जब से मिली हूं उससे, सबसे मिलना मिलाना छोड़ दिया ।
मेरे लिए उस पागल ने भी, सारा जमाना छोड़ दिया ।
उसकी चाहत की खुशबू से, महकी महकी रहती हूं ।
जब से उसका साथ मिला है, इत्र लगाना छोड़ दिया ।
टूटी फूटी छत के नीचे, उसके साथ बहुत खुश हूं,
मैने उसके प्यार की खातिर, राज घराना छोड़ दिया ।
( सुबह .उठा तो मेरे दोस्त ये नज्म सुन रहे थे... दिल के करीब मसहूस हुई तो किसी कोने में घर बना गयी। ये नज्म लिखी तो शायरा शबीना अदीब ने है ,,,, लेकिन लगती कुछ अपनी सी है। )
सफर इश्क का...
मेरे इश्क की किताब का हर एक हर्फ़ है अधूरा… इस किताब की हर कहानी है अधूरी ..चांहता तो मैं भी था इसे करना पूरा ... लेकिन अब पता चला नहीं होती हर चांहत पूरी... हर बार मैं हारा यही सोच कर ... हर हार से निकलता है जीत का रास्ता... लेकिन मैं हारता ही रहा ... कभी इश्क के लिए तो कभी आशिक के लिए... कभी खुद के लिए तो कभी खुदा के लिए.... लेकिन अब पता चला नहीं होती हर हार पूरी ... कहीं सुना था नहीं मिलता किसी को मुकम्मल जहां... मगर मुकम्मल है हर आशिकी मेरी... हर रोज कहीं दूर कहीं से आती है एक सदा... तुम हो पूरे तुम्हारी आशिकी है पूरी ... मंजिलें बसा रखीं हैं बस तुमने दूर ... सो तुमको करनी है तय लम्बी दूरी.... जिश्म तलक जाना तो हर किसी को आता है... रूह तलक तय की दूरी तुमने... देर सही अंधेर सही ... कुहासा कितना भी घनघोर सही... तुम्हारी मंजिल है सही ....तुम्हारा हर एतबार सही... चाहे कितने हर्फ़ हों अधूरे ... चाहें कितने जख्म हो गहरे ... रूह को जीतने में मिली गर ऐसी हार सही ... क्यों न हो बार बार सही...तन्हाई...
तन्हाई क्या क्या गुल नहीं खिलाती ... तन्हाई में इंसान को बुद्धी आ जाये तो बुद्ध बन जाता है ... और कहीं कोई खुराफात सूझ जाये तो खतरनाक हो जाता है ... चार दिन से मेरा एक दोस्त भी तन्हा है... अच्छा भला छोड़कर गया था उसे ... जब लौटा तो वो नहीं मिला जिससे मिलने की उम्मीद थी... अब वो बेरहम तन्हाई का शिकार हो गया है.... कभी धूनी रमाये बाबा बनने की बात करता है... तो कभी कोठरी में बैठा अपनी प्रियसी का काजल चुराना चाहता है... कभी जवां मर्द बन दुनियां को जीतने का दम भरता है.... तो अगले ही पल जुए में हारे हुए जुआरी की तरह लुटी पिटी जिंदगी का खेल खत्म करने का इरादा जताता है... जब दर्द बांटना चाहो तो बेदर्द दुनियां का राग अलापता है लेकिन मुद्दे की बात हवा में उड़ा जाता है.... कभी उसको उसकी डिग्रियां मुंह चिढ़ाती हैं तो कभी यही डिग्रियां उसे नयी जिंदगी की राह दिखाती नजर आती हैं.... एक बार तो लगा कि ये प्रेम रोग का शिकार हो गया .... लेकिन अगले ही पल लगा कि नहीं शायद ये समाज सेवा के कीड़े के काटने का दंश है.... बहरहाल उसकी मानसिक स्थिति इस वक्त चौराहे पर टंगे उस मार्गदर्शक जैसी हो गयी है जिस पर ये तो लिखा है कि यहां से किस किस जगह जाया जा सकता हैं ... लेकिन उस जगह जाने के लिए कौन सा रास्ता जाता है यह नदारद है.... नीरस जीवन की कल्पना में वो कस्बे का कहार तो बनना चाहता है ... लेकिन रस घोलने में उसे दुस्साहस नजर आता है .... साहस तो है लेकिन सहारे के बिना मिलता नजर नहीं आता... अजीब-ओ-गरीब दोराहे का शिकार है वो फिलहाल ... तन्हाई का असर कहूं या तन्हाई का आसरा... खुद से मिलना तो चाहंता है ... लेकिन पता जमाने से पूछ रहा है .... वाह री तन्हाई ... क्यों तू उसके जीवन में आयी... कुछ कर पायी या न कर पायी .... मेरे दोस्त की हो गयी खुद से ही जुदाई... वाह री तन्हाई....नींद तुम कब आओगी...

लगता है आज कल नींद बेवफाई पर उतर आयी है... जब देखो तब दगा दे जाती है... वजह भी बड़ी अजीबो गरीब हैं... कभी उम्र का हर डेरा साथ तय करने वाले दो भाई एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं...तो मेरी नींद फना हो जाती है.... तो कभी लार्ड मैकाले की आत्मा देशी गोरों के शरीर में समा जाती है.... तो मेरी नींद सहमकर भाग जाती है... कहीं दूर जब कोई अन्नदाता बेरहम दुनियां से रुखसत होता है... तो मेरी नींद मातम पुरशी में लग जाती है.... कभी उसे सिसकती गंगा याद आती है तो कभी वो यमुना की बदहाली पर आंसू बहाती है... बीते कुछ दिनों से तो ये सिलसिला आम हो गया है... जब से शहीद-ए-आजम का नास्तिकों के नाम खत पढ़ा है... तब से तो नींद के लिए दुआ में हाथ भी नहीं उठते ... लगता है भीख मांग रहा हूं.... बड़ा अजीबो-गरीब हाल है... कमजोर होना नहीं चांहता मजबूत बन नहीं पा रहा .... जैसे तैसे एक दिन नींद आयी भी तो मिनी स्कर्ट वाली टेनिस बॉल उसे उड़ा ले गयी... एक चीज साफ कर दूं दूसरे दोस्तों की तरह न तो उस दिन मैने सोहराब को कोसा था .. जिस दिन उसकी उंगली में छल्ला आ फसा था.. और ना ही उस दिन जब शोएब घर बार छोड़ हैदराबादी बिरयानी में चावल की तरह मिर्जा और सिद्धकी के बीच फंसे थे... नींद तो नादांन लड़की ने उसी दिन से उड़ा रखी थी ... जिस दिन वो टेनिस बॉल बनी कोर्ट में कभी इधर कभी उधर फुदक रही थी.... भइया उसकी दुनियां में औकात क्या है ये बात और है ... लेकिन अपने देश की तो पहली ही वीर बाला है ना ... जो नाक में नथनियां डाले न सिर्फ लड़कियों को सुलगाती रहती है बल्कि मुल्ला मौलवीयों तक को उसने नांच नचा दिया है... कभी खुदा के घर सामान बेचने का इश्तिहार बनाने पहुंच जाती हैं तो कभी देश की आन-बान-शान को जूती दिखाती नजर आती हैं.... बबालों से जान छुटाये तो खेले ना ... जब खेलेगी तभी तो मैडल सैडल जीतेगी... लेकिन करना क्या है.... बिना मैडल के ही वो मॉडल है.... तभी तो देशी मैदानों पर चांहे वो बैगलूरू ओपन ही क्यों न हो मैडम मना कर देती हैं ... पूछो तो हिमेश रेशमियां का नकचढ़ा महिला वर्जन बन बोलती हैं... मुए खेलने ही नहीं देते ... जब देखो बवाल करते रहते हैं.... किसी को मेरी स्कर्ट अच्छी नहीं लगती तो कोई मेरी जूती पर ही नजर गड़ाये रहता है... कि मुई किधर जा रही है.... तभी लोग लगे सच्चाई बताने कि मैडम मॉडलिंग का डेढ़ लाख डॉलर मांग रही थीं... इसलिए सोचा देशी गोरी न सही विदेशी सांवली ले आते हैं... वो सेरेना बहनें हैं न खेलती भी हैं नखरे भी कम करती हैं.... फिर क्या था बोलती बंद.... जो बची कुची थी वो मुजफ्फर नगर, भोपाल और तिरुपति के मुकद्दमों ने बंद करा दी ...जब अपमान किया है देश के मान का, तो ये होना ही था.... चलो भड़ास निकालना यहां बंद करता हूं और आता हूं सीधे मुद्दे की बात पर, मेरी आज की नींद इसलिए उड़ी थी क्योंकि मैं सोच रहा था... जब सानिया ब्याह के अपने पिया के पाक घर जायेंगी तो उनका क्या हश्र होगा.... ससुराल के मौलवी साहब मायके जितने शरीफ तो हैं नहीं जो हिदायत दी और छोड़ दिया... वहां तो स्कर्ट को खींच-खींच कर बुर्का बना देंगे.... वहां तो खुदा का घर औरतों को इबादत करने तक के लिए नसीब नहीं होता तो इस्तहार कहां बनवायेंगी... रही बात पाक की इज्जत नापाक करने की तो पूरी की पूरी फौज ही बेगम साहिबा का घर घेर लेगी ... यहां तो रुआब ऐसा था कि पेटू पुलिसवाले तीन साल में सरकारी कंगन तक नहीं पहना पाये... रही बात शोएब साहब की तो गुगली देने में वो अपने हाकिमों से कम नहीं.... पहले सिद्धकी टैस्ट फिक्स करते हैं फिर आउट होने पर स्टेडियम को तलाक भी नहीं देते.... डर इस बात का भी है कि कहीं इस टेनिस बॉल पर नापाक ऑलराउंडर ऐसा छक्का न जड़ दे कि बॉल टेनिस लॉन के बाहर सीधे चौका चूल्हा की चार दीवारी में फंस कर न रह जाये.... खैर छोड़ो अपनी तो नींद उड़ ही गयी... अब चांहे कोई छक्का मारे या फिर कोई मैडल लाने की बजाय मॉडल ही बनकर रह जाये.... कसाब की तरह हमारे सफेद पोस जुटजायेंगे उसकी चाकरी करने में .... अब चाहे बेचारी सायना नेहवाल मीडिया के नेह के लिए कितनी भी तरसती रहे... या फिर छह-छह रणबांकुरे मुक्केबाज सोने पर कितना भी मुक्का बरसा .... कैमरा लाइट्स और एक्शन के इस ड्रामाई दौर में सुलगते रहें... टीआरपी तो बिकाऊ माल को ही मिलेगी ... सो सौदागर लाइन के बासिंदे बालकनी तक में फोकस घुमा रहे हैं.... पैसा कमा रहे हैं... हम भौंदू बक्सा पर ताला डाल निंदिया रानी को पटा रहे हैं... लेकिन क्या करें वो भी तो सानिया की अटरिया पर जा अटकी है....नापाक बेवफा हो गयी है ... वायदा हमसे करती है... पहुंच कहीं और जाती है... चलो भइया कॉफी गटकाओ दफ्तर जाओ ... नहीं तो बॉस भी कहीं शोएब न बन जाये... नौकरी पर हमें रखे... सेलरी किसी और को दिलवाये....


