं था... इस्तेमाल क्या करता.... भुट्टा.... रुको रुको दोस्तो तुमको तो लगता है अब मजा आने लगा... ठहर जाओ साले संपोलो... चंदन से मेरे रिस्ते खराब कराना चांहते हो मुझसे सच्चाई उगलवा कर... जाओ अब नहीं लिखूंगा... हां अब नहीं लिखूंगा और तब तक नहीं लिखूंगा जब तक चंदन आगे की कहानी बयां करने की इजातत नहीं दे देता .... चलो निकलो यहां से मैं भी चला चंदन से बतियाने.... (जारी.... चंदन की अनुमति मिलने पर.)
गंड योग पार्ट टू----
हां तो भइया बतिया लिये ... चंदन जी महाराज से... मिल गयी इजाजत.... थैंक गौड ... इस वक्त मेरा गंड योग नहीं चल रहा था... नहीं तो न मिलती इजाजत और न मिलता ये लेख आपको पढ़ने के लिए... याद है न गंड योग की विशेषता मांगने जाओ देकर चले आओ.... चलो अब काम की बात करते हैं... मैं बात कर रहा था गंडेश्वर नम्बर टू की... मामला जुगाड़ तक टिका रहता तो भी कोई बात नहीं थी... वो तो अड़ गये थे गंड गये थे.... चंदन की रूह फना हो रही थी... हद तो तब हो गयी जब घायल चंदन दो दिन के लिए गायब हो गया.... कोहराम मच गया जनाब... कोहराम... सारे गंडेश्वर परेशान हैरान कि कहीं चंदन को कोई काट तो नहीं ले गया... अगर ऐसा हुआ तो उनके स्वप्न महलों का क्या होगा... वो तो रेत के ढेर की तरह ढ़ह जायेंगे... लेकिन बेचारा चंदन क्या करता ... जहां पला बढ़ा... खाद पानी मिला वहीं तो रहेगा और इस उम्र में जायेगा भी कहां.... टहनीयां भी बड़ी हो गयी हैं ... कहीं और जाने की सोचता तो सबसे पहले टहनीयों के सूखने का डर उसे रुला डालता.... इधर कूआ उधर खाई... दो दिन मरहम पट्टी करायी... फिर अड्डे पर लोटते ही शुरू हो गयी मरायी.... इस बर तो हद ही हो गयी....गंडेश्वर नम्बर टू... का परमानेंट जुगाड़ टेनशनन इतना बढ़ गया कि... अब मरे तब मरे... चंदन तो ठहरा चंदन... बाप-दादों डाली ही आदत ऐसी थी कि मेरा गंड ज्ञान भूल... फिर लग गया शीतलता बांटने में... मौका ताड़ गंडेश्वर ने जेब में हाथ डाला... चंदन के चहरे को खिला डाला... लेकिन ये क्या ... इलाज के रुपयों की चमक तो दूर खेरीज की खनक तक न सुनाई दी... बस एक लम्बी खर्रा जैसी कोई चीज दिखाई दी,,,, खर्रा याद आया या नहीं... यार वही चीज जिसकी बजह से हमको मिली थीं ये डिग्रीयां... पेपरों में थी जिनकी खुशियां.... हां वही... समझ गये साले सब पढ़े तो यूपी बोर्ड के ही हैं... हां मालुम है तुम बिहार से हो.... बस करो आगे बढ़ने दो... खर्रा था या फिर भूखहड़ताल पर बैठे विरोधी दल के नेताजी का मांग पत्र.... एक बार तो लगा जैसे नयी नवेली दुल्हन की डिमांड लिस्ट है... चूड़ी, बिछिया, लाली, पाउड़र, चड्डी बनियान ही नहीं, नयी गाड़ी और अलग मकान तक की मांग थी.... मुंह भी ऐसे ही फुलाये बैठे थे... नहीं दोगे तो मर जायेंगे.... देते हो तो तुम्हें मरना ही है... बेचारा चंदन खुद को बचाये या गंडेश्वर को... खुशबू तो उसे फैलानी ही थी... मां का दूध जो पीया था...डिब्बे का पीते तो एक बार कन्नी काट भी लेते.... लेकिन तभी शाख से पत्ते झड़ने लगे... मेरी फैलायी साजिश के चलते लड़ने लगे.... इसी बीच गंडेश्वर को याद आया ... हां एक चीज कहना तो भूल ही गया... मेरी टहनीयां बड़ी हो रही हैं... फलने-फूलने लगी है... बाग में चोर भी टहलने लगे हैं..... जरा उनके लिए भी डंडा उठा लेना माली का रोल भी तुम निभा लेना.... मेरा तो काम ही ऐसा है.... दिन में गुलाबो रात में गुलाब की बेटी से जो मिलना है.... मर गया बेचारा चंदन.... याद आ गये रघुनन्दन.... ये गंडेश्वर हर तरह से दवाब बना रहे हैं... कभी चंदन की खोल रहे हैं तो कभी अपनी खोलकर दिखा रहे हैं... फिर भी न जाने किस किसकी औकात बता रहे हैं... चलो भाई बस करो बहुत हो गया गंडेश्वर वंदन.... इनके लिए इतना ही काफी है... लिखने को तो पूरी किताब लिख जायेगी... क्योंकि इन्हें लक्ष्मी के कब्जाने की भी आदत है... इस हालत पर बस एक शेर कहूंगा... बाकी आगे चुप करूंगा... गंडेश्वर की कोशिश है ... हर हाल में लक्ष्मी मिलनी चाहिए... तेरे घर में गैस हो न हो मेरे घर में जलनी चाहिए... (नोट-कोई भी पात्र काल्पनिक नहीं हैं... यदि किसी घटना या व्यक्ति ये लाइनें मैच कर रही हों तो वह अवश्य बुरा माने क्योंकि वो अपना कुछ उखाड़ नहीं सकता, क्योंकि हम खोलने या खुलवाने पर विश्वास नहीं करते... औकात बताने से पहले औकात नहीं देखा करते। धन्यवाद)
बस भाई इनके लिए इतना ही... चलिए आगे बढ़ते हैं......लिस्ट बहुत लम्बी है... चंदन से तय हुआ है कि सिर्फ चुनिन्दा गंडेश्वरों के बारे में बात करनी हैं ... लेखक को अपना भी पोल खोलनी है.... इसलिए चुने हुए पके हुए हरामियों का ही चर्चा होगा इस मंच पर ... अरे ये क्या लिख गया मैं... मुझे अपने बारे में भी तो लिखना है इसका मतलब मैं भी बड़ा वाला ... हूं... चलो लिख गया तो लिख गया... अपनी कलम किसी की बांदी थोड़े ही है... जब अपनी पैंट खोलेंगे तभी तो किसी और की खोलने की हिम्मत जुटेगी....
नेक्सट..... गंडेश्वर नम्बर तीन की कहानी थोड़ा ब्रेक के बाद ....
चापलूसी नामा....
मुझे अच्छे से पता है कि मैं जो लिखने जा रहा हूं उसे आप लोग इसी नाम से पुकारने वाले हो.... लेकिन मैं फिर भी लिखूंगा ... क्योंकि ये मेरे साथ गुजरा सच है.... आलोक तोमर .... जी हां ये वो नाम है जो पत्रकारिता की कीचड़ भरी गलियों में अक्सर विवाद का विषय बन जाता है... ये महाशय तो खुले आम कीचड़ लपेटने का दम भरते हैं... और दम है भी सच को सच कहने का... लेकिन वो लोग जो इस गली में महल बनाने का सपना पाले हैं ... या बना भी रहे हैं .... कृत्रिम इत्र लगाये सफेद कपड़े पहने... खुद को पाक साफ साबित करने में जुटे रहते हैं .... उन्हें तोमर साहब बर्दास्त नहीं .... और यहीं से शुरू हो जाती है तू-तू मैं-मैं।मैं जब से दिल्ली की तंग गलियों में बसा हूं तब से ये सब देख रहा हूं .... कोई ज्यादा नहीं ढ़ाई साल ही गुजरा है अभी... लेकिन इस तू-तू मैं-मैं में शामिल होने से मैं खुद को अब नहीं रोक पा रहा... वजह भी है, ये वजह है आलोक तोमर जी के साथ काम करना. कोई ज्यादा नहीं सीएनईबी के आखिरी दिनों में मुझे उनके दर्शन लाभ मिले... मेरे दिमांग में भी आया ... साला कतई खड़ूस आदमी है... सिगरेट पीता है.. पंचायत करता है... चार गलतियां बताता है और निकल लेता है...काम खाक नहीं करता... पैसा इतना लेता है कि हम चार लोगों की तनख्वाह भी आसानी से उसमें समा जाये.... बुढ़ापा आ गया लेकिन टाइपिंग तक नहीं सीख पाया... ऊपरे रौब और झाड़ता है....काहे का सम्पादक वे..... वहीं हम लोग दिन भर खटते रहते हैं...गालियां खाते हैं ... मिलता धेला भर भी नहीं है....लगता है लाला का दिमांग खराब हो गया है..... आदि-आदि. दो तीन महीने तक हमने इनकी आवाज सिर्फ और सिर्फ पंचायतों में ही सुनीं थी.... लेकिन एक दिन अचानक मुझे अपने कंधों पर भारी भरकम बोझ महसूस हुआ... मुडके देखा तो आलोक जी थे.. कान में बुद-बुदाये... जिस शो के लिए तुम लिखते हो.... पैकेज कटाते हो.... रन बनाते हो... और गेस्ट बुलाते हो.... फिर पीसीआर में चीखते चिल्लाते हो..... वो शो कोई और नहीं तुम्हारा हैड ऑफ द फेमिली यानि राहुल देव जी एंकर करते हैं... एक पल को तो लगा बेटा गयी नौकरी..... (उन दिनों आसार भी कुछ ऐसे ही बन गये थे... जिस बच्चे को (प्रोग्राम) को मैने पैदा किया था, अपने खून पसीने से पाल पोश कर बड़ा किया था... उस पर दूसरे लोग अधिकार जमाते और बिगाड़ते नजर आ रहे थे....) लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ... मैं सीट से खड़े हुए बिना टकटकी लगाये उन्हें देख रहा था... और वो एक हाथ डेस्क पर और एक हाथ मेरे कमजोर कंधों पर रखे ... मुझे कुछ समझाने की कोशिश कर रहे थे.... एक पल रुक कर फिर बोले.,., और ऐसा बोले कि मेरी जिंदगी ही बदल गयी.... बोले जो अब तक तुमने किया वो... देशकाल और परिस्थितियों के हिसाब से सही था... लेकिन अब तुम्हें सोचना होगा कि सीईओ का प्रोग्राम और गेस्ट... भी सीईओ के लेबल के होने चाहिए... स्क्रिप्ट ठीक है ... थोड़ा ज्यादा खेलते हो कम करो... और जनाब निकल लिये हुक्का जलाने ..... मेरे दिमांग के सारे फ्यूज ही उड़ गये उस वक्त... मुझे लगा कि बड़े भाई पंकज शुक्ला जी की लाबिंग बेकार गयी.... (वो मेरी तनख्वाह और पद में इजाफा देखना चाहते थे).... लगता है आउटपुट वाले इसे बुरा मान गये.... फिर मुझसे तो राहुल देव जी भी कह चुके थे तुम्हारा कुछ करते हैं.... सिगरेट पर सिगरेट पी... चाय पी ... तमाम लोगों को गरियाया.... लेकिन दिमांग की बत्ती फिर भी न जला पाया..... निर्देशानुसार काम की औकात बढ़ाता रहा... पीछे से धूआं निकलता रहा फिर भी लेबल के लोगों को बुलाने के लिए फोन पर मुस्कुराता रहा.... जिस काम(धांसू लिखने) के लिए मैं सीएनईबी गया था... वो काम धीरे धीरे मुझसे छिन गया (उस पर तथाकथित बड़े घरानों से आये लोगों ने ..... ) और में देखते ही देखते जी हजूरी करने लगा... बड़े बड़े लोगों को बुलाने के लिए मैं हर वक्त फोन पर उनका न जाने क्या क्या साधता रहता.... लोग आये भी .. लेबल बना भी... लेकिन मैं अपनी संतान को बेदर्द दुनियां की ठोकरों में छोड़कर अचानक सीएनईबी को आखिरी सलाम कह आया... राहुल देव जी ने बहुत समझाया गलती कर रहे हो .... पहले कोई नौकरी तलाश लो... फिर छोड़ देना... वो मुझे पहचान गये... बोले जितने तुम मूड़ी हो इस पेशे में नहीं चलेगा... ये सब कलाकारों के साथ ही रहे तो अच्छा है.... तुम्हें आगे बढ़ना है.... मूड़ को मारना पड़ेगा.... उस वक्त कुछ सुनाई न दिया और लगा बुड्ढा भाषण दे रहा है... क्षमा कीजियेगा राहुल सर.. यही सच है... नीचे उतरा तो फिर आलोक जी को पंचायत लड़ाते ... धूंए के छल्ले बनाते देखा.... लगा ये ही वो आदमी है जिसने मेरी नौकरी खायी... बात करता है चंबल के पानी की लेकिन सबसे पहले चंबल का ही पानी(मुझे) पी गया....बाहर आकर दर्जनों सिगरेट पीं चाय पी,,,, जितनी बार धूंए के छल्ले बने उतनी बार .... आलोक जी को गालियां दीं.... इन सबके बावजूद में बड़े भाई पंकज शुक्ला जी से नहीं मिला सिर्फ इसलिए क्योंकि वो आलोक जी की बड़ी इज्जत करते थे...मुझे लगा कि कहीं वो मेरी हरकत का बुरा ना मानें.... और वो जो मेरे लिए नहीं करा सके थे उसका उन्हें कहीं अफसोस न हो..... लेकिन दिन गुजरे-फिर महीने भी और आज सीएनईबी छोड़ने के आठ महीने बाद.... जब में नरेन्द्र मोदी जैसे खड़ूस राजनेता, किसी से आसानी से न मिलने वाले पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल, बड़ी जल्दी बुरा मानने वाले अमर सिंह ही क्यों पाकिस्तानी-अमेरिकी-नेपाली सहित तमाम दिग्गज पत्रकारों और राजनेतओं से फोन पर हंसता, मजाक करता बोलता-बतलाता हूं (एक चीज और मेरा अंग्रेजी में हाथ तंग है...) तो आनायास ही आलोक तोमर जी की याद आ जाती है... उनके लिए गाली तो न जाने कब की गायब हो गयी.... दुआ में ही हाथ उठते हैं .... क्योंकि पांच छह महीने में उनकी छह मिनट की बात ने मेरा लेबल न जाने कब बढ़ा दिया मुझे पता ही नहीं चला.... काश में उनसे रोज पंचायत लड़ाता.... छल्ले बनाता.... तो जरूर कहता.... कीचड़ भरी गलियों में रहने वाले सफेद पोश लोगो सेंट छिड़क लो ... मैने भी कीचड़ लपेट रखी है...आलोक जी से मिलो तो तुम भी कीचड़ लपेट लोगे.... दूर रहकर तो गालियां ही दोगे इत्र ही छिड़कोगे.......
देशी गोरे और नमक हराम कुत्ते ....
एक अंग्रेज हुक्मरान का नाम फिर जेहन में कौंध उठा... यह अनायस नहीं था... उस हुक्मरान को गुजरे हुए एक जमाना बीत गया लेकिन... उसके कुछ वंशज आज भी हिन्दुस्तानीं सरजमीं पर राज कर रहे हैं... शायद ये साहब थे ... लार्ड डलहौजी....पेशे से बनिया थे {माफ कीजिये... मैं यहां किसी जाति का जिक्र नहीं कर रहा, मैं बात कर रहा हूं.. पेशे की उस बनिया की जिसका सिर्फ एक ही मकसद होता है लाभ कमाना } कम्पनी का नाम था ईस्ट इंडिया... धंधा.. हिन्दुस्तानी सर जमीं से सस्ती चीजों खासतौर पर मसालों और बेशकीमती जवाहरातों को खरीद कर उन्हें... अपनी बेस्वाद जमीं के रंगहीन और गंध हीन लोगों के बेचना.... विरासत में इन्हें अपने पूर्वजों से एक ख्वाब मिला था... .. बंधुआ मजदूर तैयार करने का.... इस सपने को पूरा करने की ललक में ये साहब एक और ख्वाब पाल बैठे... लोगों को गुलाम बनाने का ... सच भी है बनिया ज्यादा से ज्यादा फायदा देखता है.... मजदूर को तो मजदूरी देनी ही पड़ेगी चांहे एक बार या बार-बार, गुलाम को तो रोटी भी नहीं दो तब भी बेचारा जुबान नहीं खोलेगा..... इस ख्वाब को पूरा करना थोड़ा मुश्किल था... ख्वाब अभी अंकुरित हो रहा था... ये धंधा करने भरी जवानी में अपने घर से कोसों दूर .... इंडिया आ गये... जैसे ही इनके कदम इस पाक जमींन पर पड़े..... वैसे ही इनके नापाक होटों पर मुस्कराहट खिल उठी..... शायद इन्हें वो जमीं मिल गयी थी जहां ये अपने पूर्वजों के साथ साथ अपने ख्वाब को पूरा कर सकते थे..... इसकी एक ठोस वजह भी थी और वो वजह थी, सबसे पहले इस जमीं पर मिले वो दो कुत्ते जो एक रोटी के लिए लड़ मर रहे थे.... मांफ किजियेगा.... उस वक्त हमारी हालत किसी कुत्ते से कम नहीं थी....आज भी नहीं है.... डलहौजी ने बड़ी आसानी से हिन्दुस्तानी कुत्तों को को लड़ाया... एक दो शेर रास्ते का रोड़ा बने तो उनका शिकार भी हिन्दुस्तानी कुत्तों से ही करा दिया.... शायद आप बोर हो गये.... क्योंकि इस सच्चाई को आप अपने बचपन से पढ़ते और सुनते आ रहे हैं....लेकिन फिर भी कोई असर नहीं पड़ता.... शायद गोरों ने तलवा चाटने की ऐसी आदत डाली है कि ... बाकी सब भूल गये... क्या वफादारी क्या नमक हलाली.... गोरे चले गये... देश आजाद हो गया.... लेकिन राज करने की नीति वही रही ... सदियों बाद भी.... अब देशी गोरे ... टुकड़े डालते हैं.... और कुत्ते .... जी हां ... हिन्दुस्तानी कुत्ते फिर लड़ मरते हैं.... हां एक चीज बदल गयी... कुत्तों की कीमत बढ़ गयी.... अब ब्रेड से काम नहीं चलता.... देश के टुकड़े चाहिए... किसी को गोरखालेंड... किसी को तेलंगाना.... तो किसी को देश के हृदय प्रदेश का उत्तम हिस्सा.... वैसे भी हिन्दुस्तान में शेरों की संख्या दिनों दिन घटती जा रही है.... और कुत्तों की .... इतनी बढ़ गयी है कि देशी गोरे उन्हें मारने के लिए या फिर बधिया करने के लिए निगम की विशेष टीम को जिम्मेदारी देने लगे हैं....मैं तो डर कर भाग आया हूं कि कहीं इन देशी गोरों को ज्यादा खतरा महसूस हुआ तो ये सारे कुत्तों को निपटा ही न दें.... और इस सोच में पड़ा हूं कि अस्तित्व समाप्त होने से पहले या तो अपना विकास कर लिया जाये और शेर बन लिया जाये या फिर कुछ न कर सकूं तो अपने मालिक जिसका नमक खाता हूं... इस सर जमीं का वफादार कुत्ता ही बन जाऊं... दोस्तो यही सही वक्त है ... मैं तो दोनों में से एक रास्ता चुनने जा रहा हूं .... और आप... क्या लड़ते ही रहेंगे ... टुकड़ों के लिए...या तो दौनों में से एक रास्ता चुन ली जिये ... या फिर मुझे जी भरके गरियाईये....ये खुद आपको तय करना है.... आजाद होना हैं या गुलाम बनकर तलुए ही चाटते रहना है.... पीछे से बधिया करने वाली गाड़ी आ रही है... किनारे होकर सोचो ... नहीं तो इस लायक कुछ भी नहीं बचना है......