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  • प्राईवेट पब्लिशर 12वीं के बच्चों को पढ़ा रहे ''सेक्सिस्ट" किताबें



    जब अच्छी सेहत का जिक्र छिड़ता है तो शारीरिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों में उसका अर्थ होता है स्वस्थ शरीर। जिसे कसरत और खेलकूंद के जरिए हासिल किया गया हो, भले ही वह महिला का शरीर हो या पुरुष का, लेकिन  कमाई के लालच में अंधे हो चुके निजी प्रकाशकों के लिए इसके मायने ''सेक्सिस्ट" फिगर से हैं। जी हां, यकीन ना आए तो सीबीएसई की 12 वीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए तैयार की गई दिल्ली के न्यू सरस्वती हाउस नाम के पब्लिकेशन की किताब "स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा" को ही पढ़कर देख लीजिए। इस किताब के पेज संख्या 161 और 171 पर बच्चों को फिट फीमेल बॉडी शेप का अर्थ "36-24-36" का आकार बताया गया है।


    कोटा समेत पूरे राजस्थान में यह किताब धड़ल्ले से बिक रही और कई स्कूलों की पाठ्यसामग्री में इसे शामिल भी किया गया है। एक ओर सीबीएसई निजी प्रकाशकों की किताबों को बंद करने की लगातार हिदायत दे रहा है, लेकिन कमाई के चक्कर में अंधे हो चुके विद्यालय प्रबंधक, पुस्तक प्रकाशक और विक्रेता एनसीईआरटी के द्वारा निर्धारित पाठ्य सामग्री के साथ खुलेआम खिलवाड़ करने में जुटे हैं। जिसका अंजाम जवानी की दहलीज पर खड़ी किशोरवय पीढ़ी को "सेक्सिस्ट" किताबें पढ़कर उठाएगी। किताब में महिलाओं की ना सिर्फ "36-24-36" को फिट बॉडी शेप बताया गया है, बल्कि फल और फास्टफूड से कंपेयर तक किया गया है। जैसे एप्पल शेप, पिज्जा शेप....।

    कानून की बात करें तो  महिलाओं का अभद्र प्रतिनिधित्व (निषेध) अधिनियम, 1 9 86 के मुताबिक महिलाओं का गलत चित्रण प्रस्तुत करने वाली और प्रेस एक्ट के मुताबिक किसी भी वर्ग, समुदाय, लिंग, समाज के समूह की भावनाओं को आहत करने वाली सामग्री का प्रकाशन दंडनीय अपराध है। ऐसे में जब यह अपराध किशोरवय पीढ़ी की राह भटकाने का हो तो अक्षम्य ही हो जाता है। बावजूद इसके ना तो स्कूल प्रबंधक सुधरने को राजी हैं और ना ही निजी प्रकाशक। इस किताब के लेखक वीके शर्मा की मनोदशा को आसानी से समझा जा सकता है कि उन्हें चंद सिक्कों के लिए शिक्षक और लेखक दोनों की गरिमा को तार-तार करने में कोई गुरेज नहीं है।


    इस हालात के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार अभिभावक हैं, जो बच्चों को नामी स्कूलों में पढ़ाने के लालच में यह देखना, सोचना और समझना भूल जाते हैं कि आखिर बच्चों को परोसा क्या जा रहा है। संस्कारों की बात छेड़ने पर आपको दकियानूस करार दे दिया जाएगा, लेकिन जनाब ऐसी प्रगति के भी क्या फायदा कि बेटा "36-24-36" का चेप्टर पढ़कर अपनी मां या बहिन से ही कहने लगे कि तुम फिट नहीं हो। या बेटी घर आकर "36-24-36" की फिटनेस के चक्कर में पढ़ना लिखना भी भूल जाए। कम से कम एक बार बच्चे के लिए खरीदी मंहगी किताबों के पन्ने पटल कर जरूर देख लें ताकि नामी स्कूल में पढ़ाने के चक्कर में किसी प्राइवेट पब्लिशर की छपी ''सेक्सिस्ट" किताब पढ़ाने से बच जाएं।


    कोटा (राजस्थान) की खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें... http://goo.gl/McO1c6


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  • आम आदमी का हक छीनने वालों को मिले सजा



    हाल ही में एक हजार रुपए की रिश्वत लेने के मामले में एक पटवारी को चार साल की सजा सुनाकर कोटा के भ्रष्टाचार निवारण  न्यायालय ने नजीर पेश की कि रिश्वत में ली गई रकम भले ही मामूली हो, लेकिन आम नागरिक का शोषण करना गंभीर अपराध है। ऐसे में विश्वविद्यालय तो शिक्षा का वह मंदिर है जहां देश के भावी भविष्य को हकूक के लिए लडऩा सिखाया जाता है। संस्कारों की सीख देने के बजाय जब आम आदमी के हक को  छीनने का कृत्य किया जाएगा तो यहां पढऩे वाली युवा पीढ़ी और देश का भविष्य क्या होगा यह आसानी से समझा जा सकता है।




    कोटा विश्वविद्यालय का जन्म हुए डेढ़ दशक भी नहीं हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार और अराजकता की दीमक इसे अभी से चाटने लगी है। वर्ष 2012 से 2014 के बीच हुई नियुक्तियों में नियम कायदों को ताक पर रखकर तत्कालीन  कुलपति और बोम सदस्य  के बेटे-बहू के साथ-साथ राजनेताओं के करीबीयों को नौकरियां बांटकर जिस तरह आम नागरिक का हक छीनने का अपराध किया गया है, वह एक हजार रुपए की रिश्वत लेने के मामले से भी बड़ा और गंभीर है। 

    जोधपुर के जयनारायण व्यास विवि में भी इसी कालक्रम में रसूखदारों के रिश्तेदारों को नौकरियां बांटने का अपराध किया गया था। वहां हुए फर्जीवाड़े की जांच का जिम्मा सरकार ने कोटा विश्वविद्यालय के कुलपित प्रो. पीके दशोरा की अध्यक्षता में गठित समिति को सौंपा है।  प्रो. दशोरा के कार्यकाल में ही तत्कालीन कुलसचिव अंबिका दत्त चतुर्वेदी ने विधानसभा और सरकार की ओर से गठित जांच समिति की रिपोर्ट पर स्पष्टीकरण भेजकर माना था कि कोटा विश्वविद्यालय में भी भर्तियों के दौरान नियमों को ताक पर रखा गया, लेकिन अब वह दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय सरकार के आदेश पर अमल करने से कतरा रहे हैं। इतना ही नहीं जिस मामले में कार्रवाई के लिए सरकार विवि प्रशासन ही नहीं कुलाधिपति को भी पत्र लिख चुकी हैं उसकी नए सिरे से जांच के लिए कोटा विवि के अफसर नई जांच कमेटी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 



     वहीं दूसरी ओर एसीबी ने जोधपुर के मामले में आरोप तय कर आम नागरिक का हक मारने वाले अफसरों-बोम सदस्यों को  गिरफ्तार कर तीन महीने पहले जेल भी भेज दिया, लेकिन लगता है कि कोटा विश्वविद्यालय में रसूखदारों का चक्रव्यूह कुछ ज्यादा ही तगड़ा है। इसलिए जिस जांच समिति को एक महीने में रिपोर्ट देनी थी उसे दो साल से ज्यादा का वक्त लग गया और मार्च 2013 में तत्कालीन कुलपति, डीन, बोम सदस्य और फर्जी तरीके से नौकरी पाने वाले 14 लोगों के खिलाफ प्राथमिक पीई  (प्रकरण संख्या 95/2013)  दर्ज करने के बावजूद एसीबी आरोप तय करना तो दूर फर्जीवाड़े की जांच तक शुरू नहीं कर पाई है। वहीं सरकार के आदेश की समीक्षा करने की बात कह विवि के आला अफसर फर्जीवाड़े के आरोपियों को बचाने की कोशिश में भी जुट गए हैं। 


    राजस्थान पत्रिका जिस तरह कोटा विवि में हो रहे भ्रष्टाचार को लगातार बेपर्दा करता रहा है, भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों, राज्य सरकार और कुलाधिपति को भी उसी तरह इन मामलों में संलिप्त लोगों के खिलाफ गंभीर और त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि कोई कितना भी बड़ा रसूखदार हो  आम आदमी का हक मारने की हिम्मत ना जुटा सके। 





  • कोटा में कोचिंग चलाने के लिए अब करनी होगी इन नियमों की पालना


    राजस्थान में कोचिंग सेंटर्स खोलने के लिए सरकार दो साल पहले ही नियम एवं मानदण्ड तय कर चुकी है, लेकिन इसकी जानकारी पहली बार मंगलवार को सार्वजनिक हुई। विधानसभा में जब नियमों के बाबत पीपल्दा विधायक ने सवाल पूछा तो सरकार ने नियमावली को पटल पर रखा। सरकार की ओर से सदन में यह भी बताया गया कि नियमों की पालना की जिम्मेदारी स्थानीय निकाय एवं जिला शिक्षा विभाग को सौंपी गई है। 

    कोटा के पीपल्दा विधायक विद्याशंकर नंदवाना ने अतारांकित प्रश्न के जरिए कोटा शहर में कोचिंग सेंटर्स संचालित करने के लिए निर्धारित नियम व मानदंड की जानकारी मांगी थी। जिस पर सरकार ने मंगलवार को इन नियमों को विधानसभा के पटल पर रखा। हालांकि सवाल के जवाब में सरकार ने माना है कि अभी तक कोचिंग सेंटर संचालित करने की अनुमति मांगने के लिए कोई भी आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है। 
    विधानसभा के पटल पर रखे गए जवाब में सरकार ने बताया कि कोई व्यक्ति, सोसायटी, ट्रस्ट या व्यक्तियों के समूह द्वारा संचालित किए जाने वाले शैक्षणिक केन्द्र जहां 10 से ज्यादा विद्यार्थी अध्ययनरत हों, को राजकीय संस्था से निजी शिक्षण केन्द्र यानि ट्यूशन संचालित करने के लिए पंजीकृत होना चाहिए।

    एेसे कोचिंग संस्थान जहां 10 से अधिक लेकिन 100 तक विद्यार्थी एक समय में उपस्थित होते हों, वहां भवनों के मानदंड निर्धारित किए गए हैं। सड़क मार्गाधिकार न्यूनतम 40 फीट होना चाहिए।  भूखण्ड क्षेत्रफल न्यूनतम 300 वर्गमीटर हो तथा प्रत्येक अभ्यर्थी (एक पारी के विद्यार्थियों की संख्यानुसार) न्यूनतम 4 वर्ग मीटर सकल निर्मित क्षेत्रफल (प्रोजेक्शन, छज्जा एवं बालकनी के क्षेत्रफल के अलावा) होना आवश्यक है। इतना ही नहीं प्रत्येक कक्ष में आने-जाने का पृथक से द्वार होना चाहिए। इसी प्रकार प्रत्येक तल पर प्रवेश व निकास के लिए दो सीढियां होना अनिवार्य है। कॉर्नर के भूखण्ड जंक्शन की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं के मद्देनजर कोचिंग संस्थान खोलने के लिए नहीं दिए जाएंगे।  डेड एंड स्ट्रीट पर स्थित भूखण्ड व भवनों में कोचिंग संस्थान संचालित नहीं होंगे।

     छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय होना अनिवार्य है।एेसे कोचिंग सेन्टर जो अग्निशमन संबंधित प्रावधानों की अनुपालना नहीं करते, उन्हें निर्धारित समयावधि का नोटिस देते हुए एेसे भवनों की गतिविधि पर नगर निकाय की ओर से रोक लगाई जाए। कोंचिंग सेन्टर के लिए प्रस्तावित भवन में विद्यार्थियों के लिए केन्टीन, कोचिंग कार्यालय व स्टाफ रूम आदि गतिविधियां होंगी। 
    जिला शिक्षा अधिकारी कोचिंग सेन्टर का निरीक्षण कर संचालित कक्षाओं के क्षेत्रफल, आकार, बैठने की व्यवस्था, संबंधित सुविधाएं, जल व विद्युत आपूर्ति आदि का निरीक्षण करेंगे। इस आधार पर डीईओ संबंधित कोचिंग संस्थानों को निरीक्षण जारी करेंगे।

    #कोटा और #कोटाकोचिंग्स से जुड़ी खबरें पढ़ने के लिए लिंक को क्लिक करें.... https://goo.gl/8IqNhW
  • चंबल की हसीन वादियों ने दुनिया भर में मचाई धूम



    हाड़ौती की हसीन वादियों की एक झलक  ने पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्रीज के दो धुरंधरों को ऐसा दीवाना बनाया कि वह नए वीडियो की शूटिंग करने के लिए 768 किमी तक खुद कार चलाकर कोटा आए। बड़ी खामोशी से तीन दिन तक गरडिय़ा महादेव और बूंदी फोर्ट में शुूटिंग की। इसके बाद 'मन भरिया' का खूबसूरत वीडियो जब दुनिया के सामने आया तो उसने धूम मचाकर रख दी। 

    कई सुपर हिट म्यूजिक एलबम का निर्देशन कर चुके अरविंदर खेरा को जब मशहूर पंजाबी म्यूजिक कंपोजर और लिरिक्स राइटर बी प्रॉक ने अपने नए गाने के लिए साइन किया तो वह खुशी से झूम उठे। बी प्रॉक पहली बार कोई गाना गा रहे थे, इसलिए खेरा के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी उसके खूबसूरत फिल्मांकन की। दुनिया भर में लोकेशन तलाश रहे खेरा की नजर अचानक राजस्थान पर्यटन के प्रमोशन वीडियो  'जाने क्या दिख जाए' पर पड़ी। आठ वीडियो की सीरिज में उन्हें सबसे ज्यादा  गरडिय़ा महादेव इलाके की लोकेशन ने लुभाया, लेकिन राजस्थान में मनमोहक हरियाली और बलखाती नदी की मौजूदगी उनके गले नहीं उतरी। नतीजन, हकीकत जानने के लिए खुद कोटा चले आए। गरडिय़ा महादेव आकर जब उन्होंने इठलाती चम्बल और घने जंगल देखे तो अवाक रह गए।


    अरविंदर खेरा ने बताया कि कोटा तक आने के लिए ना तो चंडीगढ़ से कोई सीधी ट्रेन थी और ना ही हवाई सुविधा, इसलिए दोनों ने फैसला लिया कि वे कार से ही 768 किमी का सफर तय करेंगे। जनवरी में छोटे से क्रू और कैमरा मैन के साथ वह कोटा पहुंचे और तीन दिन तक शूटिंग की। खेरा बताते हैं कि 4.36 मिनट के वीडियो में 60 फीसदी हिस्सा गरडिय़ा महादेव में चम्बल के किनारे फिल्माया गया है। बूंदी फोर्ट के भी चार खूबसूरत शाॉट्स लिए गए हैं। बाकी 30 फीसदी इंडोर शूट मनाली में पूरा किया गया। खेरा ने बताया कि 'मन भरिया' का म्यूजिक वीडियो 17 मार्च को लांच हुआ। हाड़ौती की खूबसूरत वादियों से सजे इस वीडियो को अब तक यूट्यूब पर 45 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं। वहीं म्यूजिक चैनल्स के टॉप-5 चार्ट में भी यह जगह बना चुका है।


    अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर हाड़ौती के पर्यटन को प्रमोट करने में जुटीं यूजीसी की रिसर्च अवार्डी एवं कोटा विवि की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनुकृति शर्मा कहती हैं कि बद्रीनाथ की दुल्हनिया के बाद म्यूजिक वीडियो से कोटा और बूंदी की खूबसूरती ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है, लेकिन हाड़ौती में अभी सौ से ज्यादा ऐसी लोकेशन हैं जो फिल्मकारों की नजर से छिपी हुई  हैं। राजस्थान सरकार को गुजरात सरकार की तरह शूटिंग लोकेशन को प्रमोट करने के लिए पर्यटन विभाग के पोर्टल पर इन जगहों की ब्रांडिंग करनी चाहिए। ताकि खूबसूरत लोकेशन की तलाश में जुटे फिल्मकारों को इनकी आसानी से जानकारी मिल सके।

     इससे न सिर्फ हाड़ौती में फिल्म टूरिज्म बढ़ेगा, बल्कि इस इलाके में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। कला और संस्कृति का प्रचार-प्रसार होगा सो अलग। बी प्रॉक और अरविंदर खेरा उनकी बात का समर्थन करते हुए कहते हैं कि कोटा और उसके आसपास का इलाका शूटिंग के लिए खासा मुफीद है। शांति से आप अपना काम कर सकते हैं। इसलिए सरकार को इन जगहों को प्रमोट करना चाहिए, ताकि हमारी तरह नई लोकेशन की तलाश कर रहे लोगों को मदद मिल सके।




  • खोट ईवीएम में नहीं, नेताओं की नीयत में है

    15 वीं लोकसभा के लिए वर्ष 2009 में हुए चुनावों ने ईवीएम पर पहली बार व्यापक पैमाने पर सवाल खड़े किए थे... एक ही लोकसभा सीट से लगातार छह बार चुनाव जीत चुके संतोष गंगवार इस बार अपना सातवां चुनाव हार गए... इसी साल फिरोजाबाद से रिकॉर्ड मतों से जीतने वाले अखिलेख यादव के सीट खाली करने के बाद हुए उप चुनावों में डिम्पल यादव अपना पहला चुनाव बहुत बुरी तरह हार गईं... हालांकि लोकसभा चुनाव में दूसरी बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल हो रहा था...लेकिन, जब सूचना के अधिकार में बरेली और फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर हुए मतदान की बूथबार जानकारी जुटाई गई तो ईवीएम सवालों के घेरे में खड़ी थी... हाल में संपन्न हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की तरह जो लोगउस वक्त हार गए थे, वह ईवीएम को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे... आज भाजपा और मोदी पर उंगली उठाई जा रही है, उस वक्त निशाने पर कांग्रेस और सोनिया गांधी थे...

    सूचना के अधिकार का नया-नया प्रयोग शुरु हुआ था। बस हर कोई भारत निर्वाचन आयोग से सवाल पूछने में जुटा था। आयोग के अफसर इन सवालों को देख घबड़ा रहे थे। इसका अंदाजा मेरे सवाल से लगाया जा सकता है। मैने बरेली और फिरोजाबाद सीट के बूथवार नतीजे मांगे थे, लेकिन आयोग ने मेरे पत्र को सभी राज्य निर्वाचन आयोगों के पास भेज दिया और उन्होंने जिला निर्वाचन अधिकारियों को। नतीजन करीब तीन साल तक मेरे घर इतनी चिट्ठियां आईं, कि पोस्टमैन रास्ता पूछना भूल गया। बावजूद इसके ईवीएम का भूत पकड़ में नहीं आ रहा था। आईआईटी दिल्ली से लेकर रुड़की और भेल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया के अफसरों तक से व्यक्तिगत मुलाकात की। ईवीएम को हैक करने के जितने दावे सामने आते गए उतने ही उसे टेंपर प्रूफ बनाने के सबूत भी मिलते गए। बावजूद इसके सवाल वहीं का वहीं था कि आखिर मतपत्र के आदिम युग की ओर लौटे बिना ईवीएम को और सशक्त कैसे बनाया जा सकता है। सबसे पहला सुझाव बड़े भाई सुधीर पाठक जी ने दिया कि हमें वोट डालने का कोई सबूत मिलना चाहिए। जिसके जवाब में बड़े भाई प्रमोद गुप्ता जी ने एटीएम का उदाहरण पेश किया कि जब पैसे निकालते हैं तो उसके बदले एक पर्ची निकलती है। ऐसे ही वोट डालने पर भी पर्ची निकले और हमें यकीन हो सके कि हमारा वोट उसी शख्स को मिला है जिसके चुनाव चिन्ह का हमने ईवीएम में बटन दबाया है। हालांकि सुधीर पाठक जी ने एक शंका व्यक्त की कि एटीएम की पर्ची का प्रिंट कुछ दिन बाद उड़ जाता है। सुधार की बड़ी कल्पना हमारे सामने थी, लेकिन निर्वाचन आयोग इसके लिए राजी नहीं हुआ तो हमने सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया, लेकिन इसी बीच ईवीएम पर आ रही अटपटी जनहित याचिकाओं से परेशान होकर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं पर जुर्माना लगाना शुरू कर दिया था। सुब्रहमण्यम स्वामी जैसे विद्वान भी इसका शिकार बने तो मेरी हिम्मत थोड़ी टूटी, लेकिन पाठक जी ने हौसला दिखाया। उन्होंने वकील और कोर्ट फीस के साथ-साथ जुर्माना लगने की स्थिति में उस रकम को भी वहन करने की जिम्मेदारी लेने की हामी भरी। गुप्ता जी भी पीछे नहीं हटे और वह भी इस यज्ञ में साझीदार हो गए।
    ईवीएम में सुधार करने और मतदान के बाद पर्ची निकलने की मांग को लेकर मैने दिसंबर 2009 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। जिस पर एक फरवरी 2010 को सुनवाई हुई। जुर्माने और सजा की आशंका से सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर रखा गया मेरा पहला कदम बेहद सहमा हुआ था, लेकिन जब कोर्ट ने मेरी याचिका को मंजूर करते हुए निर्वाचन आयोग को मेरी शंकाओं का समाधान करने एवं पर्ची की व्यवस्था करने का निर्देश दिया तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। हमारे वकील विवेक शर्मा जी तो खुशी से उछल ही पड़े। यहां से हुई शुरुआत इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में पेपर ट्रेल लगाने की। इस लड़ाई में नौकरी गंवानी पड़ी। तमाम अपनों ने साथ छोड़ा। कुछ ने तो याचिका की कॉपी तक राजनैतिक दलों को बेच डाली। खैर अंत भला तो सब भला। जब तक दिल्ली रहा तब तक पेपर ट्रेल को फॉलो किया। नई नौकरी ने शहर छुड़वाया। व्यस्तताएं बढ़ाई। जख्म भरे और शायद पेपर ट्रेल भी भुला दिया। आलम ये था कि इस दौरान कुछ खबरें छपी थीं,लेकिन मेरे पास एक भी नहीं थी। पुराने साथियों ने यूपी के पूरे विधानसभा चुनावों में उन्हें तलाशा, तब जाकर दो आज ही मिल पाई हैं।
    शुक्रिया आशीष इन्हें संभालकर रखने के लिए। काश तुम्हारी तरह दंभ में डूबे यूपी के नेताओं को भी ईवीएम में पेपर ट्रेल लगाने की याद रही होती तो आज ईवीएम पर सवाल उठाने के बजाय चुनाव से पहले सभी जगह पेपर ट्रेल लगाने की मांग कर लेते। लेकिन, जो भी हुआ अच्छा हुआ। कम से कम इस वक्त वह ईवीएम की आड़ में मुंह तो छिपा पा रहे हैं। यदि पेपर ट्रेल लग जाता तो उन्हें यह मौका भी नहीं मिलता। सच्चाई तो यही है कि खोट ईवीएम में नहीं नेताओं की नीयत में है। उसकी जांच के लिए कौन सा पेपर ट्रेल लगवाया जाए। सोचिए सुधीर-प्रमोद भैया। नई जनहित याचिका दायर करनी है।


    - https://goo.gl/uXzPta

    - https://goo.gl/M24zEJ











  • दिलकश शहर कोटा...

    बद्रीनाथ की दुल्हनिया... रिलीज होने से पहले ही इस फिल्म के गाने लोगों की जुबान पर चढऩे लगे हैं। खास तौर पर "सुन मेरे हमसफर... " तो युवा दिलों की धड़कन बन गया है। खूबसूरत फिल्मांकन और सुरीली आवाज ने इस गाने को बेहद चॉकलेटी बना दिया है। सीधे दिल में उतरते रसीले बोल और आंखों को सुकून देते हसीन नजारे... गज़ब ढहा रहे हैं।

    ताजमहल के मखमली साए में खनकता संवाद ... "और कोई उम्मीद मत रखना बद्री"... "उम्मीदों पर तो आशिकी कायम है"...धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी है। वरुण धवन और आलिया भट की जितनी हसीन मुलाकातें हैं, उतना ही हसीन गढ़ पैलेस, क्षारबाग, किशोर सागर और सेवन वंडर का नजारा है। 

    जब यह फिल्म रिलीज होगी तो दर्शक कई बार इन लोकेशन को लेकर शर्तिया भ्रमित होंगे। ताजमहल से लेकर स्टेचू ऑफ लिबर्टी का नजारा हो या फिर पानी के बीचों-बीच बना आलीशान महल औऱ उसके इर्द-गिर्द अटखेलियां करता वाटर स्कूटर। इन्हें देखकर लगेगा कि एक गाने को फिल्माने के लिए फिल्म का क्रू दुनिया के चक्कर लगाता फिरा हो।

    जनाब, अब आपको राज की बात बताता हूं...आपको यह सारी लोकेशन देश और दुनिया के अलग-अलग ठिकानों की भले ही नजर आ रही हों, लेकिन हकीकत यह है कि यह मेरे हसीं शहर का आंगन है। जिसके इश्क में मैं कमली हो चुका हूं। हाड़ा चौहान शासकों का बसाया शहर कोटा...जो अब कोचिंग नगरी कोटा के नाम से विख्यात है।

    चंद फलांग की दूरियों पर बिखरे अल्लहड़ नजारों को कैद करने के लिए पूरे गाने में कैमरा बाबला हुआ नांचता फिरता है। जिसके शटर की खनक ने शाही शमशान के सन्नाटे में भी संगीत घोल दिया। सच कहूं तो कैमरे के लेंस ने क्षारबाग की छतरियों को देखने का नजरिया ही बदल कर रख दिया है। सेवन वंडर और किशोर सागर की खुबसुरती तो पहले से ही दीवाना बनाए हुए थी। इस गाने को सुनने और देखने के बाद बस इतना ही कह सकता हूँ....

    शुक्रिया कोटा, मुझे पनाह देने के लिए।



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