Vineet Singh

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Vineet Singh

Vineet is Sr. Print and Broadcast Journalist, Author, Columnist, Strategist, Believer, Dreamer and Performer. who covers topics pertaining to Indian politics, Crime Higher Education, tourism, Archeology and Society. He is Presently Working with Leading Hindi News Paper.

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Started Career in Journalism As Trainee Reporter in Print Media and achieved Key Positions in Various Medium of Media Just Like Print, Electronic and Digital. As Journalist Exposed so many Scams like Pension Scheme, Scholarship Scheme and Drugs Mafia Network. During My Career Interviewed With Pm Narendra modi, Former PM Chandarshakhar, IK Gujral, VP Singh, Atal bihari vajpayee and so many National and International Political Leaders.I have also interviewed Dacoit Nirbhay Gujjar and Phoolan Devi.

work Experineces 18 Years As Journalist
Print Media 12 Year As Special correspondent With Rajasthan patrika, Outlook hindi, Danik Jagran, sahara samay
TV journalism 06 Year As Producer with CNEB, ANI, Janmat Tv (live india)
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PhD in Mass Communication and Master Degree in Journalism and Mass Communication And Ex Faculty, Department of Mass Communication and Journalism, Bareilly College bareilly india

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  • ये बैंक ले डूबेंगे !

    ये बैंक ले डूबेंगे !


    ग्रीस जैसी सरकारों के कारण बर्बाद होती बैंक हों या फिर बैंकों के कारण बर्बाद होती आयरलेंड या अमेरिका जैसी सरकारें, वित्तीय व्यवस्था की यह करिश्माई संस्था हमेशा संकट के शूत्रधारों में शामिल रही है।

     
    किसी भी देश की अर्थ व्यवस्था में वहां के बैंकों का अहम योगदान होता है क्योंकि यही वह संस्था है जिससे न सिर्फ छोटे से लेकर बड़े उद्यमियों की आर्थिक जरूरतें पूरी होती हैं बल्कि आम जनमानस किसी न किसी रूप में यहां पूंजी निवेश कर खुद को बेहद सुरक्षित महसूस करता है। बैंकिंग प्रणाली का यह रुपहला अंदाज बेहद आकर्षक है लेकिन जब किसी बैंक की तबियत बिगड़ती है तो न सिर्फ आम पूंजी निवेशक के माथे पर बल पड़ जाता है बल्कि देश की अर्थ व्यवस्था के लिए भी यह स्थिति बेहद चिंताजनक होती है।
    अमेरिका के सबसे बड़े बैंक लेहमन ब्रदर्स के डूबने पर दुनियां भर में जो हाहाकर मचा था उसे भला कैसे भूला जा सकता था। सिर्फ एक बैंक की माली हालत खराब हुई तो न सिर्फ अमेरिका बल्कि विश्व अर्थ व्यवस्था में फिर से मंदी के काले बादल छाने लगे थे। एक लम्बा अरसा बीत जाने के बाद भी लेहमन प्रभाव से विश्व बाजार अभी तक बाहर नहीं निकल सका है, रही बात अमेरिका की तो दुनिया के सबसे बडी आर्थिक विरासत लाख प्रयत्न करने के बावजूद कंगाली को टाल नहीं पा रही है। यकीनन बैंकों का मामला बेहद संगीन होता है।
    अमेरिकी या यूरोपियन बैंकों की ही बात क्यों की जाये भारतीय बैंकों ने भी जोखिम का ढेर सारा बारूद अपने इर्द-गिर्द जुटा रखा है, बस पलीते का इंतजार है। भारतीय बैंकिंग में शायद यह पहला मौका है जब दिनों-दिन गिरती औद्योगिक ग्रोथ, रसातल में जाता रुपया और मंहगाई के चलते फंसते कर्ज से लेकर घटते रिटर्न ऐसे जाग्रत ज्वाला मुखी बन कर उभरे हैं कि यदि इनमें विस्फोट हुआ तो न सिर्फ बैंक तबाह होंगे बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जायेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि यहां अधिकांश बैंक सरकारी हैं और इन बैंकों को अपनी जिस पूंजी के डूबने का डर सता रहा है वह भी सरकारी या अर्ध सरकारी योजनाओं को ही कर्ज के रूप में दी गयी है।
    बैंकिंग क्षेत्र के लिए यह खतरे की घंटी हाल ही में मूडीज के रेटिंग घटाने के बाद बजी। वैसे मूडीज ने यह रेटिंग यूं ही नहीं घटाई। इसकी सबसे बड़ी वजह बैंकों का गिरता एनपीए (अन उत्पादक खाते) है। बैंकों के पास ऐसे तमाम सरकारी और कॉर्पोरेट कर्जदार हैं जिन्हें बिगड़ते वैश्विक आर्थिक माहौल में कर्ज चुकाने में दिक्कतें आ रही हैं। इसी के चलते पिछली तिमाही में देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक का न सिर्फ मुनाफा 12 फीसदी गिरा बल्कि एनपीए में भी दो फीसदी की बढ़त दर्ज की गयी। सितम्बर के अंत तक देश के सभी 37 सूचीबद्ध बैंकों के एनपीए में 32 फीसदी तक की बढ़त दर्ज की गयी।
    ऐसा नहीं कि फंसे कर्ज की बीमारी सिर्फ सरकारी बैंकों को ही लगी हो इसका शिकार देश के निजी बैंक भी हो चुके हैं। आईडीबीआई कैपिटल की ताजा रिपोर्ट बताती है कि इस वित्त वर्ष की पहली छमाही में विभिन्न बैंकों में 345 अरब रुपये के कॉर्पोरेट कर्जों का भुगतान टालने (सीडीआर) की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पिछले साल यह आंकड़ा महज 51 अरब रुपये का था। इससे देना बैंक, यूको बैंक और इंडियन बैंक की माली हालत को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचना है। यदि केयर की रिपोर्ट पर यकीन किया जाये तो विमानन, माइक्रोफाइनेंस, अचल समप्ति और बिजली कम्पनियां सबसे ज्यादा मुश्किल में हैं। यदि इनके कर्जों का पुनर्गठन कर भी दिया जाता है तब भी 15 फीसदी कर्ज बैंकों मिलते नहीं दिख रहे।
    मंदी की मार का दंश झेलना भले ही मजबूरी हो सकता है लेकिन उन सरकारी या अर्ध सरकारी संस्थानों के बारे में क्या कहा जाये जो लगातार सरकार से आर्थिक लाभ उठाने के बावजूद हमेशा घाटा ही दिखाते हैं। घाटे के इन संस्थानों में सबसे ऊपर आते हैं बिजली बोर्ड। रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य बिजली बोर्डों पर सरकारी बैंकों का कर्ज बीती जून में 2,92,342 करोड़ रुपये से ऊपर निकल गया था। इतने बड़े घाटे को देखकर आधा दर्जन से अधिक बैंकों की जान सूख रही है। वहीं नवम्बर की शुरूआत होते-होते इलाहबाद बैंक ने बिजली बोर्डों को और कर्ज न देने का साफ ऐलान ही कर दिया। अब बिजली बोर्डों के डिफाल्टर होने का खतरा बेहद पुख्ता होता जा रहा है इसलिए बैंकों ने इस बकाये का पुनर्गठन यानि वसूली टालने की कार्रवाई शुरू कर दी है। पंजाब नेशनल बैंक ने पिछली तिमाही में तमिलनाडु बिजली बोर्ड के करीब 1,800 करोड़ रुपये के कर्ज का पुनर्गठन किया था।
    बैंकों की स्थिति पर वित्त मंत्रालय की ही रिपोर्ट बताती है कि बिजली के झटके सबसे ज्यादा पंजाब नेशनल बैंक, इलाहबाद बैंक, ओरियंटल बैंक, यूको बैंक और सेंट्रल बैंक सहित करीब छह सरकारी बैंकों को सबसे ज्यादा लग रहे हैं। बिजली बोर्डों को अकले पंजाब नेशनल बैंक ने अपने कुल देय का सात फीसदी और इलाहबाद बैंक ने 13 फीसदी का हिस्सा दे रखा है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2009 से लेकर मार्च 2011 के बीच बुनियादी ढ़ांचा क्षेत्रों को बैंक कर्ज में अकेले बिजली क्षेत्र का हिस्सा 42 फीसदी के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुका है। इस हैरतंगेज तरीके से बांटे गये कर्ज पर बैंकों को सबसे ज्यादा चिंता तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बिहार और हरियाणा के बिजली बोर्डों को लेकर है।
    बकौल रेटिंग एजेंसी क्रिसिल भारतीय बैंकें बेहद खतरनाक मोड़ पर खड़ी हैं क्योंकि इन्हें सरकारी एवं अर्ध सरकारी क्षेत्र ही नहीं बड़े कॉर्पोरेट हाउसों को दिये गये लोन पटते नहीं दिख रहे इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अगले तीन सालों में लगातार बड़े राज्यों और देश में होने वाले चुनाव हैं। इसलिए सरकारें कर्ज की उगाही से ज्यादा लोन माफ करने की अपनी लोकलुभावनी या यूं कहें कि अर्थ व्यवस्था डुवाबनी कर्ज माफी घोषणाएं करेंगे। जिससे न सिर्फ बिजली बोर्डों की बेलेंस सीट रसातल में जायेगी बल्कि बैंकों को भी धक्के खाने होंगे।
    ताजा फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट पर नजर डालें तो बैंकों के लिए मंदी की मार और बिजली के झटके ही नहीं कांपती जमीन भी किसी बड़ी सुनामी के संकेत दे रही है। इर रिपोर्ट के मुताबित अचल सम्पत्तियों पर फंसे हुए कर्ज बढ़ने की रफ्तार 20 फीसदी से ज्यादा बढ़ती जा रही है। कॉमर्शियल प्रापर्टी में एनपीए 71 फीसदी की गति से बढ़ रहे हैं। देश की सबसे बड़ी रियल स्टेट कम्पनी डीएलएफ, यूनिटेक और एचडीआईएल जैसे प्रमुख संस्थान गले तक कर्ज में डूबे हैं। रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर यकीन करें तो रियल स्टेट कारोबारी 1.22 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दबाये बैठे हैं। अकेले डीएलएफ का कर्ज पिछली तिमाही में 1000 करोड़ रपये से बढ़कर 22,000 करोड़ रुपये की सीमा को लांघ चुका है। वहीं कम्पनी की बेलेंस सीट बताती है कि उसका मुनाफा 11 फीसदी गिरा है। लेकिन इसे हमारी आर्थिक नीतियों का दोष कहें या लाभ की राजनितिक लालसा इतने बड़े कर्ज के बावजूद रिजर्व बैंक के सारे नियम कानूनों को ताक पर रखकर डीएलएफ को देश के नामी सरकारी बैंकों ने फिर से नया कर्ज देने में देर नहीं लगाई।
    इतनी पतली हालत के बावजूद यदि सरकार की चली तो जमा ब्याद दर बढ़ाने का उसका इरादा बैंकों के लिए बेहद जोखिम भरा होगा। फिलहाल देश की पूरी बैंकिग प्रणाली में कुल जमा का आकार 14.46 खरब रुपये का है यदि ब्याज दर एक फीसदी भी बढ़ती है तो जमा पर बैंक को 14,000 करोड़ रुपये अतरिक्त देना होगा। कुल मिलाकर देश के आधे से भी ज्यादा बैंक गंभीर खतरे में फंसे हुए हैं जिनमें ज्यादातर सरकार द्वारा नियंत्रित हैं। यदि हालात यही रहे तो निश्चित ही सरकार को अगले छह महीनों में बैंकों के लिए अमेरिका के लेहमन ब्रदर्स की तरह बेलआउट पैकेज की घोषणा करनी पड़ेगी।
    वरिष्ठ अर्थशास्त्री रमेश जैन बैंकों की इस हालात के लिए देश में चल रही घाटे की अर्थव्यवस्था के मॉडल को जिम्मेदार मानते हैं। उनके मुताबिक घाटे की अर्थ व्यवस्था का सबसे बड़ा घाटा यह है कि पैसा जुटाने के लिए दिखाये जाने वाले घाटे के चक्कर में असल मुनाफा तो लुप्त हो ही जाता है वहीं भ्रष्टाचार के चलते बढ़ने वाला घाटा व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है।
  • ढ़ह गया “आधार”!

    ढ़ह गया “आधार”!

    खोखली नींव पर टिका आधार आखिरकार ढ़ह ही गया। भारतीय आवाम की जिन चिंताओं को जल्दबाज और दंभी यूपीए सरकार ने दरकिनार कर दिया था, उन्हीं सरोकारों को आधार बनाकर संसद की स्थाई समिति ने नागरिकों की विशिष्ट पहचान वाली कथित महत्वाकांक्षी परियोजना को न सिर्फ गैर जरूरी बल्कि बेहद खर्चीली, गैर योजनाबद्ध और असुरक्षित बता सिरे से खारिज कर दिया।
    आजादी के बाद से ही आम आदमी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयास सरकारें करती आ रही हैं। राशन कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसी योजनाओं इसी मुहिम का एक हिस्सा थीं लेकिन एक व्यक्ति की दर्जनों पहचान और इनमें होने वाली खामियों के चलते हर बार एक और नई स्पष्ट एवं स्थाई योजना की आवश्यक्ता महसूस की जाती रही।
    वर्ष 2001 में अमेरिका ने प्रवासी नागरिकों पर नकेल कसने के इरादे से इनकी विशिष्ट पहचान का डाटा एकत्र करना शुरू किया। इस योजना में फिंगर प्रिंट, रेटीना स्केन सहित अन्य सभी पहचान पत्रों का विवरण एक ही स्थान पर एकत्र कर प्रवासियों को उनकी नई पहचान का दस्तावेज सौंपा गया जो हर समय उन्हें अपने साथ रखना था और जरूरत पड़ने पर अपनी पहचान साबित करनी थी। सिर्फ बीस फीसदी आबादी को इस तरह की विशिष्ट पहचान देने के पीछे अमेरिकी सरकार की मंशा वहां होने वाले अपराधों और पहचान सम्बधीं जटिताओं पर नियंत्रण करना था।
    इस योजना से प्रभावित होकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसी ही योजना को भारत में लागू कराने का प्रयास किया। वाजपेयी की पहल पर उनकी कैबिनेट ने इस योजना को मंजूरी भी दे दी थी लेकिन उससे पहले इससे सम्बंधित सभी संदेहों और समस्याओं के निस्तारण कर यूआईडी का भारतीय वर्जन तैयार करने पर कैबिनेट ने जोर दिया जिसे स्वीकार भी कर लिया गया लेकिन अगले चुनावों में भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की हार के साथ ही यह योजना ठंडे बस्ते में डाल दी गयी।
    यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में जब मनमोहन सिंह फिर से प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण बनाकर इस योजना के क्रियान्वयन की पुनः शुरुआत कर दी लेकिन वाजपेयी कैबिनेट की सुरक्षा और संरक्षा सम्बंधी शंकाओं का निवारण करना तो दूर उन पर अपनी कैबिनेट में चर्चा तक नहीं की गयी और ना ही इस योजना को शुरू करने के लिए संसद की इजाजत ही ली गयी। इतना ही नहीं प्राधिकरण की कमान औद्योगिक घरानों के हाथ में थमाकर उन्होंने इस योजना के दुरुपयोग की शंकाओं को और मजबूत कर दिया। जानकारों ने तो यहां तक कह दिया कि इस योजना को जल्दबाजी में इसलिए शुरु किया क्योंकि इसमें देश की बड़ी पूंजी निवेश कर औद्योगिक-प्रौद्योगिक हित साधने की असीम संभावनाएं अंतनिर्हित हैं। इस प्राधिकरण का अध्यक्ष एक औद्योगिक घराने के सीईओ नंदन नीलकेणी को बनाकर, तत्काल उन्हं 6600 करोड़ रूपए की धन राशि सुपुर्द कर दी गई। बाद में इस राशि को बढ़ाकर 17900 करोड़ रूपए कर दिया गया। जब यह योजना अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचेगी तब अर्थशास्त्रियों के एक अनुमान के मुताबिक इस पर कुल खर्च डेढ़ लाख करोड़ रुपए होंगे।
    इसके बावजूद तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए मई 2010 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के नंदूरबार जिले के थेंभली गांव से यूनीक आइडेंटिफिकेशन नंबर वाली योजना को 'आधार' नाम से लॉन्च किया। लॉन्चिंग के मौके पर प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के 10 गांवों को यूआईडी नंबर दिए। इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि आधार प्रोजेक्ट अपने तय समय से 4 महीने पहले ही शुरू हो गया था।
    'आधार' की लॉन्चिंग के मौके पर प्रधानमंत्री से लेकर सोनिया गांधी, नीलकेणी और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया तक ने यूआईडी को एक अनोखा आईडी प्रूफ बताते हुआ कहा था कि इससे सबसे ज्यादा फायदा गरीब तबके का होगा, जो कोई आइंडेटिटी प्रूफ न होने की वजह से बैंकिंग के साथ-साथ सरकार की तमाम स्कीमों का फायदा नहीं उठा पा रहा है। आधार के बाद लोगों को अलग-अलग पहचान पत्र रखने की जरूरत नहीं होगी।
    आधार की लॉचिंग के साथ ही विवादों का पिटारा खुलना शुरु हो गया। सबसे पहली आपत्ति रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (आरजीआई) ने प्राधिकरण के काम काज के तरीके पर दर्ज कराई। आरजीआई ने यूआईडी के कामकाज पर नाराजगी जताते हुए कहा कि वह बैंक या बीमा कंपनियों से सीधे तौर पर डाटा इकट्ठा कर सभी को यूआईडी नंबर मुहैया न कराए। बल्कि इसके लिए प्राधिकरण को आरजीआई के डाटा का उपयोग करना चाहिए। जिससे न सिर्फ करोड़ों रुपये की बर्बादी रुकेगी बल्कि फर्जीवाडे पर भी रोक लगेगी। आरजीआई की आपत्ति में दम भी था क्योंकि जिस कार्य के लिए देश की दो बड़ी एजेंसियां पहले से ही अरबों रुपये फूंक चुकी हों उसके लिए फिर नये सिरे से कवायद करना गैर जरूरी ही है। वहीं फर्जी बाडे की संभावना को भी नहीं नकारा जा सकता।
    आरजीआई की आपत्ति से गर्माया माहौल अभी तक शांत भी नहीं हुआ था कि गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने सुरक्षा सम्बंधी चिंताएं जताकर आधार की चूलें ही हिला दीं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को भेजे पत्र में चिदंबरम ने साफ-साफ कह दिया कि यूआईडीएआई द्वारा एकत्र डाटा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से राष्ट्रीय आबादी रजिस्टर के तहत आवश्यक आश्वासनों पर खरा नहीं उतरता। इसी के साथ बिना किसी जांच के दर्ज किये जा रहे आंकड़ों से न सिर्फ नागरिकों की पहचान को खतरा उत्पन्न होगा बल्कि घुसपैठियों को रोकना भी असम्भव हो जायेगा।
    सुरक्षा सम्बंधी जो चिंताएं चिदम्बरम ने जाहिर की थीं वह पहले से ही विद्यमान थीं।
    भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने पूरे काम के लिए तीन कंपनियों को चुना-एसेंचर, महिंद्रा-सत्यम-मोर्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन। इन तीनों कंपनियों पर ही इस कार्ड से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारियां हैं और जब इन तीनों कंपनियों पर ग़ौर करते हैं तो डर सा लगता है। एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं, इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनका अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रिश्ता रहा है। एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन अमेरिका की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनियों में से है, जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन और इलेक्ट्रानिक पासपोर्ट आदि जैसी चीजों को बेचती है। अमेरिका के होमलैंड सिक्यूरिटी डिपार्टमेंट और यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के सारे काम इसी कंपनी के पास हैं, यह पासपोर्ट से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक बनाकर देती है।
    अब सवाल यह है कि सरकार इस तरह की कंपनियों को भारत के लोगों की सारी जानकारियां देकर क्या करना चाहती है? एक तो ये कंपनियां पैसा कमाएंगी, साथ ही पूरे तंत्र पर इनका क़ब्ज़ा भी होगा। इस कार्ड के बनने के बाद समस्त भारतवासियों की जानकारियों का क्या-क्या दुरुपयोग हो सकता है, यह सोचकर ही किसी का भी दिमाग़ हिल जाता है। समझने वाली बात यह है कि ये कंपनियां न स़िर्फ कार्ड बनाएंगी, बल्कि इस कार्ड को पढ़ने वाली मशीन भी बनाएंगी। सारा डाटाबेस इन कंपनियों के पास होगा, जिसका यह मनचाहा इस्तेमाल कर सकेंगी जो एक खतरनाक स्थिति होगी।
    विकीलीक्स के हवाले से अमेरिका के एक केबल के बारे में ज़िक्र करते हुए यह लिखा कि लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे संगठन के आतंकवादी इस योजना का दुरुपयोग कर सकते हैं.

    वैसे सच्चाई क्या है, इसके बारे में आधार के चीफ नंदन नीलेकणी ने खुद ही बता दिया। जब वह नेल्सन कंपनी के कंज्यूमर 360 के कार्यक्रम में भाषण दे रहे थे तो उन्होंने बताया कि भारत के एक तिहाई कंज्यूमर बैंकिंग और सामाजिक सेवा की पहुंच से बाहर हैं। ये लोग ग़रीब हैं, इसलिए खुद बाज़ार तक नहीं पहुंच सकते। पहचान नंबर मिलते ही मोबाइल फोन के ज़रिए इन तक पहुंचा जा सकता है। इसी कार्यक्रम के दौरान नेल्सन कंपनी के अध्यक्ष ने कहा कि यूआईडी सिस्टम से कंपनियों को फायदा पहुंचेगा।
     बड़ी अजीब बात है प्रधानमंत्री और सरकार की ओर से यह दलील दी जा रही है कि यूआईडी से पीडीएस सिस्टम दुरुस्त होगा, ग़रीबों को फायदा पहुंचेगा, लेकिन नंदन नीलेकणी ने तो असलियत बता दी कि देश का इतना पैसा उद्योगपतियों और बड़ी-बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च किया जा रहा है, बाज़ार को वैसे ही मुक्त कर दिया गया है। विदेशी कंपनियां भारत आ रही हैं, वह भी खुदरा बाज़ार में, तो क्या यह कोई साज़िश है, जिसमें सरकार के पैसे से विदेशी कंपनियों को ग़रीब उपभोक्ताओं तक पहुंचने का रास्ता दिखाया जा रहा है। बैंक, इंश्योरेंस कंपनियां और निजी कंपनियां यूआईडीएआई के डाटाबेस के ज़रिए वहां पहुंच जाएंगी, जहां पहुंचने के लिए उन्हें अरबों रुपये खर्च करने पड़ते।
    खबर यह भी थी कि कुछ ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडर इस योजना के साथ जुड़ना चाहते थे अगर ऐसा होता तो देश का हर नागरिक निजी कंपनियों के मार्केटिंग कैंपेन का हिस्सा बन जाता जो देश की जनता के साथ किसी धोखे से कम नहीं होता। अगर देशी और विदेशी कंपनियां यहां के बाज़ार तक पहुंचना चाहती हैं तो उन्हें इसका खर्च खुद वहन करना चाहिए। देश की जनता के पैसों से निजी कंपनियों के लिए रास्ता बनाने का औचित्य क्या है, सरकार क्यों पूरे देश को एक दुकान में तब्दील करने पर आमादा है?
    यही वह तमाम आपत्तियां रहीं जिसके चलते वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने विशिष्ट पहचान पत्र (यूआईडी) संबंधी बिल को खारिज कर दिया। पूर्व वित्त मंत्री और विपक्ष के नेता यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता में गठित समिति ने नेशनल आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनआईए बिल), 2010 को इन्हीं तमाम बिंदुओं पर खरा नहीं उतरने की वजह से खारिज कर दिया। एक ही तरह के कामकाज दो संस्थाओं के जरिए होने, सुरक्षा कारणों से ऐतराज और एनआईए बिल पर गंभीर मतभेदों की वजह से ऐसा किया गया। समिति के सदस्य प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को दिशाहीन बताने से भी नहीं चूके। समिति ने बिल के मौजूदा स्वरूप और इस परियोजना को स्वीकार करने योग्य नहीं माना है और सरकार को इसकी समीक्षा के बाद नया बिल तैयार करने की बात कही है।
    इतनी आपत्तियों और विरोध के बावजूद यदि सरकार समिति की सिफारिशों को नहीं मानती है तो इससे न सिर्फ राजनीतिक माहौल फिर से गर्मायेगा बल्कि देश की सुरक्षा और आम नागरिक के मूल अधिकारों का हनन भी माना जायेगा। वहीं दूसरा पहलू यह भी है कि यदि समिति की सिफारिशों को मानकर आधार को बंद कर दिया जाता है तो अब तक खर्च हुए 556 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई कौन करेगा। सरकार, कांग्रेस या फिर वह निजी कम्पनियां जो इस योजना से मौटा मुनाफा कमाने के साथ भविष्य में होने वाले मुनाफे की व्यूह रचना कर रहीं थीं।


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