Vineet Singh

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Vineet Singh

Vineet is Sr. Print and Broadcast Journalist, Author, Columnist, Strategist, Believer, Dreamer and Performer. who covers topics pertaining to Indian politics, Crime Higher Education, tourism, Archeology and Society. He is Presently Working with Leading Hindi News Paper.

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  • vineet.singh@in.patrika.com
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Professional Experineces

Started Career in Journalism As Trainee Reporter in Print Media and achieved Key Positions in Various Medium of Media Just Like Print, Electronic and Digital. As Journalist Exposed so many Scams like Pension Scheme, Scholarship Scheme and Drugs Mafia Network. During My Career Interviewed With Pm Narendra modi, Former PM Chandarshakhar, IK Gujral, VP Singh, Atal bihari vajpayee and so many National and International Political Leaders.I have also interviewed Dacoit Nirbhay Gujjar and Phoolan Devi.

work Experineces 18 Years As Journalist
Print Media 12 Year As Special correspondent With Rajasthan patrika, Outlook hindi, Danik Jagran, sahara samay
TV journalism 06 Year As Producer with CNEB, ANI, Janmat Tv (live india)
Digital media work with rajasthan patrika last 2 year

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Coverage for Rajasthan Patrika,Dainik Jagran,India Today,Live India, CNEB News, Outlook Hindi, ANI etc.

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PhD in Mass Communication and Master Degree in Journalism and Mass Communication And Ex Faculty, Department of Mass Communication and Journalism, Bareilly College bareilly india

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  • "कलम से कोर्ट तक "............................................... दो दशक की लड़ाई, अखबार मालिकों को औकात बताई

    "कलम से कोर्ट तक "............................................... दो दशक की लड़ाई, अखबार मालिकों को औकात बताई



    वर्तमान संदर्भ में बात की जाये तो शायद ही कोई मीडिया संस्थान होगा जिसके कर्मचारी यानी तथाकथित पत्रकार नौकरी के लिए मालिकों के आगे पूंछ हिलाते न दिखें। नौकरी बचाने के दबाव में कलम का सिपाही को खुलेआम दलाल की भूमिका निभाते देखना आम बात हो गयी है। 
    एक दौर ऐसा भी था जब सम्पादक की बात तो दूर छोटे से पत्रकार को भी सीधे आदेश देने में अखबार मालिक या प्रबंधकों के पसीने छूट जाते थे। दौर बदला कलम के सिपाही की भूमिका बदली और मिशन के इरादे शुरू हुआ काम धंधा बन गया लेकिन कुछ लोग अभी बिकने को तैयार नहीं चाहे उसके लिए उन्हें कितने भी दबाव झेलने पड़ें या कष्टमयी जीवन संघर्ष क्यों न करना पड़े। इसी की एक बानगी है डॉ. बचन सिंह सिकरवार जिन्होंने देश के प्रमुख हिन्दी अखबार अमर उजाला के मालिकों के आगे घुटने टेकने से न सिर्फ साफ इन्कार कर दिया बल्कि सम्पादकीय प्रभारी रहते हुए जन हित की खबरों को नित नयी ऊंचाई देना शुरू कर दिया। मालिकों ने बिना कारण बताये उन्हें कई अन्य कलमकारों के साथ नौकरी से बाहर निकाल फेंका लेकिन पत्रकारों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले इस सिपाही ने मालिकों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंक दिया। 
    बीस साल से भी अधिक समय तक चले इस संघर्ष में साथियों ने मालिकों से समझौते कर हथियार डालने में अपनी भलाई समझी वहीं पत्रकारों को इंसाफ दिलाने के नाम पर लालाओं और सरकारों के बीच दलाल की भूमिका निभा रही तथाकथित पत्रकार यूनियनों ने उन्हें खुद से अलग करना ही बेहतर समझा। डॉ. सिकरवार फिर भी नहीं झुके और बीस साल तक अखबार मालिकों से लड़ते रहे और अंततः शानदार जीत दर्ज की। यह जीत किसी एक इंसान की नहीं और ना ही यह हार है उन मौकापरस्त मित्रों, अखबार मालिकों और पत्रकार संगठनों की जिन्होंने कभी ईमानदारी से पत्रकारों का हित नहीं देखा बल्कि मिसाल है हालिया नौजवान पीढ़ी के लिए कि मान-सम्मान और देश का लोकतंत्र- पत्रकारिता के मिशन को बचाये रखना है तो घुटने टेकने की बजाय संघर्ष करो। जनता का काम जनता के द्वारा और जनता के हित में यही मूल मंत्र है इस जीत का।
    एक कलम के सिपाही की अखबार मालिकों पर दर्ज हुई पहली जीत की विस्तृत जानकारी इस प्रकार हैः-  इलाहाबाद ३अप्रैल। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री सुधीर अग्रवाल ने उ.प्र.औद्योगिक अधिनियम,१९४७(श्रम न्यायालय के आदेश/अधिनिर्णय )के अन्तर्गत कोई अट्ठारह वर्ष से अधिक पुराने मैसर्स अमर उजाला पब्लिकेशन बनाम अधिष्ठाता अधिकारी,श्रम न्यायालय आगरा तथा अन्य के मामले में श्रम न्यायालय ,आगरा के पत्रकार बचन सिंह सिकरवार को निलम्बन काल के निर्वाह भत्ता देने के निर्णय को उचित मानते हुए मैसर्स अमर उजाला पब्लिकेशन' पर पाँच हजार रुपए खर्चा देने का आदेश पारित करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी है।'
    न्यायमूर्ति श्री सुधीर अग्रवाल ने मैसर्स-अमर उजाला पब्लिकेशन द्वारा दायर याचिका सी. संख्या-११२७८/१९९३ की गत ३ अप्रैल को सुनवायी करते हुए श्रम न्यायालय, आगरा के ६ फरवरी, १९९३ के उस निर्णय का सही ठहराते हुए याचिका को निरस्त कर दिया है इसमें उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स,आगरा शाखा के जिलाध्यक्ष एवं दैनिक अमर उजाला कर्मचारी संघ ' के उपाध्यक्ष, अमर उजाला के सम्पादकीय लेखक रहे डॉ.बचन सिंह सिकरवार के निर्वाह भत्ते के वाद में श्रमिक को निर्वाह दिये जाने का आदेश पारित किया था। अपने निर्णय में  माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने  मै.अमर उजाला पब्लिकेशन' के निर्वाह भत्ता न दिये जाने के पक्ष में दी गयी सभी दलीलों को निरस्त किया है। माननीय उच्च न्यायालय ने कहा कि उसका मानना है कि श्रम न्यायालय को पुनर्विचार का अधिकार नहीं है। लेकिन वह पाता है कि श्रम न्यायालय ने मै.अमर उजाला पब्लिकेशन'को श्रमिक को निर्वाह भत्ता देने का निर्देश देकर न्याय किया है। नियोक्ता के  ऐसे  निलम्बन को सर्वाच्च न्यायालय ने ओ.पी.गुप्ता बनाम भारत संघ एआइआर १९८७एससी २२५७ तथा महाराष्ट्र राज्य बनाम चन्द्रभान ताले (१९८३) ३ एससीसी ३८७ मामलों में अत्यन्त निंदनीय माना है, जहाँ नियोक्ता निलम्बित श्रमिक को किसी भी प्रकार का निर्वाह भत्ता न देकर भूखा मरने को छोड़ देता है। उपरोक्त विमर्श को दृष्टिगत रखते हुए उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद २२६ के अन्तर्गत दाखिल याचिका के मामले में श्रम न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप करने का प्राप्त विशेष
    क्षेत्राधिकार का उपयोग करने का कोई कारण नहीं पाता है। अतः याचिका ५ हजार रुपए खर्च के साथ खारिज की जाती है। 
    ज्ञातव्य है कि श्रम न्यायालय के ६फरवरी ,१९९३ निर्णय के खिलाफ मै.अमर उजाला पब्लिकेशन ने ३१ दिसम्बर, १९९३ में याचिका दायर की, जिसमें उसे अस्थायी स्थगन आदेश मिल गया था। इस याचिका में मै.अमर उजाला पब्लिकेशन' की ओर से यह आपत्ति की गयी कि श्रमिक ने अपने निलम्बन काल में उसके आदेश के बाद भी हाजिरी नहीं लगायी थी। इस कारण वह निर्वाह भत्ता प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है। इसके बाद १७ साल बाद माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री कृष्ण मुरारी ने गत २८.१०.२०१० के अपने निर्णय में मैसर्स अमर उजाला पब्लिकेशन की याचिका को बहुत समय बीत जाने के कारण खारिज कर दिया था। तदोपरान्त डॉ.सिकरवार ने ८.२.२०११ को मै.अमर उजाला पब्लिकेशन को माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के २८.१०.२०१० के निर्णय के प्रति भेजते हुए अपने रुके हुए निर्वाह भत्ते के भुगतान का नोटिस भेजा। इस पर मै. अमर उजाला ने पुनः माननीय उच्च न्यायालय में यह प्रार्थना करते हुए उक्त याचिका पर पुनर्विचार की प्रार्थना की, उनके अधिवक्ता विजय बहादुर सिंह सीनियर अधिवक्ता हैं। २८.१०.२०१०को उन्होंने अपनी बीमार होने की सूचना न्यायालय को भिजवायी थी, किन्तु न्यायालय ने याचिका को इन्फ्रक्चूअस करार देते हुए खारिज कर दिया। इसलिए न्यायहित में उस पर पुनर्विचार किया जाए, अन्यथा अपूरणीय क्षति होगी।  उसके नये अधिवक्ता श्री चन्द्रभान गुप्ता हैं जो उनकी कम्पनी के दूसरे मामले भी
    देखते हैं।  
     वस्तुतः आगरा से प्रकाशित दैनिक अमर उजाला में श्रम कानूनों तथा वेतन आयोगों की संस्तुतियों का लगातार उल्लंघन हो रहा था जिससे पत्रकारों तथा दूसरे प्रेस कर्मियों में असन्तोष तथा आक्रोश व्याप्त था। परिणामतः अपने शोषण से छुटकारा पाने के लिए पत्रकारों तथा प्रेस कर्मियों ने सन्‌ १९९० में अमर उजाला कर्मचारी संघ' का गठन किया। इस संगठन की ओर से समाचार पत्र स्वामी और उपश्रमायुक्त को माँगपत्र दिये गए। इससे कुपित होकर समाचार पत्र स्वामियों ने संगठन के पदाधिकारियों का विभिन्न प्रकार से उत्पीड़न शुरू कर दिया। इसी कड़ी में अमर उजाला कर्मचारी संघ' के अध्यक्ष श्री उपेन्द्र शर्मा का मुरादाबाद स्थानान्तरण कर दिया गया। उपाध्यक्ष डॉ.बचन सिंह सिकरवार को दण्डित करने के इरादे से पहले उनसे सम्पादकीय लेखन, फिर हर सोमवार को प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक कॉलम देशदेशान्तर' का लिखाना बन्द करा दिया। तत्पश्चात उनसे सम्पादकीय पृष्ठ पर छपने वाले लेखों का चयन का कार्य भी छीन लिया गया। फिर फर्जी विवाद दिखाकर बचन सिंह सिकरवार को निलम्बित कर दिया गया। इसके पश्चात कोई डेढ़ साल तक निरन्तर अमर उजाला कार्यालय के दरवाजे पर हाजिरी लगाने के बाद उन्हें केवल एक माह निर्वाह भत्ता दिया। इसके लिए यह झूठा बहाना बनाया कि उन्होंने हाजिरी नहीं लगायी है इसलिए उन्हें निर्वाह भत्ता नहीं दे रहे हैं।  
     इस बीच मै.अमर उजाला पब्लिकेशन ने डॉ.बचन सिंह सिकरवार की सेवा समाप्ति के लिए अनुमोदन प्राप्त करने हेतु वाद संख्या २/१९९२ उ.प्र.औद्योगिक विवाद अधिनियम,१९४७की धारा ६-इ (३)के अन्तर्गत श्रम न्यायालय, आगरा में वाद दायर किया। जब उसमें अफलता मिलती दिखी, तो उस वाद को वापस लेने की अर्जी डाल दी। इस पर श्रम न्यायालय ने इस शर्त के साथ कि वह न्यायालय की पूर्व अनुमति के बगैर श्रमिक बचन सिंह सिकरवार का न तो स्थानान्तरण कर सकता, न पदावनती  और न ही  सेवा से पृथक कर सकता है। इसके बावजूद मैं.अमर उजाला पब्लिकेशन से श्रम न्यायालय, आगरा निर्देश की अवहेलना करते हुए घरेलू जाँच में दोषी पाये जाने के मनमाने निर्णय की आड़ में १७.६.१९९५ को सेवाएँ समाप्त करते हुए उनके सभी प्रकार के देय वेतन-भत्ते जब्त कर लिए। अभी डॉ. बचन सिंह सिकरवार ने अनुचित एवं अवैधानिक रूप से अपनी सेवा समाप्ति के खिलाफ मै.अमर उजाला पब्लिकेशन' से श्रम न्यायालय ,आगरा  में  विविध  वाद संख्या-३४७/२०३ चलाया हुआ है।
    डॉ. बचन सिंह सिकरवार के पक्ष में हुए उक्त निर्णय को पत्रकारों ने सच्चाई की जीत बताया है उनका कहना है कि दुनिया देर जरूर है अन्धेर नहीं है। ताज प्रेस क्लब,आगरा के महामंत्री डॉ.उपेन्द्र शर्मा ने इस निर्णय पर प्रसन्नता व्यक्त की है। उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसियेशन (उपजा) आगरा शाखा  के उपाध्यक्ष अनिल गर्ग, महामंत्री सुनीत शर्मा, सचिव  धर्मेन्द्र चौधरी, डॉ.धर्मवीर सिंह चाहर, रामकुमार अग्रवाल ,वीरेन्द्र वार्ष्णेय ,विनोद अग्रवाल, हरी नारायन गुप्ता,विनीत सिंह, डॉ.अनुज सिंह सिकरवार, अपूर्व सिंह , रामकृपाल सिंह , धर्मवीर शर्मा आदि ने भी हर्ष व्यक्त किया है।

  • धरोहरों का संरक्षण....

    धरोहरों का संरक्षण....



    जैसे कल की ही बात हो, छोटी सी कोमल मिट्टी के ढ़ेर पर बैठी बड़े जतन से घरौंदा बनाने में जुटी थी। कोमल की उम्र की तरह ही उसकी दुनियां भी बहुत छोटी थी जहां उसके मां-बाप के साथ कुछ छैनी-हथोड़े ही बसते थे। राजस्थान के छोटे से गांव में जब कोमल ने होश संभाला तो उसके कानों ने मां की आवाज से पहले पत्थरों को तराशते इन्हीं छैनी-हथोड़े की आवाज सुनी थी। गांव में अकाल पड़ा...न रोटी मिली न पानी...पूरा परिवार दाने-पानी की तलाश में दिल्ली की ओर पलायन कर गया। किसी को नहीं पता था कि जिस रास्ते पर वह चल पड़े हैं वहां न सिर्फ उन्हें काम मिलेगा बल्कि उनकी नन्ही सी कोमल को नई पहचान भी मिलने वाली है।
    दिल्ली पहुंच कर कोमल के पिता सुन्दर को उनके एक रिस्तेदार ने आदिलाबाद किले में चल रहे जीर्णोद्धार के कार्य में पत्थर तराशने का काम दिला दिया। धूल-मिट्टी में खेलते मजदूरों के बच्चों को देख एक दिन अधीक्षण पुरातत्व अधिकारी मोहम्मद के.के. मन में इनके भविष्य की चिंता घर कर गयी। यहीं से शुरुआत हुई कोमल और उसके जैसे हजारों प्रवासी मजदूरों के बच्चों की नई जिंदगी की, जिनके मां-बाप देश की धरोहर बचाने में दिन रात जुटे थे लेकिन उसकी कीमत चुका रहे थे वो अपने बच्चों के भविष्य को अंधकार में झोंककर।
    मोहम्मद के.के. ने साथी अधिकारियों के साथ मिलकर इन बच्चों को न सिर्फ पढ़ाने का बल्कि उनके लिए स्कूल ड्रेस सहित बाकी कपड़ों का इंतजाम भी किया। वर्ष 2008 में दिल्ली के आदिलाबाद किले से हुई यह शुरुआत तुगलकाबाद, कुतुब मीनार, पुराना किला, लाल किला और फिर सफदरजंग के मकबरे तक फैल गयी। जहां स्मारकों के संरक्षण में लगे मजदूरों के एक हजार से अधिक बच्चों को अब तक हिन्दी, अंग्रेजी और गणित विषय के आधारभूत ज्ञान की शिक्षा दी जा चुकी है। इस मुहिम में करीब तीन सौ मजदूर भी अक्षर ज्ञान हासिल कर चुके हैं।
    ऐतिहासिक धरोहरों की खोज और उनके जीर्णोद्धार में लगे पुरातत्वविदों द्वारा देश के भावी भविष्य के संरक्षण की इस मुहिम को वर्ष 2011 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा ने भी काफी सराहा। भारत आये ओबामा को जब इस मुहिम की खबर लगी तो वह अपने प्रोटोकॉल को तोड़ कर इन बच्चों से मिलने पहुंच गये और भाव-विभोर होकर टूटी-फूटी हिन्दी में बस इतना ही बोल सके ऐसे ही पढ़ते रहो और आगे बढ़ते रहो।
    बजट खत्म होने के कारण स्मारकों के जीर्णोद्धार का काम अगले वित्त वर्ष तक फिलहाल रोक दिया गया है। कोमल भी अपने गांव वापस लौट रही है लेकिन अब उसके हाथ में मिट्टी का घरोंदा नहीं बल्कि एक किताब है।

    अनूठा रेप्लिका म्यूजियम

    आमतौर पर भारतीय संस्कृति और स्थापत्य कला में रुचि रखने वाले पर्यटकों की पहुंच मुगल कालीन, राजपूताना और ज्यादा से ज्यादा कुछ एक दक्षिण भारतीय शैली की कलाकृतियों तक ही हो पाती है। जबकि हमारा देश मौर्य, कुषाण, शुंग, गंधार, कलचुरि और पल्लवकालीन जैसी दर्जनों अन्य कला शैलियों से भरा पड़ा है लेकिन इन्हें देख पाना धन और समय दोनों ही लिहाज से बेहद खर्चीला साबित होता है। ऐसे में यदि अधिकांश संस्कृतियों की स्थापत्य कला एक ही स्थान पर देखने को मिल जाये तो इससे सुखद संयोग भला दूसरा क्या हो सकता है।
    सीरी फोर्ट स्टेडियम के पास चिल्ड्रन म्यूजियम के एक हिस्से में पुरातत्व विभाग ने एक अनूठा रेप्लिका (प्राचीन दुर्लभ मूर्तियों की हू-ब-हू नकल) म्यूजियम बनाया है। । यदि कुषाण काल (लगभग तीसरी शताब्दी) में बनी तपस्यारत भगवान बुद्ध की एक मात्र मूर्ति देखनी हो तो पर्यटकों को पाकिस्तान के लाहौर जाना पड़ता लेकिन अब वह दिल्ली में ही देखी जा सकती है। लगभग छठी शताब्दी के कलचुरी काल में निर्मित विभिन्न पशुओं की विशिष्टता का प्रदर्शन करती भगवान शिव की अदभुत मूर्ति की प्रतिकृति छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से ली गयी है। दूसरी शताब्दी की कृष्णकालीन गंधार कला का प्रतिनिधित्व करती मदोन्मत(नशे में डूबी) स्त्री जिसे उसका पति सहारा देकर उठाता नजर आ रहा है, मथुरा के मोहाली गांव से मिली मूल प्रतिमा की प्रतिकृति है।
    आंध्र प्रदेश के चित्तूर में मिले दूसरी ही शताब्दी के पुरावशेषों में सबसे प्रमुख स्थान है एक मुखी शिवलिंग का। अभी तक जितने भी शिवलिंग मिले हैं यह उनसे न सिर्फ अलग है बल्कि अदभुत और प्राचीन भी है। इस मूर्ति में लिंग से वेग के साथ प्रकट होते शिव को प्रदर्शित किया गया है। इसी के साथ पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर भारत की मोनालीसा कही जाने वाली नौवीं शताब्दी की यक्षी शालभंजनिका की प्रतिकृति भी संग्रहालय में प्रदर्शित की गयी है।
    रेप्लिका म्यूजियम के योजनाकार अधीक्षण पुरातत्वविद मोहम्मद केके बताते हैं कि यहां प्रदर्शित सभी कलाकृतियां अपनी मूल कलाकृतियों के आकार-प्रकार ही नहीं बनावट में भी समान हैं। जिन्हें देखकर असली और नकली का अंदाजा लगाना असम्भव है। इस म्यूजियम में दुर्लभ 150 कलाकृतियां की रेप्लिका लगाने की योजना है। पटना और बनारस कलाविद्यालय के दर्जनों छात्रों ने कई महीनों की महनत के बाद इन मूर्तियों में जान फूंकी है। अभी 25 कलाकृतियां तैयार की हैं, जिन्हें यहां प्रदर्शित किया गया है।



                पुनर्निमाण एवं जीर्णोद्धार

    भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण विभाग की पहचान यूं तो ऐतिहासिक धरोहरों की खोज करने और प्राचीन इमारतों का संरक्षण करने वाले सरकारी महकमे के तौर पर होती है लेकिन अब यह महकमा बिखरे अवशेषों को इकट्ठा कर उनको पुराने स्वरूप में वापस लौटाने के काम को भी अंजाम दे रहा है।

    दो दशक पहले इस काम की शुरुआत आगरा में मुगल सम्राट अकबर की इबादतगाह (जहां उसने दीन-ए-इलाही धर्म की शुरुआत की थी) को खोजने और बीच बाजार में स्थित इस ऐतिहासिक स्थल को अवैध कब्जे से मुक्त कराने के साथ हुई। मोहम्मद केके की यह योजना भारत सरकार को बेहद पसंद आयी और इसे पूरे देश में जोर-शोर से शुरू किया गया। अयोध्या में विवादित स्थल पर हुए उत्तखनन में पुरातत्व विभाग की टीम में अकेले मुस्लिम सदस्य मोहम्मद केके ही थे। वह बताते हैं कि उनके लिए सबसे मुश्किल काम  चंबल के बीहड़ों में गुर्जर-प्रतिहार वंश कालीन बटेसर मंदिर श्रंखला के लाखों अवशेषों को पुनः स्थापित करना रहा। दस्यू प्रभावित क्षेत्र होने के कारण सबसे पहले निर्भर गुर्जर जैसे दुर्दांत डांकुओं को मनाने में खासी मसक्कत करनी पड़ी, फिर शिवराज सिंह की भगवा सरकार में ऊंची पहुंच रखने वाले खनन माफियाओं ने इन अवशेषों की तस्करी करना शुरू कर दिया। प्रदेश सरकार के असहयोग से नाराज हो उन्होंने सीधे संघ प्रमुख सुदर्शन को चिट्ठी लिख सवाल कर डाला कि अयोध्या में एक मंदिर बनाने की बात करने वाली भाजपा मध्य प्रदेश की सत्ता में रहते हुए दो सौ मंदिरों की पुनः स्थापना में रोड़े क्यों अटका रही है, संघ के दखल के बाद कहीं जाकर शिवराज सरकार ने खनन माफियाओं पर अंकुश लगा और काम आगे बढ़ा। 200 मंदिरों की इस श्रंखला में से 70 मंदिरों को फिर से स्थापित करने के साथ ही उसे हैरिटेज साइट का भी दर्जा दे दिया गया है।
    मोहम्मद की यह मुहिम अब दिल्ली में चल रही है। गालिब की हवेली सहित दर्जनों ऐतिहासिक इमारतों को अवैध कब्जे से मुक्त कराने के बाद अब लाल किले को पुराने मुगलिया स्वरूप में वापस लौटाने की योजना पर तेज गति से काम चल रहा है। इस योजना में मुगल काल के बाद लाल किले में बनी छोटी-बड़ी 150 इमारतों को ढ़हा दिया जायेगा, जिनमें अधिकांश का निर्माण अंग्रेजों ने अपने सैन्य दफ्तर चलाने के लिए किया था और जो मुगलिया इमारतें अंग्रेजों ने ढ़हा दी थीं उनका फिर से निर्माण किया जायेगा। हालाकि इसके लिए सर्वोच्च न्यायलय तक का दरवाजा खटखटाना पड़ा लेकिन अंत में सरकार और अदालत दोनों इसके लिए राजी हो गये।
    मोहम्मद कहते हैं कि ऐतिहासिक इमारतें ही भारत की प्राचीन संस्कृति और इतिहास से रूबरू कराती हैं इसलिए देश की इन धरोहरों का संरक्षण किसी एक सरकार, विभाग या नागरिक की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पूरे देश की जिम्मेदारी है और वह अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह करने का प्रयास कर रहे हैं।
    उन्हें धरोहरों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए राजीव गांधी ग्लोबल एक्सीलेंसी एवार्ड और सार्क कंट्री एवार्ड जैसे दर्जन भर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।

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