Vineet Singh

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Vineet Singh

Vineet is Sr. Print and Broadcast Journalist, Author, Columnist, Strategist, Believer, Dreamer and Performer. who covers topics pertaining to Indian politics, Crime Higher Education, tourism, Archeology and Society. He is Presently Working with Leading Hindi News Paper.

  • Kota, Rajashtan
  • +91 75990 31853
  • vineet.singh@in.patrika.com
  • www.facebook.com/dr.vineetsingh
Me

Professional Experineces

Started Career in Journalism As Trainee Reporter in Print Media and achieved Key Positions in Various Medium of Media Just Like Print, Electronic and Digital. As Journalist Exposed so many Scams like Pension Scheme, Scholarship Scheme and Drugs Mafia Network. During My Career Interviewed With Pm Narendra modi, Former PM Chandarshakhar, IK Gujral, VP Singh, Atal bihari vajpayee and so many National and International Political Leaders.I have also interviewed Dacoit Nirbhay Gujjar and Phoolan Devi.

work Experineces 18 Years As Journalist
Print Media 12 Year As Special correspondent With Rajasthan patrika, Outlook hindi, Danik Jagran, sahara samay
TV journalism 06 Year As Producer with CNEB, ANI, Janmat Tv (live india)
Digital media work with rajasthan patrika last 2 year

News

Coverage for Rajasthan Patrika,Dainik Jagran,India Today,Live India, CNEB News, Outlook Hindi, ANI etc.

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Asia Pacific

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PhD in Mass Communication and Master Degree in Journalism and Mass Communication And Ex Faculty, Department of Mass Communication and Journalism, Bareilly College bareilly india

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  • भेड़ों की भीड़ नहीं, रेशमा सी पीर चाहिए............

    भेड़ों की भीड़ नहीं, रेशमा सी पीर चाहिए............


    अरे भाई सुनो. क्या रेशमा रंगरेज को जानते हो..... अरे दो पल ठहरो तो सही .. जिससे भी पूछो यह सवाल, हर कोई झल्ला कर एक ही जवाब देता है..... देश अन्ना के रंग में रंगा है और तुम रंगरेज को तलाश रहे हो.... नहीं जानते लोग उस रेशमा को जिसे में तलाश रहा हूं..... आखिर भेड़ बनी यह भीड़ जानेंगे भी कैसे ? उनके अंदर की रेशमा मर जो गयी है... उन्हें तो बस चरवाहों की चीख का पीछा करने की आदत हो गयी है ... जिधर हांको उधर ही चल पड़ती हैं.....
    यह लानत यूं हीं नहीं है .... अधिकारों की भूख से तो हर कोई तड़पता मिल जाता है लेकिन कर्तव्यों की बेदी पर खुद को हवन करने वालों का हर ओर टोटा जो है...फिलहाल देश में क्रांति आयी हुई है ... माहौल बना है भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का... मांग उठी है एक कानून बनाने की ... लेकिन इन भेड़ों के सामने एक सवाल भी मुंह बांये खड़ा है ..... जो मांगता है इस भीड़ से जवाब कि कितने लोग हैं यहां, जो अब तक बने कानूनों का पालन करते आये हैं... या फिर उन्होंने क्या कभी नहीं तोड़ा कोई कानून...सबके सब मौन साध लेते हैं.... नहीं तो भीड़ के खिलाफ भाषण देने पर पत्थर उछालने लगते हैं.... सरकार का साथ देने का आरोप तो पुराना हो चुका.... आखिर बात उनके अधिकारों की जो है...
    कर्तव्यों की बात करेंगे तो फिर सन्नाटा ही पसर जायेगा...ऐसा सन्नाटा जो अपना नेता चुनने के वक्त यानि चुनावों के दिन शहर की गलियों में पसरा होता है... देश गाली दे रहा है नेताओं को ... उन्हें भ्रष्टाचार की जननी से लेकर देश के लिए कोढ़ तक बताने से नहीं चूक रहा है कोई .... लेकिन एक बार फिर वही सवाल आकर खड़ा हो जाता है बीच में...... आखिर किसने चुना इन्हें... किसने दिया अधिकार सेवक से शासक बनने का... किसने दी आजादी भ्रष्टाचार का नाला बहाने की... उन 60 फीसदी भेड़ों ने ही किया है ना यह कुकृत्य जो अधिकारों की मांग पर तो चीखने लगती हैं लेकिन मतदान के कर्तव्य को भुला... उस दिन को छुट्टी का दिन बता .... किचिन में पकौड़े तलने की मांग करने लगते हैं..... या फिर गुजार देते हैं पूरा दिन नींद का ढ़ोकला बनाने में.......
    छोड़ो भी यार मैं कहां रेशमा को ढूंढ़ते हुए ढ़ोकला पर पहुंच गया .... अरे ढ़ोकला से याद आया यहीं कहीं अहमदाबाद की ही तो रहने वाली है वो..... बहुत तलाशा उसे लेकिन नहीं जानता उसे कोई पूरे अहमदाबाद में ....आखिर क्यों याद रखें उसे यहां के लोग...गुजरात  गोधरा की गंध को अभी भुला नहीं पाया है इसलिए नयी यादें सजोने की हिम्मत नहीं है उसमें...
    तो फिर क्यों न उसकी गुमशुदगी दर्ज करा दूं मैं,.... पुलिस तो तलाश ही लेगी ना... यही सोच कर जब थाने की सीढ़ियां चढ़ी तो सामने ही दिख गयी मेरी रेशमा... कहीं कौने में कंपकंपाती .... पूछा,  क्यों इतनी डरी हुई हो.... तो जवाब आया सरकारी नौकरी देने का वायदा किया था सुनहरे गुजरात ने .... लेकिन लगता है थाने में गलत चिठ्ठी आ गयी जिसके चलते गूगल बना डाला इन लोगों ने मुझे... न जाने क्या क्या खोज रहे हैं मेरे बीते कल और आज में..... मेरे पास दिलासा देने के सिवा कोई और चारा न था ... करता भी क्या आतंवादी की पत्नी जो थी... उसी आतंकवादी शहजाद की पत्नी जिसे मासूमों के खून की होली खेलने से रोका था रेशमा ने .... पहले समझाया था नहीं समझा तो भारतीय नागरिक होने का कर्तव्य निभाते हुए पुलिस के हाथों में सोंप दिया था उसे.... नौ बम मिले थे शहजाद से पुलिस को ... अगस्त महीने में अहमदाबाद की रथयात्रा को शव यात्रा में बदलना चाहता था वो.... लेकिन मेरी रेशमा थी जो बिल्कुल नहीं पसीजी... और ना ही उसने परवाह की अपने तीन मासूम बच्चों की जिनके लिए रोटी-कपड़े का इंतजाम करने वाला कोई दूसरा न था... और ना ही चिंता की थी उसने आतंकी की पत्नी का धब्बा लगने की ... उसने चिंता की थी तो बस अपने कर्तव्यों की और रथयात्रा में शामिल होने वाली मासूम जानों की जिनसे उसका कोई वास्ता न था....   
     चलो अब मेरे चलने का वक्त आ गया है रेशमा ने तो अपना कर्तव्य बखूबी निभा दिया... अब उसके परिवार को सहारा देने का मेरा कर्तव्य मुझे पुकार रहा है ... वो बेचारी अधिकार भी तो मुझ हिन्दुस्तानी पर ही जता सकती है .... क्योंकि भेड़ों की इस भीड़ में उसे चंद सिरफिरों के सिवाय कोई जानता ही नहीं.... जानेगा भी कैसे अधिकारों के लिए थोड़े लड़ी थी वो..... कर्तव्यों का पालन करते हुए घर फूंका था उसने..... मोहल्ले में रोशनी करने को जला दिया घर अपना ही .... रेशमा तुम्हें कोटि-कोटि प्रणाम।
  • सत्याग्रहः जंग-ए-आजादी के हथियार को कमजोर समझ बैठी सरकार

    सत्याग्रहः जंग-ए-आजादी के हथियार को कमजोर समझ बैठी सरकार

    नई दिल्ली।सरकार कहती है कि शांति पूर्ण तरीके से आंदोलन करो हम सुनेंगे लेकिन क्या सरकार ने कभी महसूस की ईरोम शर्मिला की भूख, क्या सरकार ने कभी जहमत उठाई स्वामी निगमानंद की मौत से सबक लेने की, या फिर कभी सरकार ने समझा पुलिसिया कहर के चलते जिंदगी और मौत के बीच झूलती राजबाला का दर्द। नहीं कभी नहीं क्योंकि सबके सब गांधी जी के अहिंसा और सत्याग्रह का व्रत लिये हुए हैं। सरकार को तो बस चिंता होती है कि किस तरह कश्मीर में स्वतंत्रता दिवस पर भी तिरंगा न फहर सके क्योंकि वहां हिंसा भड़क सकती है, सरकार तो बस समझती है रामदेव के समर्थकों पर आधीरात में कायराना हमला करने की वजह क्योंकि देश में काले धन के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ सकता है और सरकार समझती है बस अन्ना को जेल में ठूसना क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी झूठी सांत्वना की कलई खुल सकती है और सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानी मांग सकते हैं उससे हिसाब 2 जी स्पेक्ट्रम या कॉमन वेल्थ गेम्स में फंसे उसके नेताओं की तरफदारी का हिसाब।
    बात शुरू करते हैं ईरोम शर्मिला से., वह 04 नवम्बर 2000 से अनवरत भूख हड़ताल पर बैठी हैं और तभी से न खत्म होने वाली पुलिस हिरासत में हैं। उन पर आरोप है आत्म हत्या के प्रयास का, लेकिन सवाल उठता है क्यों ? शायद इसका जवाब सरकार आपको न दे क्योंकि उसे येन-केन-प्रक्रेरण शासन चलाना है और अपनी सत्ता का एहसास भी कराते रहना है।
    कारण हम बताते हैं, मणिपुर राज्य में पचास के दशक में स्वायत्तता और भारत के अन्य राज्यों की तरह विकास की मांग करते हुए पृथ्थकवादी आंदोलनों ने तेजी पकड़ी। केन्द्र और राज्य की सरकारों ने तब इस ओर ध्यान न दिया और हमेशा ही उसे हल्के में लिया। सरकार के कान मूंदने का फायदा हमारे उन पड़ौसियों ने उठाया जो देश में अलगाव पैदा कर हमारी शांति को भंग करना चाहते थे और नतीजा उल्फा जैसे हिंसा में विश्वास रखने वाले अलगाववादी संगठनों ने पूर्वोत्तर राज्यों में पैर जमाना शुरू कर दिया। शायद भारतीय सरकारें कभी भी इस ओर ध्यान नहीं देतीं यदि उल्फा जैसे संगठनों ने हिंसा का सहारा लेकर सरकार का ध्यान मणिपुर जैसे सीमांत राज्यों में व्याप्त बदहाली की ओर न खींचा होता लेकिन सरकार ने इन राज्यों में व्याप्त समस्याओं को दूर कर आम आदमी को अलगाववादी आंदोलनों से दूर करने की बजाय उसे दबाने के लिए फौजी बूटों और बटों का सहारा लिया। साथ ही सशस्त्रबल विशेषाधिकार कानून लागू कर उन्हें ऐसे असीमित अधिकार दे दिये जिसके तहत किसी भी पुलिसिया कार्रवाई पर कहीं भी कोई सुनवाई या उसका विरोध नहीं किया जा सकता था। इस कानून की आड़ में प्रशासन में बैठे कुछ असमाजिक तत्वों ने इस इलाके में जमकर कहर ढ़ाया। इसी कानून को खत्म करने की मांग कर रही हैं गांधीवादी शर्मिला इरोम। गांधीवादी तरीका अपनाते हुए उन्होंने अनशन को अपने विरोध का हथियार बनाया, नतीजा एक दशक से भी ज्यादा वक्त हो गया इस लड़ाई को लेकिन केन्द्र सरकार के कान पर जूं तक न रेंगी। फिर कैसा दावा कि शांति से आंदोलन करो हम सुनेंगे।
    गांधीवादियों को जबरन खामोश करने की यह कोई अकेली सरकारी कोशिश नहीं है। भारतीय जनमानस शायद ही भूला होगा.........13 जून 2011 का दिन...... जी हां, अहिंसा और सत्याग्रह के बल पर आजाद हुए हिन्दुस्तान के इतिहास का एक और काला दिन ....इसी दिन 116 दिनों के सत्याग्रह के बाद स्वामी निगमांनन्द सरकार और जनता की उपेक्षाओं का शिकार हो ब्रह्मलीन हो गये थे। सभी जानते हैं जल ही जीवन है लेकिन इस जीवन को अब वेंटिलेटर की जरूरत है। जरूरत है इसके सही दोहन की और जीवनदायनी नदियों के सहेजने की। सम्पूर्ण राष्ट्र की, जनता की, हर खास-ओ-आम की जरूरत को अपने जीवन का ध्येय बना उसे सहेजने की ही तो मांग कर रहे स्वामी निगमानंद लेकिन न उनके जीते जी और न मरने के बाद सरकार को नदियों को और उनके जल को सहेजने की कोई सुध आयी। अहिंसा के बल पर अंग्रेजों को देश से निकालने वाली यह भारत भूमि इसी अंहिसा और सत्याग्रह के कारण एक गंगापुत्र की मृत्यू की गवाह भी बनी, सरकार अब जांच कर रही है लेकिन नतीजा कब आयेगा कोई नहीं जानता। निगमानंद जिस समय देश की जनता के लिए अपने जीवन को होम कर रहे थे उस समय सरकार को उनकी सुध भी क्यों आती क्योंकि सरकार उस वक्त देश की जनसंख्या के एक फीसदी से भी कम हिस्से वाले उन लोगों की चिंता में लीन थी जिन्होंने कालेधन का अकूत भंडार इकट्ठा कर रखा था और तैयारी में जुटी थी इस सम्पदा को देश में वापस लाने की मांग करने वालों से बल पूर्वक निपटने की।
    04 जून 2011 की तारीख तो याद ही होगी.....और याद होगा दिल्ली का रामलीला मैदान, जहां आधी रात में सोते हुए निहत्थे महिला-पुरुषों-बच्चों पर टूटा था पुलिसिया कहर। फिर से आरोप वही- शांति व्यवस्था भंग होने का खतरा लेकिन किससे और क्यों। उन लोगों से जो मांग कर रहे थे कालेधन को देश में वापस लाने और उसे संग्रहित करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की, या फिर उन उन धनपशुओं की नाराजगी की जिनके चंदे पर ही सरकार चलाने वाली राजनीतिक पार्टिया अपना गुजारा करती हैं जो उन्हें कतई मंजूर न था। रामदेव भले ही अब आरोपों के घेरे में हों लेकिन उन्होंने जो आवाज और मांग उठाई थी निसंदेह कोई भी देश भक्त उसका समर्थन करने से इन्कार नहीं कर सकता। रामदेव तो अपनी जान बचाकर रावणलीला के मंचन के बाद भाग खड़
    हुए लेकिन मैदान में डटे रहे हजारों सत्याग्रही बापू के अनुयायी।
    इनमें से एक थी राजबाला.. जी हां राजबाला, गुडगांव की रहने वाली इस वीरांगना का दोष बस इतना था कि यह भी कालेधन के खिलाफ रामलीला मैदान में मोर्चा संभाले हुए थी। पुलिस और सरकार कहती है कि कहीं कोई अत्याचार नहीं किया किसी आंदोलनकारी के ऊपर, नहीं चलाईं कहीं कोई लाठी लेकिन क्या कोई बतायेगा कि राजबाला की रीड की हड्डी कैसे टूटी और कैसे पहुंची वह मरणासन्न अवस्था में। दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में पड़ी वो कैसे, क्यों और किसकी वजह से मौत को मात देने के लिए खुद से जूझ रही है ? क्या सरकार या उसका कोई ठेकेदार अब भी कहेगा कि गांधी जी का रास्ता चुनो हम सुनेंगे तुम्हारी बात।
    हुजूर सरकार के पास हमेशा एक रटा-रटाया जवाब मौजूद रहता है और वह यह कि इन सभी आंदोलनों से शांति भंग की संभावना थी या फिर वास्तविक परिस्थितियों का उन्हें पता ही नहीं था इसलिए जिन लोगों ने(पुलिस) यह बर्बर कार्रवाई की है हम उन्हें नहीं बख्सेंगे। जब सरकार सोती रहेगी, ए राजा और कलमाड़ी जैसे भ्रष्ट लोगों को बचाने में ही जुटी रहेगी तो भला उसे इन जन आंदोलनों की गूंज कहां सुनाई देगी और ना ही समय पर स्थितियों को सुधारने की सुध आयेगी।
    यह जनआंदोलन तो महज एक बानगी भर थे सरकार के रवैये की। यदि सरकार की विरोधाभाषी नीतियों को समझना हो तो कश्मीर के मुद्दे पर एक बार जरूर नजर डालनी होगी। सवा सौ करोड़ लोगों की रोजी-रोटी, घर-मकान, रोजी-रोजगार और विकास का जिम्मा संभालने वाली केन्द्र सरकार मुम्बई में आतंकी हमला होने पर कहती है कि इन्हें नहीं रोका जा सकता क्यों क्योंकि उसकी मंशा ही नहीं है इन्हें रोकने की। कसाब की रखवाली और सुरक्षा पर करोड़ों खर्च करने से नहीं हिचकती और तो और संसद पर हमला करने वालों को फांसी दिये जाने से यह कहती हुई बचती है कि कश्मरी में सुरक्षा व्यवस्था को खतरा पैदा हो जायेगा, उस कश्मीर में जिसमें पन्द्रह अगस्त को तिरंगा फहराने तक की हिम्मत सरकारी मुलाजिम नहीं जुटा पाते। जो सरकार महज 8,639 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को ठीक से संभाल नहीं सकती और तो और आजादी के दिन राष्ट्र ध्वज तिरंगा फहराने के लिए महज 31,34,904 लोगों पर नियंत्रण नहीं कर सकती वह आखिर कर क्या सकती है सिवाय जन आंदोलनों को बर्बरता से दबाने के।
    हां ऐसी सरकारें एक काम और कर सकती हैं भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना को गिरफ्तार करके जेल जरूर भेज सकती है क्योंकि वो शर्मिला इरोम, स्वामी निगमानंद और राजबाला की तरह बापू के पद चिन्हों पर अहिंसा और सत्याग्रह का व्रत लिये हुए हैं, इनके हाथ में तिरंगा न फहराने देने वाले लोगों की तरह हथियारों की धमक नहीं हैं जो सरकार को हमेशा सुनाई देती है।
    बाबा अन्ना ने इसी धमक को सुनाने के लिए पहले जंतर-मंतर पर डेरा डाला और फिर राजघाट पर। सरकार चला रहे लोगों ने उन पर न जाने कितने आरोप लगाये, कीचड़ उछाले, यहां तक कि डराया धमकाया भी लेकिन अन्ना नहीं डरे क्योंकि वह शर्मिला इरोम, स्वामी निगमानंद या राजबाला की तरह एकाकी नहीं थे। उनके साथ था इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी से उतार फेंकने वाला वकील शांति भूषण,  उनके साथ थी बीच सड़क पर खड़ी प्रधानमंत्री की कार को खिंचवाकर थाने भिजवा देने वाली खाकी की थाती क्रेन बेदी.... जी हां किरण बेदी को लोग इसी नाम से पुकारने लगे थे,  उनके साथ था देश को सूचना के अधिकार का हथियार दिला देने वाला मनीष सिसोदिया, उनके साथ था जनता को लड़ाई के लिए तैयार कराने वाला पूर्व प्रशासनिक अधिकारी अरविंद केजरीवाल और उनके साथ था आंध्रप्रदेश में नक्सली आजाद का साथी बताकर मारे गये पत्रकार हेमंत की विधवा को न्याय दिलाने की जंग लड़ने वाला प्रशांत भूषण...जिसने पूरे मुकद्दमे का एक पैसा नहीं लिया और न जाने ऐसे कितने लोगों की कानूनी मदद की और हां उनके साथ थी देश की युवा पीढ़ी जो भ्रष्टाचार को किसी भी कीमत पर अब एक पल भी सहने के लिए तैयार नहीं है। 
    देश को पहले विदेशी आक्रमण के लिए एकजुट करने वाले महागुरू चाणक्य ने कहा था कि जब लोग अपना इतिहास भूल जाते हैं तो आने वाला इतिहास उन्हें भी भुला देता है। राजनीति की रोटियां सेकने वाली कांग्रेस राजनीति के महापुरोधा की एक छोटी सी बात को याद न रख सकी और भूल गयी अपना इतिहास जहां उसने अहिंसा और सत्याग्रह के बूते ही इस देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था और उसी की एवज में हांसिल की थी हिन्दुस्तान में पीढी दर पीढ़ी सत्ता। जब उन गोरों के बूटों और बटों को सत्याग्रहियों ने देश से बाहर का रास्ता दिखा दिया था तो अपनी ही सरजमीं पर खड़ी दंभी और अंधी सत्ता को हमेशा-हमेशा के लिए मिटाना कौन सी बड़ी बात है। जहां भी होगी बापू की आत्मा जरूर जार-जार रो रही होगी।

  • हमें चाहिए मुकम्मल लोकपाल

    हमें चाहिए मुकम्मल लोकपाल


    पान के खोखे से लेकर चाय की दुकान तक .... दोस्तों की बैठकी से लेकर किटी पार्टी तक या फिर ......दफ्तर से लेकर घर तक.... हर कोई अपनी समझ और सुविधा के हिसाब से लोकपाल बिल के ड्राफ्ट पर अपनी विशेषज्ञता का इजहार कर रहा है लेकिन हर अंजाम तक फटाफट पहुंचने वाले इस दौर में किसी के पास इतनी फुर्सत नहीं कि लोकपाल के वास्तविक नफे-नुक्सान पर दो पल शांति से बैठकर ... अध्ययन कर सके और सोच सके। मेरे हिसाब से किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले लोकपाल की कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है... मसलन यह कि दुनियां के किसी भी मुल्क में राष्ट्र प्रमुखों को लोकपाल जैसी किसी भी संस्था के दायरे में नहीं रखा गया है ... हर जगह वह जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली संसद के प्रति ही जवाब देह है न कि किसी और दूसरी संस्था के प्रति....... इसी के साथ भारतीय संविधान का ज्ञान रखने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार निरोधक कानून के दायरे में आते हैं और वह इस तरह की किसी भी कानूनी कार्रवाई से बाहर नहीं हैं.......वहीं सरकार जिस लोकपाल को ला रही है उसमें भी मौजूदा प्रधानमंत्री के कुर्सी से हटते ही वह लोकपाल जांच के दायरे में आ जाता है ...... यानि सत्ता प्रमुख के पद की गरिमा को बनाये रखा गया है .... व्यक्ति विशेष किसी भी कानूनी कार्रवाई से नहीं बच सकता.......
    सरकार जिस लोकपाल को संसद में लेकर आयी है उस पर कुछ राजनीतिक दलों और छह लोगों की सिविल सोसायटी को आपत्ती है ......... पहले राजनीतिक दलों की बात करते हैं....... लोकपाल के सरकारी स्वरूप का सबसे ज्यादा विरोध भारतीय जनता पार्टी कर रही है.... लेकिन भाजपा शासित राज्यों पर नजर डालें तो वहां या तो लोकपाल के छोटे स्वरूप लोकायुक्त की नियुक्ति तक नहीं की जाती है और नियुक्ति हो भी जाती है तो राज्य का मुखिया मुख्यमंत्री उसके दायरे में नहीं आता है ...... यानि एक ही व्यवस्था पर दो व्यवहार.....यदि थोड़ा पीछे नजर डालें तो भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) की सरकार ने 2002 में लोकपाल बिल के लिए बनाये मसौदे में प्रधानमंत्री को शामिल तो कर लिया था लेकिन इस मसले पर बनी संसद की स्थायी समिति के मंजूरी दिये जाने के बाद भी जब तक एनडीए की सरकार रही इस बिल को पास करना तो दूर की बात संसद में पेश तक नहीं किया गया...... उस वक्त इस स्थायी समिति के अध्यक्ष देश के वर्तमान वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी थे...... यहां दो सवाल उठना लाजमी हैं ... पहला यह कि उस वक्त प्रणव मुखर्जी यानि कांग्रेस चांहती थी कि जल्द से जल्द प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में आये ....... और भाजपा चांहने के बावजूद करने को तैयार न थी.... आखिर क्यों ?  और, दूसरा सवाल यह कि सत्ता बदलते ही कांग्रेस और भाजपा दौनों अपने पुराने रुख से पलट गये ... यानि अब भाजपा चाहती है कि लोकपाल को जल्द से जल्द लागू किया जाये लेकिन कांग्रेस अब प्रधानमंत्री को उससे बाहर रखना चाहती है ........ मतलब साफ है .......दौनों राजनीतिक दल जनता को भ्रमित कर रहे हैं उन्हें लोकपाल चाहिए लेकिन विपक्ष में रहकर....सत्ता में रहते समय नहीं........
    इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता कि हाल ही में सरकार द्वारा संसद में पेश किये गये लोकपाल बिल के मसौदे में कुछ प्रावधान आपत्तीजनक हैं...लेकिन इस तथ्य से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि मौजूदा विधेयक का दायरा अब तक के किसी भी भ्रष्टाचार विरोधी मसौदे से ज्यादा व्यापक और शक्तिशाली है..... यदि किसी को कोई आपत्ती है तो इसके लिए गठित होने वाली संसद की स्थाई समिति की चर्चाओं में जरूरी संशोधन और नये प्रस्तावों को जुडवाकर और मजबूत बनावा सकता है ... इस समिति में सभी दलों को प्रतिनिधित्व मिलता है...... लेकिन किसी के पास इतना इंतजार करने की फुर्सत कहां है .... मामला गर्म है इसलिए राजनीति की रोटियां भी सेकनी हैं... बाद में ठंडा पड़ गया तो वह कच्ची रह जायेंगी....... शायद यही वजह है जो जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों में इस मुद्दे पर विरोधाभास है।
    सबसे पहले बात सरकार को चलाने और बचाने वाले समूह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की .... तो चौंकाने वाली बात यह है कि भ्रष्टाचार के समंदर में नाक तक डूबा करुणानिधि का द्रमुक चाहता है कि प्रधानमंत्री भी लोकपाल के दायरे में आयें.......और तो और .........भूमि अधिग्रहण और ताज केरीडोर जैसे बड़े घोटालों के आरोप में फंसी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी चाहती हैं कि प्रधानमंत्री पर लोकपाल की लगाम हो.... लालू भले ही लोकपाल की मुखालफत का रास्ता चुन चुके हों लेकिन समाजवादी पार्टी अभी इससे होने वाले नफे-नुकसान का हिसाब जोड़ने में लगी है..... सो चुप्पी साध रखी है.....कुछ ऐसा ही हाल विपक्ष के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का भी है.... भाजपा और जनता दल (यू) सत्ता में रहते हुए जो न कर सके वह कांग्रेस से करवाना चाह रहे हैं....... लेकिन अकाली दल उनके रुख से इत्तफाक नहीं रखता .... सो उनके खिलाफ है.....वहीं इनकी पुरानी साथी रहीं जे. जयललिता हालात का जायजा ले रही हैं .... कि, ऊंट किस करवट बैठेगा .... कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री जैसे प्रमुख पद की गरिमा की रेटिंग ....राजनीतिक दलों की निगाह में सत्ता में रहने या न रहने पर घटती-बढ़ती रहती है .... और उस पर किसी बाहरी नियंत्रण का विरोध या समर्थन फायदे या घाटे के समीकरण पर टिका है..........
    यह तो था राजनीतिक दलों का दोमुहां रवैया अब एक बार देश की सवासौ अरब जनता के रातों-रात खड़े हुए छह सदस्यीय प्रतिनिधियों यानि सिविल सोसायटी की मंशा को भी  परख लेते हैं...... इस समूह की एक बात जो समझ से परे जाती है वह उनकी हठधर्मिता है....... इन लोगों को न जाने क्यों लगता है कि लोकपाल का जो मसौदा उन्होंने तैयार किया है वही आखिरी मसौदा है ....... और उसका दर्जा देश की जनता की नजरों में गीता-कुरान-बाइबिल-गुरुग्रंथ साहब से कम नहीं होना चाहिए...... जिस पर किसी को उंगली उठाने का हक नहीं है........ यह मसौदा कैसै और कब बना या फिर किसने बनाया सभी को पता पता है ..... लेकिन क्या बना इस सवाल पर देश की तीन चौथाई से ज्यादा जनता अभी तक अंधेरे में है...... बनाने वालों की राजनीतिक निष्ठा किस सत्ता के साथ कब बदली यह भी सभी जानते हैं........  सरकार पर आरोप है कि उसने इस पाक मसौदे के सिर्फ एक चौथाई हिस्से को ही माना लेकिन टीम अन्ना को सौ फीसदी से कम कुछ भी मंजूर नहीं.....
    भारतीय संविधान की सबसे मजबूत प्रक्रिया का नाम है लोकतंत्र यानि जनता और उसकी चुनी हुई संसद.... जिसे किसी भी प्रस्ताव को मंजूर या नामंजूर करने का पूरा हक दिया गया है..... आम राय न बने तो मतदान का प्रावधान भी रखा गया है... जो बहुमत कहे वह किया जाये....ठीक वैसे ही जैसे सिविल सोसाइटी को संविधान ने सरकारी मसौदे का विरोध करने या उसकी प्रतियां जलाने का अधिकार दिया है .....
    लेकिन सवाल तब उठता है जब कुछ लोगों खुद को इस संविधान से बड़ा बताने लगते हैं... और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से खुद को ऊपर मानने लगते हैं....वकालात की जाती है एक ऐसी संस्था के गठन की जो किसी के प्रति जवाब देह न होकर पूरी संवैधानिक व्यवस्था को अपने प्रति जिम्मेदार बना देना चाहती है.... मानते हैं कि देश को इस वक्त यदि किसी चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है तो वह है भ्रष्टाचार के खात्मे की लेकिन देश के संविधान को और लोकशाही की व्यवस्था को नुकसान पहुंचाये बिना.... जरा सोचकर देखिये उस हालात के बारे में जब कोई लोकपाल पथभ्रष्ट हो जाये.......और वह भी तब जब देश के न्यायालय और संसद को कटघरे में खड़ा कर चुका हो...... क्या हाल होगा देश का उस वक्त......  आखिर बना तो वह भी हाड-मास का ही होगा.... उस समय विपक्ष और मीडिया का क्या रुख होगा .... क्या देश की स्थिरता कायम रखा जा सकेगा उस हाल में....इसलिए शायद इतनी महत्वपूर्ण संस्था की स्थापना पर थोड़ा धैर्य रखने और विवेक से काम लेने की आवश्यक्ता है ....... लोकपाल बने भले ही अगली सरकार आये तक .... लेकिन जब भी बने वह देश के संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बने न कि उसे कमजोर करने के लिए.... अस्थिर करने के लिए....
    एक आखिरी बात ....... पूरे मसौदे में प्रधानमंत्री को शामिल करने या निकालने के सवाल को नाक के सवाल से न जोड़ा जाये.... इस मुद्दे को व्यवहारिक रूप से सुलझाने की जरूरत है .... एक बार मान भी लिया जाये कि कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार एक भ्रष्ट प्रधानमंत्री को बचाने के लिए टीम अन्ना की बात सुनने को तैयार नहीं लेकिन जरा दिमांग पर जोर डाला जाये तो उसके दूसरे निहितार्थ भी हैं.... यदि प्रधानमंत्री के खिलाफ शिकायतों का सिलसिला शुरु होता है तो सबसे पहला नुकसान यह होगा कि देश के मुखिया का पद कमजोर होगा और गरिमा क्षीण.... क्या कोई इस बात से इन्कार कर सकता है कि सूचना के अधिकार का दुरुपयोग नहीं हो रहा या फिर जनहित याचिका के नाम पर फिजुल के मामले नहीं उठाये जाते .... उसे देखते हुए यदि प्रधानमंत्री के खिलाफ लोकपाल के पास शिकायतें आती हैं तो क्या मामलों को निपटाने, विवादों की सुनवाई करने, सवाल जवाब करने, सफाई देने और लोकपाल के दरबार में हाजिरी लगाने से प्रधानमंत्री जैसी संस्था का समय और ध्यान दोनों जाया होंगे..... हर समय वह बचाव की रणनीति ही अपनाता रहेगा ... काम कब करेगा ? जबकि सरकारी मसौदे में उसके पद से हटने पर जांच और सजा का प्रावधान है....कम से कम एक आदमी को तो चैन से काम करने दिया जाये....... हां सरकारी मसौदे की दो बातें जरूर स्वीकार नहीं की जा सकती वो यह कि .... यदि किसी शिकायतकर्ता की शिकायत झूठी निकली तो उसके खिलाफ सजा का प्रावधान किया जाये  और दूसरा लोकपाल की नियुक्ति प्रक्रिया, जिसे सरकार अपने नियंत्रण में लेना चाहती है।
    बड़ा काम है ... बड़ा फैसला है ... और बड़ा ही परिणाम सामने आयेगा... तो फिर छोटी-छोटी बातों पर तकरार करने के बजाय उन्हें दुरुस्त करने के रास्ते तलाशने होंगे ... और तलाशना होगा एक ऐसा मुकम्मल लोकपाल जो देश के संविधान...लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनता से ऊपर तानाशाही की नई मुसीबत खड़ी करने की बजाय उनकी गरिमा और स्वरूप को निखारे न कि ग्रहण लगाये।
  • कहीं देश के लिए आफत न बन जाये विशिष्ट पहचान पत्र (यूआईडी-आधार)......

    कहीं देश के लिए आफत न बन जाये विशिष्ट पहचान पत्र (यूआईडी-आधार)......

    भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने इसके लिए तीन कंपनियों को चुना-एसेंचर, महिंद्रा सत्यम-मोर्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन. इन तीनों कंपनियों पर ही इस कार्ड से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारियां हैं. इन तीनों कंपनियों पर ग़ौर करते हैं तो डर सा लगता है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं. इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनका अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रिश्ता रहा है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन अमेरिका की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनियों में से है, जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन और इलेक्ट्रानिक पासपोर्ट आदि जैसी चीजों को बेचती है. अमेरिका के होमलैंड सिक्यूरिटी डिपार्टमेंट और यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के सारे काम इसी कंपनी के पास हैं. यह पासपोर्ट से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक बनाकर देती है.
    ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी जैसे संगठनों से रहा है. अब सवाल यह है कि सरकार इस तरह की कंपनियों को भारत के लोगों की सारी जानकारियां देकर क्या करना चाहती है? एक तो ये कंपनियां पैसा कमाएंगी, साथ ही पूरे तंत्र पर इनका क़ब्ज़ा भी होगा. इस कार्ड के बनने के बाद समस्त भारतवासियों की जानकारियों का क्या-क्या दुरुपयोग हो सकता है, यह सोचकर ही किसी का भी दिमाग़ हिल जाएगा. समझने वाली बात यह है कि ये कंपनियां न स़िर्फ कार्ड बनाएंगी, बल्कि इस कार्ड को पढ़ने वाली मशीन भी बनाएंगी. सारा डाटाबेस इन कंपनियों के पास होगा, जिसका यह मनचाहा इस्तेमाल कर सकेंगी. यह एक खतरनाक स्थिति है.
    विकीलीक्स के हवाले से अमेरिका के एक केबल के बारे में ज़िक्र करते हुए यह लिखा कि लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे संगठन के आतंकवादी इस योजना का दुरुपयोग कर सकते हैं.
    वैसे सच्चाई क्या है, इसके बारे में आधार के चीफ नंदन नीलेकणी ने खुद ही बता दिया. जब वह नेल्सन कंपनी के कंज्यूमर 360 के कार्यक्रम में भाषण दे रहे थे तो उन्होंने बताया कि भारत के एक तिहाई कंज्यूमर बैंकिंग और सामाजिक सेवा की पहुंच से बाहर हैं. ये लोग ग़रीब हैं, इसलिए खुद बाज़ार तक नहीं पहुंच सकते. पहचान नंबर मिलते ही मोबाइल फोन के ज़रिए इन तक पहुंचा जा सकता है. इसी कार्यक्रम के दौरान नेल्सन कंपनी के अध्यक्ष ने कहा कि यूआईडी सिस्टम से कंपनियों को फायदा पहुंचेगा. बड़ी अजीब बात है, प्रधानमंत्री और सरकार की ओर से यह दलील दी जा रही है कि यूआईडी से पीडीएस सिस्टम दुरुस्त होगा, ग़रीबों को फायदा पहुंचेगा, लेकिन नंदन नीलेकणी ने तो असलियत बता दी कि देश का इतना पैसा उद्योगपतियों और बड़ी-बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च किया जा रहा है. बाज़ार को वैसे ही मुक्त कर दिया गया है. विदेशी कंपनियां भारत आ रही हैं, वह भी खुदरा बाज़ार में. तो क्या यह कोई साज़िश है, जिसमें सरकार के पैसे से विदेशी कंपनियों को ग़रीब उपभोक्ताओं तक पहुंचने का रास्ता दिखाया जा रहा है. बैंक, इंश्योरेंस कंपनियां और निजी कंपनियां यूआईडीएआई के डाटाबेस के ज़रिए वहां पहुंच जाएंगी, जहां पहुंचने के लिए उन्हें अरबों रुपये खर्च करने पड़ते. खबर यह भी है कि कुछ ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडर इस योजना के साथ जुड़ना चाहते हैं. अगर ऐसा होता है तो देश का हर नागरिक निजी कंपनियों के मार्केटिंग कैंपेन का हिस्सा बन जाएगा. यह देश की जनता के साथ किसी धोखे से कम नहीं है. अगर देशी और विदेशी कंपनियां यहां के बाज़ार तक पहुंचना चाहती हैं तो उन्हें इसका खर्च खुद वहन करना चाहिए. देश की जनता के पैसों से निजी कंपनियों के लिए रास्ता बनाने का औचित्य क्या है, सरकार क्यों पूरे देश को एक दुकान में तब्दील करने पर आमादा है?
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