Vineet Singh

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Vineet Singh

Vineet is Sr. Print and Broadcast Journalist, Author, Columnist, Strategist, Believer, Dreamer and Performer. who covers topics pertaining to Indian politics, Crime Higher Education, tourism, Archeology and Society. He is Presently Working with Leading Hindi News Paper.

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Started Career in Journalism As Trainee Reporter in Print Media and achieved Key Positions in Various Medium of Media Just Like Print, Electronic and Digital. As Journalist Exposed so many Scams like Pension Scheme, Scholarship Scheme and Drugs Mafia Network. During My Career Interviewed With Pm Narendra modi, Former PM Chandarshakhar, IK Gujral, VP Singh, Atal bihari vajpayee and so many National and International Political Leaders.I have also interviewed Dacoit Nirbhay Gujjar and Phoolan Devi.

work Experineces 18 Years As Journalist
Print Media 12 Year As Special correspondent With Rajasthan patrika, Outlook hindi, Danik Jagran, sahara samay
TV journalism 06 Year As Producer with CNEB, ANI, Janmat Tv (live india)
Digital media work with rajasthan patrika last 2 year

News

Coverage for Rajasthan Patrika,Dainik Jagran,India Today,Live India, CNEB News, Outlook Hindi, ANI etc.

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PhD in Mass Communication and Master Degree in Journalism and Mass Communication And Ex Faculty, Department of Mass Communication and Journalism, Bareilly College bareilly india

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  • व्यवस्था का भ्रमजालः राजनीति और नौकरशाही का अदभुत संगम


    पारिवारिक एवं पेशागत परिवेश के चलते काफी लंबे समय तक सत्ता और विपक्ष में रहे राजनेताओं एवं नौकरशाहों की कार्यशैली व कार्य-क्षमताओं को बेहद करीब से देखने का जन्मजात सुअवसर मुझे मिला। साथ ही उनके सह संबंधों को समझने एवं व्यवस्था संबंधी विषय की अंदरूनी सतह तक पहुंचने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। हालांकि, गुरुजनों से मिले पेशागत विवेक ने इस दिशा में मेरे कुछ वर्षों के अनुभव को अपने से दोगुनी उम्र के व्यक्ति के बराबर की समझ होने का भ्रम भी प्रदान कर दिया, लेकिन पहली मर्तबा लगा है कि क्यों न इस भ्रमजाल को मीमांशा की कसौटी पर कसा जाए... उस दौर और व्यवस्था में तो यह और भी जरूरी हो जाता है, जब आपके पैशन को लोक श्रेष्ठी प्रॉस्टीट्यूट का दर्जा दिलाने को आतुर बैठे हों... तो फिर देर किस बात की, "शंटू के चश्मे" से मैने जो अल्पज्ञान हासिल किया है... कसिए उसे अपनी विवेचना की कसौटी पर... हो सके तो मेरे विचारों के भ्रमजाल को तोड़ मेरी खामियों को दुरुस्त जरूर कीजिएगा...

    व्यवस्था और दखलइस विषय पर यदि ईमानदारी से विचार करना हो, तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि व्यवस्था अथवा System है क्या ? साधारण भाषा में कहें तो व्यवस्था एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसका आम आदमी के सुख-दुख, प्रसन्न-अप्रसन्न, संतुष्ट-असंतुष्ट होने में इतना व्यापक योगदान है कि यह उसके जीवन का अभिन्न अंग बन गई है । व्यवस्था  एक ऐसा रास्ता है, जो प्रारंभ में तो सीधा होता है किंतु कुछ तथाकथित लाभार्थियों को रोके जाने के नाम पर समानता के अधिकार की दुहाई देकर, चतुर नौकरशाही इसे धीरे-धीरे जटिल करती जाती है । उदाहरणार्थ, लगभग प्रत्येक वर्ष Income Tax Return फॉर्म के प्रारूप में परिवर्तन कर उसे आसानी से भरा जा सकेगा, ऐसी मंशा जताते हुए न जाने कितनी सरकारों ने आम आदमी से कुंतलों वाहवाही लूटी है । मत भूलिए इस देश की चातुर्य से भरपूर नौकरशाही ने अभी कुछ वर्षों पहले तो इसका नाम ही सरल रख दिया था।  
    मेरे विचार से व्यवस्था और नौकरशाहीके संबंधों को स्वेटर और उसे बुनने की प्रक्रिया के जरिए आसानी से समझा जा सकता है। यहां व्यवस्था कई रंगों की ऊन से बुने गए उस रंग-बिरंगे डिजाइनर स्वेटर की तरह है, जो सर्दी में आपकी ठंड को दूर भगाने का एहसास व गर्मी में आपको उसे उतारने की इच्छा जागृत करने वाला तंत्र विकसित करती है। इस तंत्र के एक सीजन में आप बेहद खुश तो वहीं दूसरे सीजन में परेशान नजर आते हैं , यानि यह तंत्र आपको एक पल बेहद  उपयोगी तो दूसरे ही क्षण कतई अनुपयोगी महसूस होने लगता है।
    बावजूद इसके, नौकरशाही स्वेटर बुनने वाली उस सुगढ़ महिला की भांति हर समय प्रतिष्ठित रहती है, जो कभी सलाईयों के नम्बर बदल कर, तो कभी रंग और पैटर्न में बदलाव कर, तो कभी उसे पूरा उधेड़कर और कभी फुलबाजू वाला या हाफ बाजूवाला स्वेटर बुनकर आपको तंत्र के विभिन्न पैमानों की ठंडी मार से बचाए रखने का एहसास करवाने में साल दर साल निरंतर जुटी रहती है। मिजाजी मौसम के बदलाव के चलते यदि यदा कदा जनता ज्यादा व्यग्र होती नजर आती है, तो इस घुटन को दूर करने को उसकी सहूलियत के मुताबिक पुराने ही स्वेटर को कभी Round Neck, V-Neck या फिर बंद गले वाला बनाकर आक्रोश और ख्वाहिशों से पार पाने की न सिर्फ कोशिश करती है, बल्कि निश्चित ही वह इसमें सक्षम और सफल भी रहती है। सुव्यवस्था के भ्रमजाल को कायम रखने में नौकरशाही के योगदान संबंधी विषय में अनेकों पक्ष हैं, किंतु राजनीति के तीन ही प्रमुख तत्व अब तक अपनी मौजूदगी दर्ज करा सके हैः- (i) राजनेताओं  और  (ii) राजनैतिक दलों की भूमिका व कार्य-शैली (iii) आखिरी टुकड़े-टुकड़े हो चुकी आवाम ।  
    राजनेताओं का पदार्पण
    अनगिनत खांचों के बावजूद, राजनीति का जिक्र छिड़ते ही भारतीय जनमानस स्पष्ट रूप से दो धाराओं में विभाजित हो जाता है। पहले, वह लोग जो यह मानते हैं कि मुसीबतों से घिरे लोगों को यदि कोई अव्यवस्था के घोर कलयुग से मुक्ति दिला सकता है, तो भगवान कल्कि का वह अवतार सिर्फ आदर्श राजनेता ही हो सकता है। और, दूसरे  भ्रष्ट, अपराधी और स्वार्थ से लबालब वह धूर्त लोग जिनका ध्येय हर कीमत पर निज लाभ ही होता है, गाल बजाते हुए कभी कहने से नहीं चूकते कि इस देश, आवाम और व्यस्था का सबसे बड़ा दुश्मन यदि कोई है तो वह सिर्फ एक ही शैतान है- राजनेता
    आखिर यह राजनेता आते कहां से हैं ? भारतीय लोक के तंत्र में इनके आगमन को महज दो ही रास्ते हैं – पहला,  जिन्हें जनता कभी नहीं चुनती, लेकिन जनता के चुने हुए पंच उन्हें जनता के नाम पर चुनने का प्रायोजित प्रपंच करते हैं। इस पायदान पर श्रेष्ठी जनों का व्यापक प्रभाव है। वही नामित राजनेताओं के उत्पादन का उद्यम चलाते हैं। वह कभी खुद सीधे दखल नहीं देते, लेकिन राजनीतिक संगठनों  और उनके नेतृत्व द्वारा अपनी पसंद को चुनवा कर व्यवस्था के ऊपर प्रभावी भूमिका में थोप जरूर देते हैं। दूसरे होते हैं वो- जो जिन्हें सीधे जनता चुनकर भेजती है और जिन्हें सीधे तौर पर आम जनता के प्रति जवाबदेह माना जाता हैं ।
    सियासी श्रेष्ठी और धंधे का गठजोड़  
    अब सवाल उठता है कि आखिर यह करते क्या हैं ? तो पहले विवेचना करते हैं नामित राजनेताओंकी... हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन्हें भी चुना हुआ ही माना जाता है, परंतु सीधे जनता से नहीं, अपितु जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा पार्टी व्हिप के अधीन,पूर्व निर्धारित परिणामों  वाले चुनाव के तहत पहले से ही जीतने की तयशुदा की गणनात्मक व्यवस्था में छद्म मतदान करवाकर । राज्य सभा, विधानसभा, मेयर और जिला पचांयतों के प्रमुख इसका जीवंत उदाहरण हैं। मैट्रिक्स के इस खेल में  सामाजिक स्थिति, राजनैतिक कद एवं वजूद, बाहुबल, धनबल, शीर्ष नेतृत्व से निकटता और खुद नेटवर्किंग स्किल आदि तमाम ऐसे तत्व होत हैं जो उनकी दावेदारी के साथ-साथ चुने जाने की संभावनाओं को कमजोर या मजबूत बनाते हैं ।
    विगत दो दशकों से मीडिया के इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप का उभार और उसका आम जनमानस पर सीधा प्रभाव भी इस श्रेणी के राजनीतिज्ञों के लिए और स्वयं प्रचारीय जगत के लिए भी मुनाफे का सौदा साबित हो रहा है। विषय की अग्रिम किंतु अल्पजानकारी के इस संगम में गूगल बाबा का प्रताप भौंदू बक्से के जरिए आम जनता के बीच प्रखर वक्ता और विद्वानों के रूप में इनकी न सिर्फ छवि, बल्कि बारम्बारता के चलते एक तरफा प्रतीक गढ़ने के प्रयास को भी सार्थक बना रही है। रोज-रोज, बल्कि अब तो दिन में कई मर्तबा वाद-विवाद प्रतियोगिताओं का रूप लेतीं ओपन डिबेट्स इन प्रतिभागियों व ब्रेकिंग के दौर में खड़े मीडिया,  दोनों के लिए सह अस्तित्व के उद्धार का आसान मार्ग साबित हो रहा हैं।
    एक और जहां विभिन्न विवादित मुद्दों या फिर यूं कहें कि  साधारण मुद्दों को भी विवादित बनाकर, उन पर हो रही अनावश्यक बहसों से आम दर्शक के बहुमूल्य समय को तो नष्ट किया ही जा रहा है, साथ ही राजनीतिक दलों की टार्गेट ऑडिएंश को सैट करने के लिए समाज में पहले ही बोए जा चुके विखंडन के बीज को खाद पानी दे, सियासी मुनाफे की नई फसड़ खड़े करने के सफलतम प्रयासों से  चैनलों की टीआरपी में तो भारी इजाफा हो ही रहा है, वहीं दूसरी ओर चुनाव लड़ने का जोखिम उठाए बिना इंडायरेक्टली इलेक्ट होने वाले पोटेंसियल प्रोफेशनल्स या व्यवस्था मुताबिक कहें कि राजनीतिक संभावनाओं वाले उत्पादों की जमकर ब्रांडिंग हो रही है।
    मीडिया का यह वर्ग आम जनता की नजर में इन्हें ज्ञानी या विद्वान राजनेताओं की छवि के तौर पर प्रस्तुत करता है और चीख पुकार या अब तो यूं कहें कि छीना झपटी के दौर में उनकी वाकपटुता का लोहा मनवाने में हर पल जुटा हुआ है। वह तर्क कर रहे हैं या कुतर्क गढ़ रहे हैं इससे स्वनामधन्य पत्रकारीय श्रेष्ठियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। नतीजन, ऐसे वाकपटु चेहरों को विभिन्न राजनैतिक दलों व निर्णायक अधिकार रखने वालों की नजर में जल्द ही ऐसी विशिष्ट पहचान प्राप्त होती है, जिससे शीर्ष नेतृत्व भी सकारात्मकतापूर्वक प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता । बेहतर विजिबिल्टी की वजह से एक बार चुने जाने के बाद तो ऐसे राजनेताओं के लिए मौकों की बारम्बार भरमार पैदा हो जाती है। परिणाम स्वरूप ये लोग सत्ता प्रतिष्ठानों के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर भी प्रायः विराजमान हो जाते हैं ।
    संचार कला की विशेष योग्यता की व्यवस्थागत सबसे बड़ी खामी यह होती है कि अमूमन यह लोग अन्य समकक्ष एवं जनता से चुनकर आए लोगों को कम ज्ञान वाला जता, उन्हें तुच्छ प्रदर्शित कर, अल्पज्ञानी साबित करते हुए उनका आत्मविश्वास सामाजिक रूप से डिगाने का भी कोई प्रयास नहीं चूकते हैं । संगठनों व राजनैतिक दलों में चर्चाओं व संसद के दोनों सदनों में यह दृश्य एक दम आम है । दूसरी बड़ी बात यह कि , क्योंकि ये लोग सभासदों, विधायकों व लोक सभा के सांसदों के रूप में जनता से सीधे चुनकर नहीं आते हैं, अतः इनका आम जनता या अपने क्षेत्र के मतदाताओं से सीधा संवाद स्थापित कर उनकी जरूरतें, उनकी समस्याएं और सुख-दुख साझा करने की जिम्मेदार को स्वीकार करना तो दूर इस बाबत सोचने तक का कभी प्रश्न ही नहीं उठता। इसीलिए, अपने निर्वाचन क्षेत्र में इन्हें नियमित आने-जाने की जरूरत और आम जनता से मुलाकात करने के लिए समय निर्धारित करने की कोई बंदिश भी नहीं होती। नतीजन, समय के बचे हुए इस बड़े हिस्से का यह लोग राजनीतिक, प्रशासनिक और मीडिया नेटवर्किंग डवलप करने में बखूबी इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद भी जो समय बचा रह जाता है, उसे सामयिक विषयों की जानकारी हासिल करने और व्यक्तिगत विकास में खपाते हैं। यानि जनता की सेवा के समय को राजनेताओं का यह वर्ग अपने नए संबंध स्थापित करने, पुरानों को प्रगाढ़ बनाने और उनसे मिली ऊर्जा के जरिए निज व्यवसाय को उन्नत कर आर्थिक और सामाजिक रूप से खुद को उत्तरोत्तर मजबूत बनाने में करते हैं।
    शहद और मक्खियों की फौज
    अब बात दूसरी श्रेणी के उन राजनेताओं की – जो सालों तक जमीनी स्तर पर राजनैतिक द्वन्द्वों से जूझने और अंदरूनी एवं बाहरी सियासी सूरमाओं को पछाड़ने का कठिन परिश्रम करने के बाद आम जनता के बीच में जैसे-तैसे अपनी पैठ बनाते हैं, उसके बाद भी दर्जन भर श्रेष्ठियों से श्रेष्ठता के मुकाबले की अजमाइश के बाद ही आम जनता इन्हें चुनकर सदन भेजती है।  चूंकि आम नागरिकों के समर्थन से ही यह वर्ग राजनीति में सफलता की सीढ़ियां चढ़ता है इसलिए उनसे सीधा संवाद भी करता है। नतीजन, इसे न केवल उनकी दिन-प्रतिदिन की समस्याओं पर ध्यान देना पड़ता है, बल्कि उनके बीच में प्रभाव रखने वाले, छोटे-छोटे समूहों का प्रतिनिधित्व और नेतृत्व करने वाले छुटभइये टाइप्स कथित नेताओं को व्यक्तिगत लाभ प्रदान करने में या प्राप्त करवाने में सहायक एवं उत्प्रेरक की भूमिका का भी जाने-अनजाने में निर्वहन करना पड़ता है ।
    यह कड़वा सच है कि ऐसे लाभार्थियों का लोकतंत्रीय व्यवस्था में स्थित छोटे-छोटे जातिगत, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक समूहों के बीच अपना एक प्रभाव व स्थान होता है, किंतु इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ये लाभार्थी, बार-बार व्यक्तिगत लाभ लेने की कोशिश में अधिकांशतः इन चुने हुए जन-प्रतिनिधियों के आर्थिक और व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करने में सफल हो जाते हैं। वहीं दूसरी ओर राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बनाने के की कोशिशों के चलते इस श्रेणी के राजनेताओं को इतना अधिक परिश्रम करना पड़ता है कि दोनों दिशाओं में खोना-पाना लगा रहता है, लेकिन सत्ता महा ठगिन का मंत्र जानने के बावजूद सियासी ताकत हासिल करने के लिए यह सियासतदारों का यह वर्ग तलवार की धार पर चलने का हुनर सीख ही लेता है ।
    समय का पहिया तो बिना रुके घूमता ही रहता है, लेकिन चुने हुए यह राजनेतागण, अमूमन बेहतर समय प्रबंधनमें असफल होने के कारण केवल कुछ लोगों को ही व्यक्तिगत लाभ पहुंचा पाते हैं । ऊपर से उनकी मीडिया और राजनीतिक नेटवर्किंग ही नहीं तत्कालिक विषयों पर अध्ययन एवं विश्लेषण की सामयिक तैयारी लगातार घटती चली जाती है । इतना ही नहीं छुटभइये नेताओं एवं तयशुदा लाभार्थियों से घिर जाने कारण अक्सर इस श्रेणी के राजनेताओं का आम, गरीब और निचले स्तर पर वास कर रहे जन साधारण से संपर्क एवं संवादधीरे-धीरे घटता चला जाता है। चाटुकारों के मकड़ जाल में घिरे यह राजनेतागण अक्सर ही अपनी प्रशंसा से मन ही मन गदगद होते रहते हैं एवं कई बार तो स्थितियां ऐसी भी हो जाती हैं कि चाटुकारिता से उन्हें न जाने कौन सी, किंतु एक अनजानी ऊर्जा अवश्य ही प्राप्त होती नजर आती है।
    जबकि, सच्चाई यह है कि खराब समय प्रबंधन और अनुशासनहीनता के कारण ही इनके निकट  चाटुकारों की स्थिति शहद पर डेरा जमाने को आकुल मक्खी रूपी फौज की शक्ल अख्तियार करने लगती है। यहीं होती है, नौकरशाही की एंट्री। जो इसी फौज में शामिल छोटे से लेकर बड़े लाभार्थियों को संतुष्ट कर राजनेताओं का विश्वास जीतने और खुद को इनका सबसे बड़ा हितैशी साबित करने के साथ ही राजनेताओं के अंदर छिपी पैसा कमाने, लाभ उठाने की मानवीय प्रवृत्ति को न सिर्फ जगाती है, बल्कि दिनों दिन किश्तों में उसकी ललक बढ़ाने में भी जुट जाती है। नतीजन, इसके वशीभूत हो यह राजनेता पहले छोटे-छोटे भ्रष्टाचार और फिर बड़े की ओर चलते चले जाते हैं। ऐसे राजनेताओं की प्राथमिक मूक स्वीकृति के पीछे निश्चित ही छुटभइये नेताओं और अपने प्रतिनिधियों को नाराज न कर पाने की मजबूरी भी छिपी रहती है, जिसे यह जान कर भी अनजान बने रहना का दिखावा करते हैं।
    वहीं दूसरी ओर, धरातल पर इनका ग्राफ ऊपर जाने के बजाय अमूमन कुछ समयावधि के लिए सीधी रेखा में स्थिर और उसके बाद धीरे-धीरे हाथ से फिसलती रेत की माफिक नीचे की ओर गिरता ही चला जाता है। अपवाद सरीखे एक ही क्षेत्र से लगातार कई बार चुनाव जीतने वाले जनप्रतिनिधियों को उनके क्षेत्र की जनता के बीच में अपने प्रभाव को कायम रखने के लिए प्रतिक्षण, निर्विवादित रूप से आम जनता को न केवल समय देना पड़ता है, अपितु उनका दबाव झेलने की कला में भी निपुणता हासिल करनी पड़ती है ।
    नौकरशाही का प्रादुर्भाव
    दोनों रास्तों से सियासी मंजिल हासिल करने के बाद सदन की दहलीज में दाखिल हुए राजनेताओं के आगे असल मुसीबत तब खड़ी होती है जब उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया जाता है। उनके शहद बनने के बाद भिनभिनाती मक्खियों का सरकारी दल अब टिडिडयों की शक्ल अख्तियार कर लेता है। इसे आपको राजनेताओं की दोनों श्रेणियों के लिए अलग-अलग तरीके से समझना होगा। यह तो स्पष्ट हो ही चुका है कि राजनीति के पहले अभिजात्य वर्ग यानि नामित जनप्रतिनिधियों की सदन तक पहुंचने की यात्रा के दौरान आम जनता से संवाद शून्यता व जमीनी स्तर पर व्यवहारिक रूप से समस्याओं की समझ लगभग खत्म सी ही होती है... ऊपर से जिस विषय की इन्होंने पढ़ाई ही नहीं की उस मामले का इन्हें मंत्रालय सौंप दिया जाता है तो यह पूरी तरह से नौकरशाहों और अपने पुराने सफर के साथी रहे कुछ चुनिन्दा सरकारी अधिकारियों की समझ पर निर्भर होकर रह जाते हैं। जब भी नीति-रीति बनाने की बात आती है तो उसमें इन राजनेताओं के बजाय नौकरशाहों की समझ का ही भरपूर इस्तेमाल होता है।
    और यह नौकरशाह तब करते क्या हैं ...  पुराने माल की रीपैकिंग, डिजाइनिंग और मॉड्यूलिंग करने में माहिर नौकरशाही अपने चातुर्य  कौशल से दशकों पहले बनी नीतियों के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया की बारम्बारता का दोहराव। जिसे वह पुनः नई सरकार और राजनीतिक दल की टार्गेट ऑडियंस के साथ ही मंत्रीवर की निजी पसंद के आधार पर जनता के बीच मन-भावन व लोक लुभावन रूप में फिर से परोसने के लिए तैयार कर देती है । इतना ही नहीं जब कभी इस पर सवाल उठता है तो पहले नौकरी बचाने में माहिर नौकरशाह और फिर दूसरे सभी को मूर्ख साबित करने में माहिर हो चुके पहली कैटेगरी के वाकपटु नेता आम जनता को लच्छेदार एवं विद्वतापूर्ण तरीके से तर्कसंगत भाषा शैली के जरिए इन नीतिगत परिवर्तनों का ऐसा बखान करते हैं कि मानो बस इन्हीं नीतियों की खोज के लिए तो उन्होंने अलबर्ट आइंसटीन की माफिक अपना पूरा जीवन प्रयोगशालाओं में ही  गुजार दिया हो। उनके तर्क कहें या फिर कुतर्क, जिन्हें संचार माध्यमों के पुराने कृतार्थियों के जरिए परोस और सही साबित करा वह वाहवाही लूटने में भी काफी हद तक सफल हो जाते हैं ।
    कड़वा सच यह है कि धरातल से कोसों दूर, व्यवहारिक समस्याओं की जानकारी के आभाव और मात्र सतही समझ के चलते न तो ऐसी नीतियों के दूरगामी परिणाम आते हैं और ना ही यह सफल हो पाती हैं, लेकिन इसे भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही  कहेंगे कि वक्त और पैसे की बर्बादी वाली ऐसी तमाम योजनाओं की असफलता की जिम्मेदारी ही यहां तय नहीं है। बावजूद इसके गलतियों का यह दोहराव अमूमन हर दल की सरकार में निरंतर चलता रहता है। सब कुछ पता होने के बाद भी शीर्ष नेतृत्व जब कभी किसी जिम्मेदारी को प्रदान करने के लिए उपयुक्त व्यक्ति की खोज करता है तो जनता द्वारा सीधे चुने गए प्रतिनिधियों की अपेक्षा पहले वर्ग के राजनीतिज्ञ, अर्थात नामित लोगों को ही प्रायः उसकी वरीयता प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।
    नौकरशाही और घुटने पर राजनेता
    नौकरशाही के आगे राजनेताओं के घुटने टेकने की दूसरी बड़ी वजह है उनकी अज्ञानता... अक्सर होता यह है कि मंत्रालय के गठन के दौरान जनप्रतिनिधियों की रैंक, कैबिनेट, राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार और राज्य मंत्री उनकी सियासी कद काठी और तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था में जरूरत के मुताबिक तय की जाती है, लेकिन कभी भी उनकी पढ़ाई लिखाई और जीविकोपार्जन के अनुभवों को आधार बनाकर मंत्रालय नहीं बांटे जाते। नतीजन, जिसे सूचना एवं संचार तंत्र के प्रवाहों की थ्योरी तक पता नहीं होती उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्री बना दिया जाता है.... जिनके घर का बजट खुद उनकी पत्नियां तय करती हैं वह वित्त मंत्रालय संभालते नजर आते हैं... और जिन्हें अपने पड़ौसी का नाम तक पता नहीं होता उन्हें विदेश मंत्रालय जैसी जिम्मेदारी दे दी जाती है... ऐसे ही जिन्हें सैन्य संगठनों, देश की भौगोलिक, सामाजिक और रीति-नीतिगत बारीकियां पता नहीं होती उन्हें गृह और रक्षा सौंप दिया जाता है... यहां तक भी चल जाता है, लेकिन जिसे गेहूं और जौ की बालियों के बीच का अंतर नहीं पता उसे जब कृषि और जिसने कभी नौकरी के लिए धक्के नहीं खाए उसे श्रम एवं रोजगार और जो कभी किताबों के चक्कर में नहीं पड़ा उसे शिक्षा जैसे अहम मंत्रालय दे दिए जाते हैं। नतीजन, केंद्र से लेकर राज्य की सरकारों तक के मंत्रिमंडलों में व्यवस्था की जमीनी जानकारी न रखने वाले सियासी सूरमाओं को विभागों के कल्याण की जिम्मेदारी सौप दी जाती है।
    ऐसे में होता यह है कि पहला साल तो माला पहनने, फीता काटने और मंत्री बनने के बाद मिली सेवाओं का लुत्फ उठाने में कब गुजर जाता है पता ही नहीं चलता। दूसरे साल में वह योजनाओं के नाम जान पाते हैं और तीसरे साल में नई योजनाएं बनाने की तैयारी करते हैं... चौथे साल में जिनका खाका खिंच पाता है। आखिर में आ जाता है चुनावी साल... तो आपको प्रचार भी करना है, अपनी मौजूदगी और सफलता का ग्राफ भी प्रदर्शित करना है... बस इसी आपाधापी में जनता और विभाग का कल्याण खो जाता है। सवाल उठता है कि फिर पूरे पांच साल मंत्रालय चलाता कौन है? जिसका सीधा जवाब है नौकरशाह... वह भी तब जब आपकी उससे पटरी खा रही हो... नहीं तो वह धेला भर भी न होने दे।
    यही वहज थी, जिसके चलते मंत्री अपनी पसंद के नौकरशाहों की तैनाती अपने मंत्रालयों में करवाने के लिए सरकार पर दवाब बनाते थे और अक्सर उसमें वह सफल भी हो जाते थे, लेकिन पिछली सरकार में तो यह हक भी उनसे छीन लिया गया... कौन अफसर किस मंत्री का ओएसडी होगा... किसे मंत्री के पर्सनल स्टाफ के पैरलल लगाया जाना है... और किससे विभाग की मुखबिरी करानी है... सब कुछ प्रधानमंत्री कार्यालय से तय हो रहा है... नतीजन, पिछली सरकार में आप मंत्री तो थे, लेकिन आपका विभाग चला कोई और ही रहा था... इस सरकार का हाल क्या होने वाला है आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि पहले तो शपथ ग्रहण के चार घंटे पहले तक किसी को यह खबर नहीं थी कि उसे मंत्री बनाया जाना भी है या नहीं... बस सभी अपने फोन को खाली रखने में जुटे हुए थे... कि मेरा नंबर आएगा... जिनका आ भी गया... और उन्हें शपथ लेने के लिए राष्ट्रपति भवन के अहाते में पहुंचने तक पता ही नहीं था कि क्या पोर्टफोलियो रहेगा... हाथ में पर्चा आया और जैसे ही मैं... फलाना बोला... तब जाकर समझ आया कि खेल हो गया... ऊपर से एक चीज जो फिर भारी पड़ गई... वह थी नौकरशाही...  सालों तक एडियां घिसने के बाद इस कतार तक पहुंचे राजनेताओं ने जब अपने से पहले बिना चुनाव लड़े नौकरशाहों की फौज को शपथ लेते हुए देखा तो उन पर घड़ों पानी फिर गया... लेकिन, राजनेताओं के घुटनों पर आने के लिए नौकरशाह नहीं वह खुद जिम्मेदार हैं... क्योंकि उन्होंने टाइम और नॉलेज मैनेजमेंट से कब का किनारा कर लिया था।
    जनता जनार्दन या गिनीपिग 
    अमेरिका एवं यूरोपीय देशों की तर्ज पर सत्ता हासिल करने के लिए हिंदुस्तानी सियासत की प्रयोगशाला में चुनाव प्रबंधन का दखल भी पिछले एक दशक से खासा बढ़ चला है। अधिकांश राजनैतिक दलों ने संगठनात्मक बदलाव कर अच्छा चुनाव प्रबंधन करने वाले लोगों को विशेष स्थान दे या यह कहना ज्यादा उचित होगा कि हायर कर पार्टी का मजबूत पिलर घोषित कर दिया है। ऐसे दल जहां संगठन कमजोर हैं, उनके द्वारा कुछ नामी विशेषज्ञों के द्वारा एक नियत धनराशि के भुगतान से चुनाव प्रबंधन के व्यवसायिक प्रयोग किए जाते हैं ... ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर इस प्रयोगशाला में आम मतदाता की हैसियत क्या रह जाती है ? तो जनाब, जवाब इसका जवाब है महज... गिनीपिग, जिसे इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में तब तक हांका जाता है जब तक वांछित नतीजों की प्राप्ति न हो जाए... और यह नतीजे बेहद सफल भी हो रहे हैं। क्योंकि आम मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग और राजेताओं की मक्खियों के पंजों से चिपका पड़ा है... जिसे व्यवस्था परिवर्तन और बेहतर जीवन तो बाद में चाहिए... उससे पहले शराब, पैसा और अपने वोट की कीमत वसूलनी होती है। यही वजह है कि एक आम आदमी तो दूर उच्च मध्यम वर्ग का व्यक्ति भी चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाता... क्योंकि उसे पता है कि निर्वाचन आयोग के कागजों में दर्ज होने वाले छद्म लेखों के इतर लड़ाई का असल खर्च करोड़ों में ही आना है... और उसकी हैसियत ऐसी नहीं होती कि गिनीपिग की पीठ में बने छेद से सिक्के डाल उसका पेट भर सके।
    उम्मीद अभी जिंदा है...
    मेरे विचार से बेहतर चुनावी प्रबंधन से कुछ चुनाव तो जरूर जीते जा सकते हैं, लेकिन आम जनता के साथ दोतरफा संवाद स्थापित कर समुचित प्रतिनिधत्व मात्र से ही, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का समग्र विकास संभव हो सकता है। यदि जनता द्वारा सीधे चुने जा रहे राजनेता अपनी वर्तमान कार्यशैली एवं समय प्रबंधन का पुनर्वलोकन कर लें तो उनकी न सिर्फ खोई हुई जमीन बच सकती है, बल्कि नॉमिनेटिड पॉलिटिशीयन के आगे वजूद बचाने का संकट भी निपट सकता है... और यदि भी कर सकें तो कम से कम नीतिगत निर्णय लेते समय व्यवस्था को व्यवहारिक, सीधी-सपाट, सुगम,सुलभ व सहज बना दिया जाए, तो न सिर्फ राजनेताओं के पास तथाकथित लाभार्थियों की संख्या स्वयं ही घट जाएगी, बल्कि लाल फीताशाही को भी खत्म किया जा सकता है... जिसके बाद निश्चित ही सियासी सिफारिशों और व्यवस्था में दखल का दौर खत्म हो जाएगा... लोकतांत्रिक गिरावटें तो दूर हो ही सकेंगी, साथ ही देश फिर से सोने की चिड़या बन सकेगा... लेकिन यह तभी संभव हो सकता है, जब जनता के बीच से, जनता के चुने हुए लोग जनता के भले की सियासत करें... जिसकी उम्मीद काफी हद तक अब भी जिंदा है.. देश के युवाओं और कमर्ठ नेताओं में...। 
  • राष्ट्रीयता: एक बहस...पुराने अच्छे या ये नए


    देश में कहीं-कहीं राष्ट्रीयता के भाव को समझने में गहरी और भद्दी भूल की जा रही है। आए दिन हम इस भूल के अनेकानेक प्रमाण पाते हैं। यदि इस भाव के अर्थ भलीभांति समझ लिए गए होते तो इस विषय पर बहुत सी अनर्गल और अस्पष्ट बातें सुनने में न आतीं। राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा भी नहीं है। राष्ट्रयता सामाजिक बंधनों का घेरा भी नहीं है।

    राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है। उसकी सीमाएं देश की सीमाएं हैं। प्राकृत विशेषता और भिन्नता देश को संसार से अलग और स्पष्ट करती है और उसके निवासियों को एक विशेष बंधन- किसी सादृश्य के बंधन से बांधती है। राष्ट्र पराधीनता के पालने में नहीं पलता। स्वाधीन देश ही राष्ट्रों की भूमि है, क्योंकि पुच्छविहीन पशु हों, तो हों, परंतु अपना शासन अपने हाथों में न रखने वाले राष्ट्र नहीं होते। राष्ट्रीयता का भाव मानव उन्नति की एक सीढ़ी है। उसका उदय नितांत स्वाभाविक रीति से हुआ। यूरोप के देशों में वह सबसे पहले जन्मा। मनुष्य उसी समय तक मनुष्य है, जब तक उसकी दृष्टि के सामने कोई ऊंचा आदर्श है, जिसके लिए वह अपने प्रांण तक दे सके। समय की गति के साथ आदर्शों में परिवर्तन हुए।


    धर्म के आदर्श के लिए लोगों ने जान दी और तन कटाया, परंतु संसार के भिन्न भिन्न धर्मों के संघर्षण, एक-एक आदेश में अनेक धर्मों के होने तथा धार्मिक भावों की प्रधानता से देश के व्यापार, कला-कौशल और सभ्यता की उन्नति में रुकावट पड़ने से अंत में धीरे-धीरे धर्म का पक्षपात कम हो चला और देश प्रेम का स्वभाविक आदर्श लोगों के सामने आ गया। जो पऱाचीनकाल में धर्म के नाम पर कटते मरते थे, आज उनकी संतति देश के नाम पर मरती है। पुराने अच्छे या ये नए, इस पर बहस करना फिजूल है, पर उनमें भी जीवन था और इनमें भी जीवन है। वे भी त्याग करना जानते थे और ये भी, और ये दोनों उन अभागों से लाख दर्जे अच्छे और सौभाग्यवान है, जिनके सामने कोई आदर्श नहीं और जो हर बात में मौत से डरते हैं। ये पिछले आदमी अपने देश के बोझ और अपनी माता की कोख पर कलंक हैं।


    देश प्रेम का भाव इग्लेंड में उस समय उदय हो चुका था, जब स्पेन के कैथोलिक राजा फिलिप ने इग्लेंड पर अजेय जहाजी बेड़े आरमेडा द्वारा चढ़ाई की थी, क्योंकि इग्लेंड के कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट, दोनों प्रकार के ईसाइयों ने देश के शत्रु का एक सा स्वागत किया था। फ्रांस की राज्य क्रांति ने राष्ट्रीयता को पूरे वैभव से खिला दिया था। इस प्रकाशमान रूप को देखकर गिरे हुए देशों को आशा का मधुर संदेश मिला। 19 वीं राष्ट्रीयता की शताब्दी थी। वर्तमान जर्मनी का उदय इसी शताब्दी में हुआ। पराधीन इटली ने स्वेच्छाचारी आस्ट्रिया के बंधनों से मुक्ति पाई, यूनान को स्वीधनता मिली और बालकन के अन्य राष्ट्र भी कब्रों से सिर निकालकर उठ पड़े। गिरे हुए पूर्व ने भी अपनी विभूति दिखाई। बाहर वाले उसे दोनों हाथों से लूट रहे थे। उसे चैतन्यता प्राप्त हुई। उसने अंगलाई ली और चोरों के कान खड़े हो गए। उसने संसार की गति की ओर दृष्टि फेरी। देखा, संसार को एक नया प्रकाश मिल गया है, और जाना कि स्वार्थपरायणता के इस अंधकार को बिना उस प्रकाश के पार करना असंभव है। उसके मन में हिलोरें उठीं, और अब हम उन हिलोरों के रत्न देख रहे हैं। जापान एक रत्न है- ऐसा चमकता हुआ कि राष्ट्रीयता उसे कहीं भी पेश कर सकती है। लहर रुकी नहीं। बढ़ी और खूब बढ़ी। अफीमची चीन को उसने जगाया और पराधीन भारत को उसने चेताया। फारस में उसने जागृति फैलाई और एशिया के जंगलों और खोहों तक में राष्ट्रीयता की प्रतिध्वनि इससमय किसी न किसी रूप में उसने पहुंचाई। यह संसार की लहर है। इसे रोका नहीं जा सकता। वे स्वेच्छाचारी अपने हाथ तोड़ लेंगे, जो उसे रोकेंगे, और उन मुर्दों की खाक का भी पता नहीं लगेगा जो इसके संदेश को नहीं सुनेंगे।

    भारत में हम राष्ट्रीयता की पुकार सुन चुके हैं। हमें भारत के उच्च और उज्जवल भविष्य का विश्वास है। हमें विश्वास है कि हमारी बाढ़ किसी के रोके नहीं रुक सकती। रास्ते में रोकने वाली चट्टानें आ सकती हैं। बिना चट्टानों के तो कोई रास्ता बड़ा और महत्व का रास्ता नहीं हो सकता। पर ये चट्टानें पानी की किसी बाढ़ को नहीं रोक सकतीं। परंतु एक बात है, हमें जान बूझकर मूर्ख नहीं बनना चाहिए। ऊटपटांग रास्ते नहीं नापने चाहिए। कुछ लोग हिंदू राष्ट्र चिल्लाते हैं। हमें क्षमा किया जाए, यदि हम कहें-नहीं, हम इस बात पर जोर दें – कि वे एक बड़ी भारी भूल कर रहे हैं और उन्होंने अभी तक राष्ट्र शब्द के अर्थ ही नहीं समझे।


    हम भविष्यवक्ता नहीं, पर अवस्था हमसे कहती है कि अब संसार में हिंदू राष्ट्र नहीं हो सकता,क्योंकि राष्ट्र का होना उसी समय संभव है, जब देश का शासन देशवालों के हाथों में हो। और यदि मान लिया जाए कि आजभात स्वाधीन हो जाए, या इंग्लैंड उसे औपनिवेशिक स्वराज्य दे दे, तो भी हिंदू ही भारतीय राष्ट्र के सबकुछ न होंगे। और जो ऐसा समझते हैं- हृदय से या केवल लोगों के प्रसन्न करने के लिए- वे भूल कर रहे हैं और देश को हानि पहुंचा रहे हैं।
    वे लोग भी इसी प्रकार की भूल कर रहे हैं और देश को हानि पहुंचा रहे हैं, वह लोग भी इसी प्रकार की भूल कर रहे हैं, जो टर्की या काबुल, मक्का या जेद्दा का स्वप्न देख रहे हैं। क्योंकि वे उनकी जन्मभूमि नहीं, और इसमें कुछ भी कटुता न समझी जानी चाहिए यदि हम ये कहें कि उनकी कब्रें इसी देश में बनेंगी और उनके मर्सिये-यदि वे इस योग्य होंगे तो इसी देश में गाए जाएंगे। परंतु हमारा प्रतिपक्षी-नहीं, राष्ट्रीयता का विपक्षी- मुंह बिचकाकर कह सकता है कि राष्ट्रीयता स्वार्थों की खान है। देख लो इस महायुद्ध को, इनकार करने का साहस करो कि संसार के राष्ट्र पक्के स्वार्थी नहीं हैं? हम इस विपक्षी का स्वागत करते हैं। परंतु संसार के किस वस्तु में बुराई और भलाई दोनों बातें नहीं हैं? लोहे से डाक्टर का घाव चीरने वाला चाकू और रेल की पटरियां बनती हैं, और इसी लोहे से हत्यारे का छुरा और लड़ाई की तोपें भी बनती हैं। सूर्य का प्रकाश फूलों को रंग-बिरंगा बनाता है, पर बेचारा उस मुर्दा लाश का क्या करे, जो उसके लगते ही सड़कर बदबू देने लगती है।



    हम राष्ट्रीयता के अनुयायी हैं, पर वही हमारी सबकुछ नहीं, वह केवल हमारे देश की उन्नति का

     उपाय-भर है।

    डिस्क्लेमरः पूरे होश ओ हवास में कह रहा हूं कि यही मेरे विचार हैं... जो मुझे उन गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले हैं... जिन्होंने राष्ट्र की एकता अखंडता के लिए कानपुर के दंगों में हँसते हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे... उनकी हत्या भी उन्हीं उन्मादियों ने की थी जो आज  भी राष्ट्र की हत्या का जतन कर रहे हैं... बावजूद इसके 104 साल बाद भी यह विचार उतना ही जीवंत और जरूरी है... जितना प्रथम विश्वयुद्ध का पहला साल खत्म होते-होते,  21 जून 1915 को साप्ताहिक प्रताप में छपते वक्त था... 25 साला युवक गणेश शंकर विद्यार्थी उस वक्त युद्धोन्माद की छाया में भी राष्ट्रीयता और जातीयता, राष्ट्रीयता और धार्मिकता, राष्ट्रीयता और सामाजिकता के बीच के फर्क को साफ-साफ देख रहा था और इस तथ्य से भलीभांति अवगत भी था कि राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से है न कि काल और परिस्थितियों से... यही नहीं राष्ट्रीयता और अंध राष्ट्रीयता के बीच के जिस बारीक अंतर को पकड़ पाने में बड़े-बड़े मनीषियों को गड़बड़ाते देखा गया, उसे भी उन्होंने स्पष्ट रेखांकित किया था... आज एक तरफ धर्म निरपेक्षता और दूसरी तरफ धर्म के बरक में लिपटी धार्मिक राष्ट्रीयता का दम तो तमाम लोग बढ़ चढ़कर भर रहे हैं, लेकिन ऐसी धर्म निरपेक्ष राष्ट्रवादी दृष्टि अपनाने का साहस कितने लोगों में है? इसका फैसला मैं पाठकों पर छोड़ता हूं...



  • मोदी रिटर्न्सः सियासी फकीर और आवाम की कसौटी...


    542 सीटें... 74 दिन और 90 करोड़ मतदाता.... जनता जनार्दन ने बड़ी तसल्ली से चौकीदार और नामदार को अपनी कसौटी पर कसा... जो लोग 70 साल में अपनों के साथ न्याय नहीं कर पाए थे... वह पूरे मुल्क को अब न्याय देने का दिलासा दे रहे थे... जाति और संप्रदाय के वो ठेकेदार जो सत्ता की मलाई काटने के लिए कभी भी एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते... उन्हें सियासी जरूरतों ने चुनावी कुंभ में बिछड़े खानदान की माफिक फिर मिला दिया... तमाम विरोधाभास के बावजूद दक्षिणपंथ के मुखालिफ खड़े सभी राजनीतिक संगठनों में एक साम्यता थी और वह था... मोदी विरोध...सियासत के बेहद मंझे और चतुर खिलाड़ी नरेंद्र दामोदरदास मोदी भी तो यही चाहते थे... पहले रोज से ही उनकी रणनीति रही कि लोकसभा 2019 का चुनाव महज उन्हीं पर केंद्रित होकर रह जाए...

    जानेमाने पत्रकार रवीश कुमार अपने हालिया लेख में एक शब्द का जिक्र करते हैं... साइलेंट वोटर... आखिर होते कौन हैं यह लोग... वह खुद ही उसका जवाब भी देते हैं.. एक ऐसा मतदाता जो सत्ता संस्थानों से बेहद डरा होता है... इसकी अपनी रणनीति होती है.... जिसके जरिए वह अचानक पूर्व निर्धारित सारे आंकलन पलट कर रख देता है.... रवीश, लालू यादव को कोट करते हुए आगे लिखते हैं कि लालू इसे बक्से से निकला जिन्न कहते थे....

    ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर यह डरे सहमे लोग आते कहां से हैं? इसका जवाब भी रवीश अपने इसी लेख में देते हैं... वह लिखते हैं कि लोकतंत्र में या तानाशाही में नागरिक कब साइलेंट हो जाता है इसके अलग-अलग कारण हो सकते हैं...अंग्रेजी में वह साइलेंट वोटर के आगमन को 'pluralistic ignorance' यानि, बहुलवादी अज्ञान में तलाशते नजर आते हैं... या यूं कहें कि वह हिंदुस्तानी आवाऔर लोकसभा चुनाव 2019 के जनादेश का खुला मजाक उड़ाते हुए तमाम साम्यवादी लेखकों की किताबों का उदाहरण देते हुए आगे लिखते हैं कि यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारें अचानक इसलिए भरभरा कर गिरीं क्योंकि सार्वजनिक रूप से जनता सरकार का समर्थन करती थी, मगर अकेले में विरोध करती थी... यानि वह सभी लोग जो किसी खास विचारधारा के समर्थकों के सामने उनकी तारीफ करते थे या यूं कहें कि हां में हां मिलाता रहे... और इसके उलट जब वह अपने लोगों के बीच में पहुंच कर उनकी खामियां गिनाता नजर आए... उसे ही बहुलवादी अज्ञानी कहा जाएगा... इस विश्लेषण तक पहुंचने की जल्दबाजी में वह सामाजिक मनोविज्ञान के अहम अध्याय सामाजिक सुरक्षा और मानवीय संबंधों एवं व्यवहार को न सिर्फ पढ़ना भूल जाते हैं, बल्कि उन्हें समझ और महसूस तक नहीं कर पाते...

    वह हिंदुस्तान के परिपेक्ष में इस शब्द की मनचाही व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि... जब लोगों को पब्लिक में बोलने की आजादी नहीं होती... भय होता है ... तो वे चुप हो जाते हैं... और... जब कभी ऐसे लोगों को मौका मिलता है बदलाव का... तो वह बड़ी से बड़ी सत्ताओं को उखाड़ फेंकते हैं... बावजूद इसके, वह पिछले तमाम साम्यवादी उदाहरणों को दरकिनार कर भारत जैसे वृहद लोकतांत्रिक मुल्क के साइलेंट वोटर को अलग से समझाने के लिए राजनीतिक दलों को प्रेरित करते हुए उन्हें सलाह भी देते हैं कि...उसे कैसे समझाया जाए, या इस व्यवहार को कैसे बदला जाए इसकी समझ राजनेताओं और राजनीतिक दलों को पहले विकसित कर लेनी चाहिए...

    तमाम विरोधाभासों के बावजूद मैं यही कहूंगा कि रवीश जी सोलह आने दुरुस्त हैं... वह इसलिए भी दुरुस्त थे कि लोकसभा 2019 के चुनावों में इसी साइलेंट वोटर ने विपक्ष के सारे कयास और उम्मीदों को सिरे से धो डाला... वह इसलिए भी दुरुस्त थे कि उन्होंने जिन सियासी मित्रों को साइलेंट वोटर को समझने की सलाह दी थी उन्होंने इस दिशा में रत्ती भर भी काम नहीं किया... वह इसलिए भी दुरुस्त थे क्योंकि सात दशकों के शासन काल में सबसे ज्यादा वक्त तक सत्ता में रहने वाला राजनीतिक दल यदि जनता को न्याय दिलाने की मुहिम छेड़े तो मौजूदा अन्याय के लिए साइलेंट वोटर किसे जिम्मेदार ठहराए...

    यह नंगा सच है कि, भारत के भाग्य का फैसला करने के लिए हुए इस चुनाव में आम मतदाता वाकई में डरा हुआ था... उसे डर था कि वह गलती से भी कहीं भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सियासी सियारों को न चुन बैठे... वह इसलिए भी डरा हुआ था कि उसे मंडल से लेकर कमंडल तक और गोधरा से लेकर मुजफ्फर नगर तक की सांप्रदायिक लपटें दिखाई पड़ रही थीं... वह इसलिए भी सहमा हुआ था क्योंकि इस बार वह महज वोट डालने की खाना पूर्ति न कर इस जिम्मेदारी को सलीके से अंजाम देना चाहता था... उसे इस बात का भी डर था कि कहीं उसका एक और गलत फैसला भावी पीढिय़ों पर भारी न पड़ जाए... मानो इस बार उसे चिढ़ सी हो गई थी डर की सियासत और उसके ठेकेदारों से...

    एक तरफ राफेल था तो दूसरी तरफ घोटालों की लंबी फेहरिस्त... एक तरफ चौकीदार और चायवाला था तो दूसरी तरफ नामदार सियासी सामंत... एक तरफ अजमाइश की गुंजाइश वाली उम्मीद थी तो दूसरी तरफ वही सात दशक का घुप्प अंधेरा... बस इसी चुनाव के दवाब और गलत फैसला होने के डर ने अधिकांश भारतीय मतदाताओं को निश्चित ही इस बार साइलेंट वोटर बना दिया, कहने के बजाय यह कहना ज्यादा उचित होगा कि साइलेंट पॉलिटिकल किलर बना दिया... दूसरी कड़वी सच्चाई यह है कि 74 दिनों तक आम हिंदुस्तानी अपने इसी डर से लड़ता रहा, लेकिन उसे इस डर को खत्म करने का न तो कोई तरीका मिला और ना ही कहीं से कोई हथियार या पैरोकार मिलता दिखा... दिखता भी तो कैसे.... हर तरफ तो बस एक ही अक्स और शोर छाया था... मोदी... मोदी और सिर्फ मोदी...

    23 मई... ठीक 12 घंटों की कशमकश... और घड़ी में रात के सवा आठ बजे... नरेंद्र मोदी एक बार फिर महाविजेता के तौर पर जनता से मुखातिब हुए... और बोले... कि सिर्फ सियासी पंडितों को ही नहीं समाज शास्त्रियों को भी अब अपनी पुरानी सोच पर विचार करना होगा... जनाब! यही वह शब्द हैं जिनमें साइलेंट वोटर के मोदी मय रुख की असल वजह छिपी हुई है... सियासत कहती है कि दूसरों को कटघरे में घसीटो लेकिन, खुद का कॉलर तो ऊंचा रखो... वहीं, समाज शास्त्र कहता है कि बदनाम होंगे तो नाम न होगा क्या? जबकि मनोविज्ञान के मुताबिक शैतान का नाम जितना ज्यादा लिया जाएगा वह उतना ही मजबूत होता जाएगा... मोदी के शब्दों और तीनों वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का अब भावार्थ समझें... आप भी बड़े भाई रवीश कुमार जी की तरह सिर्फ शब्दों के अनुवाद में उलझ कर न रह जाएं...

    भावार्थ यह है कि पूरे चुनावी संग्राम के दौरान जितनी बार भी सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार और अराजकता के आरो उछाले गए... विपक्षी ने अपनी करतूतें भी उतनी ही बार मतदाता को याद दिलाईं.... विपक्ष ने मोदी को शैतान साबित करने का चक्रव्यूह रचा, लेकिन वह भूल गए कि जिन आधारों पर उन्हें शैतान साबित करने की कोशिश हो रही है... उन पर तो आरोप लगाने वाले सभी महारथी महाशैतान साबित हो रहे है...यानि जिस हाथ की एक ऊंगली नरेंद्र दामोदर दास मोदी की तरफ उठ रही थी... उसी की हिस्सेदार चार उंगलियां विपक्ष की ओर..

    विपक्षी की आखिरी भूल खुद नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने बताई... दूसरे के अवगुण तलाशने की हड़बड़ाहट और जोश अजमाईश में अपने गुण मत भूल जाना... मतलब साफ है कि... पूरे चुनाव प्रचार में कांग्रेस और कम्युनिस्टों समेत पूरा विपक्ष देश के सामने राष्ट्र के विकास और मतदाताओं के भले का कोई ठोस रोड मैप नहीं रख सका... मोदी खुद मुद्दे भी बताते हैं जिन पर विरोधी उन्हें घेर सकते थे... वह कहते हैं कि उन्हें मंहगाई के मुद्दे पर घेरा जा सकता था... वह उठा सकते थे एकता, अखंडता और राष्ट्रवाद का परचम... वह ला सकते थे सांप्रदायिक और जातिवाद के टैग का नया प्रिंट आउट...

    इतना ही नहीं, विपक्ष में शामिल एक भी दल या मोदी की मुखालफत में जुटा एक भी अलमबरदार हिंदुस्तान की आवाम को विश्वास दिलाना तो दूर इतना भी नहीं कह सका कि... उनकी जीत किसानों की जीत होगी... नहीं कह सके कि उनकी सफलता युवा और छात्रों की सफलता होगी... वह नहीं बता सके कि उनका साथ मां बहिनों की सुरक्षा की गारंटी होगा... वह नहीं दिला सके भरोसा कि वह जहां खड़े होंगे वहां से सांप्रदायिकता और जातिवाद दफा हो जाएंगे... दंगे नहीं होंगे... उल्टा, हार से बौखलाए कथित युवा तुर्क हार्दिक पटेल ट्विट करते हैं कि... कांग्रेस नहीं बेरोजगारी हारी है... शिक्षा हारी है... किसान हारा है...महिला का सम्मान हारा है... एक उम्मीद हारी है... सच कहें तो हिंदुस्तान की जनता हारी है...

    अरे भाई पटेल साब ! आपकी लिस्ट के मुताबिक ये जो सारे हारे हैं न, वह पहली बार नहीं हारे... इससे पहले 15 बार और हार चुके हैं... कभी खानदान से... कभी विरासत से... कभी क्रांति की छलना से... कभी आतंकवाद से तो कभी... जाति... धर्म और साम्प्रदाय से... खेती, किसानी, मजदूरी, गरीबी और भुखमरी तो अब हार जीत के ट्रेंड से ही बाहर हो चुके हैं... टोटली आउट ऑफ फैशन... ओ भाई साहब, जरा कलेजा मजबूत कर लो... फिर सुनो... जनता के इस सिंहनाद को और समझो... दक्षिणपंथियों की दो सीटों से लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने की वजह...तो वह थी सिर्फ और सिर्फ मोदी... जिनकी सियासी चाल में पूरा विपक्ष इस कदर फंसा कि पुस्तैनी जमीन तक गंवा बैठा... साल 2014 के चुनाव में तो मोदी ने उनसे महज सियासी हिस्सेदारी ही छिनी थी, लेकिन इस बार के नतीजे से तो उन्होंने संपूर्ण विपक्ष के सामने अस्तित्व का संकट भी खड़ा कर दिया... जनता की हार का ट्वीट करने वाले हार्दिक को नहीं पता था कि वह जिस स्कूल में अभी पढ़ रहे हैं, मोदी कभी उसके प्रिसिपल रह चुके थे और आज कुलपति बन चुके हैं...

    हार से हताश विपक्ष ने ध्रुत सभा में ईवीएम को पांचाली बना डाला... एक मशीन के कपड़े उतारने से पहले अपने गिरेवां में झांक निज नाकामियाबी की वजह तक तलाशना जरूरी नहीं समझा... यह लोग कुछ करने के बजाय सिर्फ भाई रवीश कुमार का लेख ही पढ़ लेते तो भी काफी था... उनकी समझ में आ जाता कि भाजपा का मत प्रतिशत बढ़ाने वाला वही साइलेंट वोटर है जो सालों से डरा और सहमा हुआ खड़ा था...

    इस डरे सहमे वोटर को मोदी ने जीत का पहला पैकेज चुनाव से पहले सर्व किया था... वही आरक्षण जिस पर आजादी के पहले से ही सियासी रोटियां सेकी जा रहीं हैं... मोदी ने सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बावजूद न सिर्फ पुराने आरक्षण को बचाए रखा, बल्कि दस फीसदी सवर्णों को भी आरक्षण देकर सालों पहले बोई गई कटुता की खाई को पाटने के लिए इसी पुराने प्रोडक्ट की नई पैकेजिंग कर डर के मार्केट में फिर से लांच कर दिया... नतीजा, क्या अगड़ा और क्या पिछड़ा, क्या दलित और क्या सवर्ण सभी एक ही कूपे के सवार हो गए...

    दूसरा पैकेज था ब्रांड मोदी... पूरे चुनाव में विपक्ष खुद की रणनीति बना उसमें भाजपा को उलझाने और खुद को फॉलो कराने के लिए मोदी को मजबूर करने के बजाय, सिर्फ मोदी को ही घेरने के चक्कर में उनका फॉलोअर बना रहा... यही तो वह चाहते थे... कि भाजपा जो भगवा विचारों की ध्वजवाहक है वह लड़ाई के सीन से बाहर हो जाए... ताकि पार्टी की अब तक की सारी भूल और एजेंडे... चाहे वो गोधरा हो या फिर राममंदिर भुला दिए जाएं...

    तीसरा पैकेज मोदी खुद बताते हैं.... प्रचंड बहुमत के बाद माइक संभालते ही कर्मयोगी कृष्ण को टूल बना मोदी खुद की लड़ाई को राष्ट्र की लड़ाई साबित कर डालते हैं... चूं तक नहीं बोल सका कोई... आखिर बोलता भी कैसे क्योंकि सभी को अच्छे से पता है कि हिंदुस्तान में धर्म से ज्यादा राष्ट्र बड़ी कारगर अफीम साबित होता है...

    बाकी इलेक्शन पैकेज की परतें भी वह भाजपा मुख्यालय के बाहर ही यह कहते हुए खोल देते हैं कि.... विपक्ष ने पूरे चुनाव में सिर्फ मोदी को घेरा... क्योंकि वह जानता था सेक्युलरिज्म के टैग का प्रिंट आउटडेटिड हो चुका है... मतलब साफ है कि पूरा विपक्ष भाजपा से कथित रूप से डरे हुए अल्पसंख्यकों के नाम पर भी एकजुट नहीं हो सका... नतीजन, दशकों पुराना यह वोट बैंक कई हिस्सों में बंट गया... और उसके उलट सेक्युलरिज्म के टैग से डरा हुआ साइलेंट वोट अपने डर को खत्म करने के लिए एक मंच पर उतर आया... ऊपर से जातिवादी राजनीति से डरे हुए वोट ने भी उसका हाथ थाम लिया... आगे, मोदी विपक्षी अकर्मण्यता को बेनकाब करते हुए कहते हैं कि उन्हें मंहगाई के मुद्दे पर घेरा जा सकता था... उन्हें भ्रष्टाचार, ईमानदारी, 40 करोड़ मजदूरों के हक, युवाओं के आत्मसम्मान और किसानों की फाकापरस्ती, बीमारों के इलाज के मुद्दे पर भी घेरा जा सकता था, लेकिन मोदी नाम की अफीम खाए विपक्ष को इन सबका होश ही कहां था... रण तो था, लेकिन रणनीति नदारद थी... मौका तो था, लेकिन मोदी ने उसे मुमकिन नहीं होने दिया...

    इस कमजोरी का सबसे सटीक आंकलन किया राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने... वह अपने अग्रलेख में लिखते हैं कि... चुनाव किसी युद्ध की तरह हार जीत के लिए नहीं होते... विधायिका के लिए अच्छे जनप्रतिनिधि चुनने के लिए होते हैं... सभी दल अपनी-अपनी नीतियों द्वारा अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, तथा अपने घोषणा पत्रों के जरिए भविष्य की एक तस्वीर जनता के समक्ष रखते हैं...लेकिन, इस बार चुनाव पूर्व ही देश खंडित था... मूल्य और मर्यादाहीन था... असहिष्णु था.... जिनके विकास के लिए चुनाव हुए उनके सुख दुख की चर्चा तक नहीं हुई... और गिरावट इतनी कि पुराने मामले खोद निकाले गए।

    मोदी अच्छी तरह जानते थे कि पार्टी के आधे से ज्यादा नेता इस कदर नकारा हैं कि वह किसी भी सूरत में जीत नहीं सकते, इसीलिए तो उन्होंने उन प्रत्याशियों को विकास और काम के बजाय अपने नाम पर वोट मांगने की नसीहत दी... बेचारे मनोज सिन्हा जैसे कर्मठ कार्यकर्ता इस नसीहत को न समझ सके और वही गलती कर बैठे जो मोदी नहीं चाहते थे... नतीजा, हार गए... अखिलेश यादव भी तो हारे थे...बाबा हरदेव सिंह से लेकर शर्मिला इरोम तक लंबी फेहरिस्त है... ऐसी शख्सियतों की जिन्होंने पक्के ईमान से आवाम की सेवा का संकल्प लिया था... और मुल्क की तस्वीर बदलने का शानदार खाका खींचा था... लेकिन वह सभी मोदी जैसी पैकेजिंग नहीं कर पाए और हार गए... वयोवृद्ध पत्रकार के. विक्रम राव के शब्दों में समझें तो राजनेता वह बीन होता है... जिसकी धुन पर जनता सांप की तरह नाचने को मजबूर हो जाए... जो यह नहीं कर सकता वह राजनेता कहलाने के लायक नहीं है... यही तो हुआ इस चुनाव में... मोदी रूपी बीन की धुन पर साइलेंट वोटर नाचा और बुर्जुआ सियासी सल्तनत को जमींदोज कर गया....

    इन सभी के बीच एक और बड़ा सवाल कि चलो जीत गए, लेकिन जीत इतनी प्रचंड होगी यह किसी ने क्यों नहीं सोचा... तो जनाब इसका जवाब भी मोदी खुद ही देते हैं... वह अपनी जीत का क्रेडिट न तो भगवान राम को देते हैं और न ही भोलेनाथ को... न पार्टी के किसी आला नेता को और ना ही स्टार प्रचारकों को... वह क्रेडिट देते हैं पन्ना प्रभारियों को... असंख्य लोग नहीं जानते कि यह क्या बला है... तो जान लीजिए कि यही वो इंजन है जिसने मोदी की माल गाड़ी को राजधानी में तब्दील कर दिया... पार्टी का सबसे निचला पदाधिकारी... जिसने बूथ स्तर पर मतदाता सूची के पन्ने पर दशकों से दर्ज नामों को मतदान केंद्र तक लाकर न सिर्फ सबसे अहम जिम्मेदारी निभाई बल्कि विपक्षियों को आइना भी दिखाया कि ... आखिरी समय तक जब तुम प्रत्याशी नहीं तलाश पाए... तो भला तुम्हारे पास राष्ट्रीय से लेकर बूथ स्तर तक पार्टी का संगठनात्मक ढ़ांचा खड़े करने की न तो फुर्सत थी और न हीं तमीज... और मोदी ने इन पन्ना प्रमुखों को नमन कर विपक्ष को नसीहत दी कि अगले पांच साल तक ईवीएम को कोसने के बजाय जाओ पार्टी का संगठनात्मक ढ़ांचा फिर से खड़ा करके आओ... जाओ संसद से लेकर सड़क तक नई लड़ाई लड़कर आओ... फिर जनता सोचेगी कि तुम्हें सत्ता सौंपे या नहीं....

    अब जो आखिरी सवाल उठ रहा है, वह यह है कि जो हुआ सो हुआ, लेकिन अब आगे क्या... तो प्यारे विपक्ष जान लो... कि आगे हिंद महासागर और मोदी तुम्हें उसमें डुबो-डुबो कर मारने की योजना बना चुका है... यह मैं नहीं कह रहा... खुद मोदी ही कह रहे हैं... यकीन न आए तो प्रचंड जनाधार हासिल करने के बाद भाजपा मुख्यालय के बाहर राष्ट्र को संबोधित करने आए उस शख्स को एक बार फिर सुन और देख लो... यह हिंदुस्तान का नया शासक नहीं था... और ना ही जीत के नशे और दंभ से चूर कोई फासीवादी आताताई विजेता... गुरुवार रात सवा आठ बजे जनता के सामने आए नमूदार हुए नरेंद्र दामोदर दास मोदी... गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री या 16 वीं लोकसभा में चुने गए पूर्व प्रधानमंत्री भर नहीं थे... पूरी तरह से सधे और संभले हुए... मंझे राजनेता और भविष्य की समझ रखने वाले समाज शास्त्री के पैराहन में खड़ नए भारत की नई सोच वाले भविष्य की नई नींव रख रहे देश के नए मुखिया थे... यानि पूरी तरह से नए अवतार में उतरे नए नरेंद्र मोदी थे...

    उन्हें अच्छी तरह पता था कि पूरा देश इस बात से आशंकित है कि मोदी फिर से सत्ता में आए हैं तो कहीं नोटबंदी, जीएसटी और गोधरा जैसे पुराने कांड फिर न दोहरा जाएं... वह ममता बनर्जी के काट डालने मार डालने वाले बयानों को भी भूले नहीं थे... और ना ही इस बात को कि उनके खेमे में साध्वी प्रज्ञा और योगी आदित्यनाथ जैसे कट्टर भगवा धारियों की लंबी जमात शामिल है...


    यही वजह थी जो मोदी ने संबोधन शुरू करने के चंद सेकंड बाद ही अपने दल भारतीय जनता पार्टी के भाव को भारत माता की सच्ची सेवा और संविधान क असल समर्थन में अर्पित कर डाला... उन्होंने कट्टरता को परे धकेलने की भी जबरदस्त कोशिश करते हुए कहा कि दो से दोबारा आने के बाद भी उनके लोग नम्रता, विवेक, आदर्श और संस्कारों को नहीं छोड़ेंगे... इतना ही नहीं उन्होंने भविष्य का खाका उजागर करते हुए कहा कि आम आदमी की किस्मत संवारने के लिए न सिर्फ देश की एकता और अखंडता जरूरी है... बल्कि, आवाम की जिंदगी में सिर्फ दो ही जातियां शेष रह जानी हैं... पहली गरीब और दूसरी देश को गरीबी को मुक्त कराने के लिए अपना योगदान देने वालों की... उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यानि अहिंसा, सत्य और संघर्ष को अपनी मजबूती बनाते हुए कहा कि राष्ट्र उनकी सच्चे भाव के साथ उनकी 150वीं जयंति मनाएगा और आजादी की 75 वां जश्न.... उन्होंने संकल्प मांगा हिंदुस्तानी आवाम से कि 130 करोड़ लोग यदि संकल्प कर लें कि आने वाले पांच सालों तक वह उसी जज्बे और भावना से भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए अपना सर्वस्व झौंक देंगे जंगे आजादी में दिखाई पड़ा था... उन्होंने शुरुआती मिनटों में ही आर्थिक और सामाजिक रूप से स्वतंत्र भारत और समृद्ध भारत का ख्वाब करोड़ों लोगों की आंखों में भर दिया...

    वैमनस्य को परे धकेल उन्होंने विपक्ष की ओर खुले दिल से हाथ बढ़ाते हुए कहा कि चलो जो हुआ उसे भूल जाते हैं... कौन क्या बोला बात गई... लेकिन अब देश सभी को साथ लेकर चलाना है... क्योंकि लोकतंत्र के संस्थान, संविधान और राष्ट्रीय अवधारणा की आत्मा कहती है कि देश को सर्व सम्मति से चलाना है... इसलिए उन्होंने अपने सांसदों को सबक दिया कि उदंडता मत दिखाना इस जीत को नम्रता से स्वीकार करना... संविधान की छाया में चलना...

    खुद को फकीर घोषित करते हुए वह यह भी कहने से नहीं चूके कि जिस जनता जनार्दन ने प्रचंड बहुमत से उनकी झोली भरी है उसकी आशा, आकांक्षा, सपने और संकल्प आदि बहुत कुछ सरकार के कामकाज की शैली से जुड़ा है... समझता हूं इसके पीछे की उन भावनाओं को जिन्होंने उनकी जिम्मेवारी को और बढ़ा दिया है... इसलिए नए राष्ट्र का नया प्रधानमंत्री यानि नया मोदी खुले मंच से न सिर्फ घोषणा बल्कि, वायदा, संकल्प, समर्थन और प्रतिबद्धता जाहिर करता है कि... वह बद इरादे और बदनीयत से कोई काम नहीं करेगा... समय का हर एक पल और शरीर का हर एक अंश राष्ट्र एवं देश की सेवा में अर्पित कर दूंगा... इतना ही नहीं वह यह भी कहने से नहीं चूकते कि मैं मेरे लिए कुछ नहीं करूंगा... यानि जो तेरा है तुझको अर्पण... और आखिर में उन्होंने प्रेम और उत्साह के समंदर को कायदों से बांधने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी...

    नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने माना कि इन सबके बावजूद भी गलती हो सकती है... लेकिन, वह नहीं चाहते थे कि आवाम उन्हें नजरंदाज कर फिर से साइलेंट वोटर बन जाए... इसीलिए वह जनता जनार्दन से अपील करते हैं कि कसौटी की तराजू पर उन्हें हर रोज कसा जाए और उनकी हर कमी के लिए उन्हें न सिर्फ कोसा जाए, बल्कि बताया भी जाए, ताकि वह उसे वक्त रहते दुरुस्त कर सकें... मानता हूं तमाम लोगों को यकीन नहीं होगा... खुद मोदी को भी नहीं था... इसीलिए वह आखिर में यह कहने से भी नहीं चूके कि जो कहा है उसे जीने की भरपूर कोशिश करेंगे...

    अब देखना यह होगा कि आवाम खुद को स्वतंत्रता संग्राम के मुकाबिल समृद्ध भारत की स्प्रिट पर कितना कस पाती है... क्योंकि अब मुल्क को फॉलोअर नहीं चाहिए... खुद की लकीर खींच कर उसके फकीर बन सकें ऐसे लीडर चाहिए... वो ड्रीमर चाहिए जो बिलीवर और प्रफॉर्मर भी हो... सत्ता की कसौटी पर कसा जा सकने वाला सियासी फकीर भी चाहिए... जो मोदी की शक्ल में उसे फिलहाल तो मिल ही चुका है... बस जाति-मजहब, आदम और पंथ के बजाय भारत माता की जय का घोष करने वाली आवाम मुफ्तखोर स्वार्थी कबीलों के आगे कब तक टिक सकेगी यह देखने की बात होगी। बहरहाल, लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों के साथ ही सबकुछ पीछे छूट चुका है... बस अब नए मोदी और नए हिंदुस्तान की बात होगी... मोदी रिटर्न्स की बात होगी... सियासी फकीर और आवाम की कसौटी की बात होगी।



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