• गुलशन के निगेहबानों की वीरान बस्ती

    जब तक वीरान था गुलशन,  निगेहबां थे हम यारो !
    जब बहार आई तो कहते हो,  तुम्हारा कोई काम नहीं !

     वे इतिहासकार नहीं है, फिर भी आदिम इंसानी बस्तियों से लेकर राजा-रजवाड़ों के ठिकानों के उजडऩे-बसने की तारीखें इतिहास के पन्ने पलटे बगैर बताते  हैं। वो कहानीकार नहीं है, फिर भी हर मेहराब पर गढ़े किस्सों को बखूबी सुनाते हैं। वो कलाकार नहीं है, फिर भी पत्थरों से लेकर दीवार तक पर की गई नक्काशी की बारीकियां बेहद आसान लफ्जों में समझाते हैं। हां  वो फनकार हैं,  जिनके कदम रखते ही विरासतें चहक उठती हैं और उनके इल्म की तासीर ऐसी है कि परदेश से  आने वाले भी हिंदुस्तान की धरोहरों के मुरीद हो जाते हैं, लेकिन गम ये है कि गुलशन के इन निगहबानों की बस्तियों में वीरानियां पसरी हुई हैं। 


    कोई भी कहानी तब तक अधूरी रहती है, जब तक उसे सुनाने वाला न मिले। पर्यटन भी एक ऐसा ही किस्सा है, जिसका लुत्फ तब तक नहीं  उठाया जा सकता, जब तक पर्यटक स्थलों में दिलचस्पी जगा देने वाला टूरिस्ट गाइड न मिले। हाड़ौती में रियासतकालीन निशानियों से लेकर सात अजूबों तक पर्यटन का खजाना भरा पड़ा है। जिससे देशी-विदेशी पावणों को रूबरू कराने का काम यही 30 लाइसेंसधारक टूरिस्ट गाइड करते हैं। हाड़ौती के पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी और गैर सरकारी मंचों पर जमकर आवाज उठती है, लेकिन टूरिस्ट गाइड हमेशा ही उपेक्षा का शिकार हो जाते हैं। हालात यह हैं कि पर्यटकों को पर्यटक स्थल दिखाने के लिए इन्हें आम दर्शकों से दस गुना ज्यादा कीमत का टिकट लेना पड़ता है। जबकि पूरे देश में पर्यटक स्थलों पर टूरिस्ट गाइड का प्रवेश मुफ्त है। इतना ही नहीं ट्रेवल एजेंसियां एक दिन के मेहनताने के तौर पर इन्हें महज 500 रुपए देती हैं। वह भी पूरा सीजन गुजर जाने के बाद। ग्रीन कार्ड होल्डर रीजनल टूरिस्ट गाइड चंद्रशेखर सिसोदिया कहते हैं कि पर्यटन विभाग और प्रदेश सरकार को सबसे पहले गाइड की एंट्री फीस का प्रावधान खत्म करना चाहिए, क्योंकि वही आपका ब्रांड अम्बसेडर है। इसके बाद टूर ऑपरेटरों के साथ मिलकर ऐसा मैकेनिज्म तैयार करना चाहिए कि उन्हें काम का भुगतान हाथों हाथ हो। 

    जहां से चले थे, अब भी वहीं खड़े


    बूंदी की चित्रकारी पर न्यूयार्क में एक घंटे तक लेक्चर देने वाले इतिहासकार और पुरातात्विक विद्वान माइलो क्लिवलेंड बीच जैसे यायावरों को पिछले तीस सालों से हाड़ौती की विरासत से मिलवा रहे केशव भाटी सिर्फ अंग्रेजी जानने वाले पर्यटकों को हाड़ौती घूमा पाते हैं। 70 साल की उम्र पार करने के बावजूद भारतीय वायु सेना का ये सेवानिवृत अफसर अब भी नए तौर-तरीके और ज्यादा से ज्यादा भाषाएं सीखना चाहता हैं, लेकिन उन्हें दुख है कि अपने बूते जहां से शुरुआत की थी, अब भी वहीं खड़े हैं। भाटी कहते हैं कि पर्यटन का बड़ा केंद्र होने के बावजूद यहां न तो स्किल डवलपमेंट सेंटर है और ना ही विदेशी भाषाएं सिखाने का कोई इंतजाम। जिसके चलते टूरिस्ट गाइड चाहकर भी कोई नवाचार नहीं कर पाते।

    हर बार नजरअंदाज होता हुनर 

    कागजों में हर वो शख्स हाड़ौती के पर्यटन की संभावनाएं तलाश रहा है, जिसका इस विरासत से कोई वास्ता नहीं, लेकिन जिसके घर का चूल्हा ही पर्यटकों के आने पर जलता हो, उसके हुनर को सरकारी और गैर सरकारी  मशीनरी हर बार नजरअंदाज करती है। जमीनी काम करने वालों के अनुभवों को कभी भी योजनाओं का हिस्सा नहीं बनाया जाता। टूरिस्ट गाइड नीरज भटनागर, प्रमोद गोस्वामी और कमल हाड़ा कहते हैं कि योजनाएं बनाने से लेकर धरोहरों के प्रमोशन में जब तक टूरिस्ट गाइड के अनुभवों को शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक न पर्यटन के सुनहरे दिन नहीं आने वाले। वे कहते हैं कि पर्यटक स्थलों पर मूलभूत सुविधाओं का इंतजाम किए बिना पर्यटक स्थलों पर सभी की आसान पहुंच बनाना नामुमकिन है। गुलशन में बहारें देखनी हैं तो टूरिस्ट गाइडों की बस्तियों से पहले वीरानियां मिटानी होंगी।


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