Vineet Singh

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Vineet Singh

Vineet is Sr. Print and Broadcast Journalist, Author, Columnist, Strategist, Believer, Dreamer and Performer. who covers topics pertaining to Indian politics, Crime Higher Education, tourism, Archeology and Society. He is Presently Working with Leading Hindi News Paper.

  • Kota, Rajashtan
  • +91 75990 31853
  • vineet.singh@in.patrika.com
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Professional Experineces

Started Career in Journalism As Trainee Reporter in Print Media and achieved Key Positions in Various Medium of Media Just Like Print, Electronic and Digital. As Journalist Exposed so many Scams like Pension Scheme, Scholarship Scheme and Drugs Mafia Network. During My Career Interviewed With Pm Narendra modi, Former PM Chandarshakhar, IK Gujral, VP Singh, Atal bihari vajpayee and so many National and International Political Leaders.I have also interviewed Dacoit Nirbhay Gujjar and Phoolan Devi.

work Experineces 18 Years As Journalist
Print Media 12 Year As Special correspondent With Rajasthan patrika, Outlook hindi, Danik Jagran, sahara samay
TV journalism 06 Year As Producer with CNEB, ANI, Janmat Tv (live india)
Digital media work with rajasthan patrika last 2 year

News

Coverage for Rajasthan Patrika,Dainik Jagran,India Today,Live India, CNEB News, Outlook Hindi, ANI etc.

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PhD in Mass Communication and Master Degree in Journalism and Mass Communication And Ex Faculty, Department of Mass Communication and Journalism, Bareilly College bareilly india

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  • OMG! तो इस एडिटोरियल की वजह से गई गौरी लंकेश की जान



    जानेमाने पत्रकार पी. लंकेश की बेटी ने पिता का पेशा अपनाने के साथ उनका नाम भी अंगीकार कर लिया और गौरी से गौरी लंकेश हो गईं... पत्रकारिता के क्षेत्र में खास मुकाम बनाने वाली गौरी लंकेश अपने पिता द्वारा स्थापित साप्ताहिक मेग्जीन 'लंकेश पत्रिके' के तीसरे पन्ने पर संपादकीय लिखती थीं। इस बार का संपादकीय फेक न्यूज़ के मुद्दे पर था और उसका टाइटल था - 'फेक न्यूज़ के ज़माने में'। पढ़ें पूरा संपादकीय फेक न्यूज के जमाने में... 
    ''इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज़ बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है. झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज़्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं. झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी. अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी. उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया. फैलाने वाले संघ के लोग थे. ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाज़िट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं. पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं. संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया. ये झूठ इतना ज़ोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है. ये सब झूठ है.

    इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा POSTCARD.NEWS नाम की वेबसाइट पर. यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है. इसका काम हर दिन फ़ेक न्यूज़ बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है. 11 अगस्त को POSTCARD.NEWS में एक हेडिंग लगाई गई. कर्नाटक में तालिबान सरकार. इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई. संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए. जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज़ रहते हैं उन लोगों ने इस फ़ेक न्यूज़ को अपना हथियार बना लिया. सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बग़ैर सोचे समझे इसे सही मान लिया. अपने कान, नाक और भेजे का इस्तमाल नहीं किया. पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सज़ा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायर होने लगी. इस ढोंगी बाबा के साथ  मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा. इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए. इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाज़ू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई. यह तस्वीर फोटोशाप थी.
    असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया. शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी. एक्चुअली पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था. अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है. पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं. 
    उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को ख़ूब वायरल हुआ. ध्रुव राठी ने उसका विश्लेषण किया था. ध्रुव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है. पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17अगस्ता के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया. ( गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे). ध्रुव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिया’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं. उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी. अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हज़ार नए करदाता जुड़े हैं. तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है. आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है. मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है. उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं. 

    उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रज़ी टीवी चैनलों ने ख़बर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है. वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30लाख बढ़ गया. उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं. बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं. संघ का ही काम करते हैं. जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया. जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए. इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे.
    आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं. ध्रुव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं. प्रतीक सिन्हा altnews.in नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं. होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है. साथ ही साथ THEWIERE.IN, SCROLL.IN, NEWSLAUNDRY.COM, THEQUINT.COM जैसी वेबसाइट भी सक्रिय हैं. मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई को उजागर किया है. इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं. इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं. इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना. कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में ज़ोरदार बारिश हुई. उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया. कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है. बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है. संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मज़ाक उड़ाना. जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था. लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है. 
    हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए. एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी. दूसरे फोटो में एक महीला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है. बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया. पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे. दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी. सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं. उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे. फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है. अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है, उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है. प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के ज़रिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी. पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है. पाकिस्तान का है जहां एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है.
    इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है. यह सवाल पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई. बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर क़ब्ज़ा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था. मगर फोटोशाप के ज़रिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे. लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया. ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मज़ाक उड़ाया. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक तस्वीर साझा की. लिखा कि भारत 50,000 किलोमीटर रास्तों पर सरकार ने तीस लाख एल ई डी बल्ब लगा दिए हैं. मगर जो तस्वीर उन्होंने लगाई वो फेक निकली. भारत की नहीं, 2009 में जापान की तस्वीर की थी. इसी गोयल ने पहले भी एक ट्वीट किया था कि कोयले की आपूर्ति में सरकार ने 25,900 करोड़ की बचत की है. उस ट्वीट की तस्वीर भी झूठी निकली. छत्तीसगढ़ के पी डब्ल्यू डी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया. अपनी सरकार की कामयाबी बताई. उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले. बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है.

    ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में हमारे कर्नाटक के आर एस एस और बीजेपी लीडर भी कुछ कम नहीं हैं. कर्नाटक के सांसद प्रताप सिम्हा ने एक रिपोर्ट शेयर किया, कहा कि ये टाइम्स आफ इंडिय मे आया है. उसकी हेडलाइन ये थी कि हिन्दू लड़की को मुसलमान ने चाकू मारकर हत्या कर दी. दुनिया भर को नैतिकता का ज्ञान देने वाले प्रताप सिम्हा ने सच्चाई जानने की ज़रा भी कोशिश नहीं की. किसी भी अखबार ने इस न्यूज को नहीं छापा था बल्कि फोटोशाप के ज़रिए किसी दूसरे न्यूज़ में हेडलाइन लगा दिया गया था और हिन्दू मुस्लिम रंग दिया गया. इसके लिए टाइम्स आफ इंडिया का नाम इस्तमाल किया गया. जब हंगामा हुआ कि ये तो फ़ेक न्यूज़ है तो सांसद ने डिलिट कर दिया मगर माफी नहीं मांगी. सांप्रादायिक झूठ फैलाने पर कोई पछतावा ज़ाहिर नहीं किया. 

    जैसा कि मेरे दोस्त वासु ने इस बार के कॉलम में लिखा है, मैंने भी एक बिना समझे एक फ़ेक न्यूज़ शेयर कर दिया. पिछले रविवार पटना की अपनी रैली की तस्वीर लालू यादव ने फोटोशाप करके साझा कर दी. थोड़ी देर में दोस्त शशिधर ने बताया कि ये फोटो फर्ज़ी है. नकली है. मैंने तुरंत हटाया और ग़लती भी मानी. यही नहीं फेक और असली तस्वीर दोनों को एक साथ ट्वीट किया. इस गलती के पीछे सांप्रदियाक रूप से भड़काने या प्रोपेगैंडा करने की मंशा नहीं थी. फासिस्टों के ख़िलाफ़ लोग जमा हो रहे थे, इसका संदेश देना ही मेरा मकसद था. फाइनली, जो भी फ़ेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करते हैं, उनको सलाम . मेरी ख़्वाहिश है कि उनकी संख्या और भी ज़्यादा हो.

  • आपातकाल, यातनाएं और अटल जी...


    23 जून 2003...'अटल जी' से मेरी पहली मुलाकात की यही तारीख थी... आपातकाल पर कुछ खास लिखने की ललक मुझे उन तक खींच ले गई... सोचा तो था कि आधे घंटे में निपटा कर लौट आऊंगा... लेकिन जब एक कमरे के घर में कदम रखा तो जाना कि यहां तो बलिदानों की पूरी दुनिया बसी पड़ी थी...असल में इस शख्स का नाम था वीरेंद्र कुमार...लेकिन हौसले इतने अटल थे कि... इस जन नायक के नाम के साथ ही जुड़ गया अटल...

    जेपी मूवमेंट का युवा तुर्क

    इस किस्से की शुरुआत हुई जेपी मूवमेंट से... बात 1975 की शुरुआत की है.. जब यूपी के सीएम हेमवती नंदन बहुगुणा एक सभा को संबोधित करने बरेली आए...एबीवीपी के इस तेजतर्रार नेता ने बहुगुणा को मंच से नीचे उतारकर उनके मुंह पर काला रूमाल फेंक दिया...हड़बड़ाए बहुगुणा जमीन पर गिर गए और भगदड़ मच गई... जैसे-तैसे पुलिस की कड़ी सुरक्षा में उन्हें पहले कोतवाली ले जाया गया... जहां से कपड़े बदलकर वह जीआईसी के मैदान में सभा को संबोधित करने पहुंच गए... लेकिन यह युवा तुर्क कहां मानने वाला था... पुलिस ने जब इन्हें जीआईसी में नहीं घुसने दिया तो साथियों की मदद से कॉलेज की चार दीवारी ही गिरा दी...और मंच पर चढ़कर बहुगुणा से माइक छीन लिया...यह मामला अभी निपटा भी नहीं था कि 24 जून 1975 की रात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी... वीरेंद्र को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलन फैलाने की जिम्मेदारी मिली थी... विपक्ष के संदेश एक शहर से दूसरे शहर पहुंचाना और विरोध प्रदर्शन के ठिकाने तय करने का काम दिया गया...

    मुखबिरी-गिरफ्तारी


    इस दौरान जनसंघ समेत विपक्षी दलों के बड़े-बड़े नेता गिरफ्तार हो चुके थे, लेकिन वीरेंद्र अभी भी पुलिस की पकड़ से कोसों दूर थे...जो भाजपा आपात काल के विरोध का श्रेय लेते नहीं थकती... उसी के बरेली महानगर अध्यक्ष रमेश आनंद ने वीरेंद्र की मुखबिरी कर दी... 28 अक्टूबर 1975 की शाम को अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात रहे बरेली के कोतवाल हाकिम राय ने वीरेंद्र को उनके घर से धर दबोचा... तलाशी के दौरान अलमारी से पोस्टरों का बंडल मिला...तो वह भड़क गया। वीरेंद्र को बड़ी खामोशी से पेट्रोल जीप नंबर एक से कोतवाली तक लाना, लेकिन वह पूरे रास्ते सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते आए। जिससे हाकिम राय खौल गया। कोतवाल हाकिम राय ने वीरेंद्र के साथियों और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलन की रणनीति उगलवानी चाही, लेकिन वह कामियाब नहीं हो सका।


    यातनाओं का दौर

    बड़े-बड़े अपराधियों का मुंह खुलवाने का दम भरने वाले हाकिम राय एक लड़के के सामने खुद को कमजोर पड़ता देख आग-बबूला हो गया। उसने रमेश आनंद को भी गिरफ्तार करवा लिया और उनके सामने ही वीरेंद्र अटल को बेइंतहा पीटने लगा। खुद थक गया तो छह सिपाहियों को बारी-बारी यह काम दिया, लेकिन वीरेंद्र फिर भी नहीं टूटे। हाकिम राय इतने पर भी नहीं रुका उसने मातहतों को एक प्लास खरीदने के लिए बाजार में भेज दिया। 29 अक्टूबर 2017 की सुबह वीरेंद्र की जिंदगी की सबसे खौफनाक सुबह थी। कोतवाल हाकिम राय उन्हें लेकर सीओ एके सिंह के कमरे में दाखिल हुआ और मातहतों को प्लास (प्लायर) लाने का हुक्म दिया। इसके बाद हाकिम राय ने सरकार को गिराने की साजिश रचने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गिरोह के सरगना वीरेंद्र का दायां हाथ पकड़ा और एक झटके में अंगूठे का नाखून खींचकर बाहर निकाल लिया। वीरेंद्र की तो छोड़ो उनकी मुखबिरी करने वाले रमेश आनंद तक चीख पड़े। यातनाओं का यह दौर तो अभी शुरु हुआ था। इसके बाद हाकिम राय ने एक-एक कर वीरेंद्र की सभी उंगलियों के नाखून खींच डाले, लेकिन यह युवा तुर्क इतने पर भी नहीं टूटा। हालांकि यातनाओं को देख रमेश टूट गए और संघ के प्रचारकों के ठिकाने बताने को राजी हो गए।
    दर्द से छटपटाते वीरेंद्र ने यहां भी हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने रमेश को गलत पते बताने के लिए राजी कर लिया।

    पूरी दुनिया में मचा हड़कंप 

    प्रचारकों की तलाश में हाकिम राय वीरेंद्र को लेकर पूरे शहर में घूमा, लेकिन उसे कोई सफलता हाथ नहीं लगी। हाकिम राय ने खून से लथपथ वीरेंद्र को जेल भेज दिया, लेकिन जेल में जब यह खबर फैली तो सारे कैदी वीरेंद्र का इलाज ना होने तक हड़ताल पर चले गए। आखिरकार रात को नौ बजे उनकी घायल उंगलियों पर पट्टियां बांधी गईं। इसी बीच अशोक सिंघल बरेली आए तो उन्हें लोगों ने पूरा घटनाक्रम बताया। सिंघल ने सुब्रह्मण्यम स्वामी से बात की तो उन्होंने यातनाओं भरी इस खबर को बीबीसी लंदन से ब्रॉडकास्ट करवाया। जिसके बाद तो पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया। 


    वीरेंद्र हो गया अटल

    बीबीसी के न्यूज ब्रेक करने के बाद मामला अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक जा पहुंचा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घिरता देख सरकार ने पूरे घटनाक्रम की जांच शाह आयोग को सौंप दी, लेकिन वहां इंसाफ नही मिल सका, लेकिन इस बीच वीरेंद्र जनता के नायक बन चुके थे और लोगों ने उनके हौसले को देखते हुए नया नाम दे डाला अटल जी। वीरेंद्र अटल जेल से तो छूट गए, लेकिन उन पर जघन्य अपराधों के 15 मामले लाद दिए गए। मीसा में भगोड़ा घोषित कर दिया गया। 1977 में जब चौधरी चरण सिंह ने बरेली में जनसभा की तो उन्होंने ही अटल जी को सभा में हाजिर करावाया। गजब का दिन था वो जब चौधरी चरण सिंह ने अपनी जगह वीरेंद्र अटल को भाषण देने के लिए खड़ा कर दिया। 50-60 हजार लोगों की भीड़ और 40 मिनट से ज्यादा का भाषण... चारों तरफ सन्नाटा पसरा था... बस कुछ सुनाई दे रहा था तो सुबकने की आवाजें... आखिर में चौधरी चरण सिंह उठे और उन्होंने ऐलान किया कि ... यूपी में सरकार बदलते ही कोतवाल हाकिम राय, सीओ एके सिंह और जिला कलक्टर माता प्रसाद को सस्पेंड करवा कर जेल भिजवाएंगे... इसके बाद तो पूरा मैदान जयकारों से गूंज उठा। हुआ भी ऐसा ही जब राम नरेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री बने तो सबसे पहला आदेश उन्होंने इन तीनों लोगों को सस्पेंड कर जेल भेजने का ही दिया। आज इमरजेंसी की 42वीं साल है और अटल जी को याद किए बिना यह दिन अधूरा ही रहेगा। नमन उनकी बहादुरी को उनके बलिदान को....




  • आम आदमी का हक छीनने वालों को मिले सजा



    हाल ही में एक हजार रुपए की रिश्वत लेने के मामले में एक पटवारी को चार साल की सजा सुनाकर कोटा के भ्रष्टाचार निवारण  न्यायालय ने नजीर पेश की कि रिश्वत में ली गई रकम भले ही मामूली हो, लेकिन आम नागरिक का शोषण करना गंभीर अपराध है। ऐसे में विश्वविद्यालय तो शिक्षा का वह मंदिर है जहां देश के भावी भविष्य को हकूक के लिए लडऩा सिखाया जाता है। संस्कारों की सीख देने के बजाय जब आम आदमी के हक को  छीनने का कृत्य किया जाएगा तो यहां पढऩे वाली युवा पीढ़ी और देश का भविष्य क्या होगा यह आसानी से समझा जा सकता है।




    कोटा विश्वविद्यालय का जन्म हुए डेढ़ दशक भी नहीं हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार और अराजकता की दीमक इसे अभी से चाटने लगी है। वर्ष 2012 से 2014 के बीच हुई नियुक्तियों में नियम कायदों को ताक पर रखकर तत्कालीन  कुलपति और बोम सदस्य  के बेटे-बहू के साथ-साथ राजनेताओं के करीबीयों को नौकरियां बांटकर जिस तरह आम नागरिक का हक छीनने का अपराध किया गया है, वह एक हजार रुपए की रिश्वत लेने के मामले से भी बड़ा और गंभीर है। 

    जोधपुर के जयनारायण व्यास विवि में भी इसी कालक्रम में रसूखदारों के रिश्तेदारों को नौकरियां बांटने का अपराध किया गया था। वहां हुए फर्जीवाड़े की जांच का जिम्मा सरकार ने कोटा विश्वविद्यालय के कुलपित प्रो. पीके दशोरा की अध्यक्षता में गठित समिति को सौंपा है।  प्रो. दशोरा के कार्यकाल में ही तत्कालीन कुलसचिव अंबिका दत्त चतुर्वेदी ने विधानसभा और सरकार की ओर से गठित जांच समिति की रिपोर्ट पर स्पष्टीकरण भेजकर माना था कि कोटा विश्वविद्यालय में भी भर्तियों के दौरान नियमों को ताक पर रखा गया, लेकिन अब वह दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय सरकार के आदेश पर अमल करने से कतरा रहे हैं। इतना ही नहीं जिस मामले में कार्रवाई के लिए सरकार विवि प्रशासन ही नहीं कुलाधिपति को भी पत्र लिख चुकी हैं उसकी नए सिरे से जांच के लिए कोटा विवि के अफसर नई जांच कमेटी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 



     वहीं दूसरी ओर एसीबी ने जोधपुर के मामले में आरोप तय कर आम नागरिक का हक मारने वाले अफसरों-बोम सदस्यों को  गिरफ्तार कर तीन महीने पहले जेल भी भेज दिया, लेकिन लगता है कि कोटा विश्वविद्यालय में रसूखदारों का चक्रव्यूह कुछ ज्यादा ही तगड़ा है। इसलिए जिस जांच समिति को एक महीने में रिपोर्ट देनी थी उसे दो साल से ज्यादा का वक्त लग गया और मार्च 2013 में तत्कालीन कुलपति, डीन, बोम सदस्य और फर्जी तरीके से नौकरी पाने वाले 14 लोगों के खिलाफ प्राथमिक पीई  (प्रकरण संख्या 95/2013)  दर्ज करने के बावजूद एसीबी आरोप तय करना तो दूर फर्जीवाड़े की जांच तक शुरू नहीं कर पाई है। वहीं सरकार के आदेश की समीक्षा करने की बात कह विवि के आला अफसर फर्जीवाड़े के आरोपियों को बचाने की कोशिश में भी जुट गए हैं। 


    राजस्थान पत्रिका जिस तरह कोटा विवि में हो रहे भ्रष्टाचार को लगातार बेपर्दा करता रहा है, भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों, राज्य सरकार और कुलाधिपति को भी उसी तरह इन मामलों में संलिप्त लोगों के खिलाफ गंभीर और त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि कोई कितना भी बड़ा रसूखदार हो  आम आदमी का हक मारने की हिम्मत ना जुटा सके। 





  • कोटा में कोचिंग चलाने के लिए अब करनी होगी इन नियमों की पालना


    राजस्थान में कोचिंग सेंटर्स खोलने के लिए सरकार दो साल पहले ही नियम एवं मानदण्ड तय कर चुकी है, लेकिन इसकी जानकारी पहली बार मंगलवार को सार्वजनिक हुई। विधानसभा में जब नियमों के बाबत पीपल्दा विधायक ने सवाल पूछा तो सरकार ने नियमावली को पटल पर रखा। सरकार की ओर से सदन में यह भी बताया गया कि नियमों की पालना की जिम्मेदारी स्थानीय निकाय एवं जिला शिक्षा विभाग को सौंपी गई है। 

    कोटा के पीपल्दा विधायक विद्याशंकर नंदवाना ने अतारांकित प्रश्न के जरिए कोटा शहर में कोचिंग सेंटर्स संचालित करने के लिए निर्धारित नियम व मानदंड की जानकारी मांगी थी। जिस पर सरकार ने मंगलवार को इन नियमों को विधानसभा के पटल पर रखा। हालांकि सवाल के जवाब में सरकार ने माना है कि अभी तक कोचिंग सेंटर संचालित करने की अनुमति मांगने के लिए कोई भी आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है। 
    विधानसभा के पटल पर रखे गए जवाब में सरकार ने बताया कि कोई व्यक्ति, सोसायटी, ट्रस्ट या व्यक्तियों के समूह द्वारा संचालित किए जाने वाले शैक्षणिक केन्द्र जहां 10 से ज्यादा विद्यार्थी अध्ययनरत हों, को राजकीय संस्था से निजी शिक्षण केन्द्र यानि ट्यूशन संचालित करने के लिए पंजीकृत होना चाहिए।

    एेसे कोचिंग संस्थान जहां 10 से अधिक लेकिन 100 तक विद्यार्थी एक समय में उपस्थित होते हों, वहां भवनों के मानदंड निर्धारित किए गए हैं। सड़क मार्गाधिकार न्यूनतम 40 फीट होना चाहिए।  भूखण्ड क्षेत्रफल न्यूनतम 300 वर्गमीटर हो तथा प्रत्येक अभ्यर्थी (एक पारी के विद्यार्थियों की संख्यानुसार) न्यूनतम 4 वर्ग मीटर सकल निर्मित क्षेत्रफल (प्रोजेक्शन, छज्जा एवं बालकनी के क्षेत्रफल के अलावा) होना आवश्यक है। इतना ही नहीं प्रत्येक कक्ष में आने-जाने का पृथक से द्वार होना चाहिए। इसी प्रकार प्रत्येक तल पर प्रवेश व निकास के लिए दो सीढियां होना अनिवार्य है। कॉर्नर के भूखण्ड जंक्शन की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं के मद्देनजर कोचिंग संस्थान खोलने के लिए नहीं दिए जाएंगे।  डेड एंड स्ट्रीट पर स्थित भूखण्ड व भवनों में कोचिंग संस्थान संचालित नहीं होंगे।

     छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय होना अनिवार्य है।एेसे कोचिंग सेन्टर जो अग्निशमन संबंधित प्रावधानों की अनुपालना नहीं करते, उन्हें निर्धारित समयावधि का नोटिस देते हुए एेसे भवनों की गतिविधि पर नगर निकाय की ओर से रोक लगाई जाए। कोंचिंग सेन्टर के लिए प्रस्तावित भवन में विद्यार्थियों के लिए केन्टीन, कोचिंग कार्यालय व स्टाफ रूम आदि गतिविधियां होंगी। 
    जिला शिक्षा अधिकारी कोचिंग सेन्टर का निरीक्षण कर संचालित कक्षाओं के क्षेत्रफल, आकार, बैठने की व्यवस्था, संबंधित सुविधाएं, जल व विद्युत आपूर्ति आदि का निरीक्षण करेंगे। इस आधार पर डीईओ संबंधित कोचिंग संस्थानों को निरीक्षण जारी करेंगे।

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  • चंबल की हसीन वादियों ने दुनिया भर में मचाई धूम



    हाड़ौती की हसीन वादियों की एक झलक  ने पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्रीज के दो धुरंधरों को ऐसा दीवाना बनाया कि वह नए वीडियो की शूटिंग करने के लिए 768 किमी तक खुद कार चलाकर कोटा आए। बड़ी खामोशी से तीन दिन तक गरडिय़ा महादेव और बूंदी फोर्ट में शुूटिंग की। इसके बाद 'मन भरिया' का खूबसूरत वीडियो जब दुनिया के सामने आया तो उसने धूम मचाकर रख दी। 

    कई सुपर हिट म्यूजिक एलबम का निर्देशन कर चुके अरविंदर खेरा को जब मशहूर पंजाबी म्यूजिक कंपोजर और लिरिक्स राइटर बी प्रॉक ने अपने नए गाने के लिए साइन किया तो वह खुशी से झूम उठे। बी प्रॉक पहली बार कोई गाना गा रहे थे, इसलिए खेरा के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी उसके खूबसूरत फिल्मांकन की। दुनिया भर में लोकेशन तलाश रहे खेरा की नजर अचानक राजस्थान पर्यटन के प्रमोशन वीडियो  'जाने क्या दिख जाए' पर पड़ी। आठ वीडियो की सीरिज में उन्हें सबसे ज्यादा  गरडिय़ा महादेव इलाके की लोकेशन ने लुभाया, लेकिन राजस्थान में मनमोहक हरियाली और बलखाती नदी की मौजूदगी उनके गले नहीं उतरी। नतीजन, हकीकत जानने के लिए खुद कोटा चले आए। गरडिय़ा महादेव आकर जब उन्होंने इठलाती चम्बल और घने जंगल देखे तो अवाक रह गए।


    अरविंदर खेरा ने बताया कि कोटा तक आने के लिए ना तो चंडीगढ़ से कोई सीधी ट्रेन थी और ना ही हवाई सुविधा, इसलिए दोनों ने फैसला लिया कि वे कार से ही 768 किमी का सफर तय करेंगे। जनवरी में छोटे से क्रू और कैमरा मैन के साथ वह कोटा पहुंचे और तीन दिन तक शूटिंग की। खेरा बताते हैं कि 4.36 मिनट के वीडियो में 60 फीसदी हिस्सा गरडिय़ा महादेव में चम्बल के किनारे फिल्माया गया है। बूंदी फोर्ट के भी चार खूबसूरत शाॉट्स लिए गए हैं। बाकी 30 फीसदी इंडोर शूट मनाली में पूरा किया गया। खेरा ने बताया कि 'मन भरिया' का म्यूजिक वीडियो 17 मार्च को लांच हुआ। हाड़ौती की खूबसूरत वादियों से सजे इस वीडियो को अब तक यूट्यूब पर 45 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं। वहीं म्यूजिक चैनल्स के टॉप-5 चार्ट में भी यह जगह बना चुका है।


    अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर हाड़ौती के पर्यटन को प्रमोट करने में जुटीं यूजीसी की रिसर्च अवार्डी एवं कोटा विवि की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनुकृति शर्मा कहती हैं कि बद्रीनाथ की दुल्हनिया के बाद म्यूजिक वीडियो से कोटा और बूंदी की खूबसूरती ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है, लेकिन हाड़ौती में अभी सौ से ज्यादा ऐसी लोकेशन हैं जो फिल्मकारों की नजर से छिपी हुई  हैं। राजस्थान सरकार को गुजरात सरकार की तरह शूटिंग लोकेशन को प्रमोट करने के लिए पर्यटन विभाग के पोर्टल पर इन जगहों की ब्रांडिंग करनी चाहिए। ताकि खूबसूरत लोकेशन की तलाश में जुटे फिल्मकारों को इनकी आसानी से जानकारी मिल सके।

     इससे न सिर्फ हाड़ौती में फिल्म टूरिज्म बढ़ेगा, बल्कि इस इलाके में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। कला और संस्कृति का प्रचार-प्रसार होगा सो अलग। बी प्रॉक और अरविंदर खेरा उनकी बात का समर्थन करते हुए कहते हैं कि कोटा और उसके आसपास का इलाका शूटिंग के लिए खासा मुफीद है। शांति से आप अपना काम कर सकते हैं। इसलिए सरकार को इन जगहों को प्रमोट करना चाहिए, ताकि हमारी तरह नई लोकेशन की तलाश कर रहे लोगों को मदद मिल सके।




  • खोट ईवीएम में नहीं, नेताओं की नीयत में है

    15 वीं लोकसभा के लिए वर्ष 2009 में हुए चुनावों ने ईवीएम पर पहली बार व्यापक पैमाने पर सवाल खड़े किए थे... एक ही लोकसभा सीट से लगातार छह बार चुनाव जीत चुके संतोष गंगवार इस बार अपना सातवां चुनाव हार गए... इसी साल फिरोजाबाद से रिकॉर्ड मतों से जीतने वाले अखिलेख यादव के सीट खाली करने के बाद हुए उप चुनावों में डिम्पल यादव अपना पहला चुनाव बहुत बुरी तरह हार गईं... हालांकि लोकसभा चुनाव में दूसरी बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल हो रहा था...लेकिन, जब सूचना के अधिकार में बरेली और फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर हुए मतदान की बूथबार जानकारी जुटाई गई तो ईवीएम सवालों के घेरे में खड़ी थी... हाल में संपन्न हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की तरह जो लोगउस वक्त हार गए थे, वह ईवीएम को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे... आज भाजपा और मोदी पर उंगली उठाई जा रही है, उस वक्त निशाने पर कांग्रेस और सोनिया गांधी थे...

    सूचना के अधिकार का नया-नया प्रयोग शुरु हुआ था। बस हर कोई भारत निर्वाचन आयोग से सवाल पूछने में जुटा था। आयोग के अफसर इन सवालों को देख घबड़ा रहे थे। इसका अंदाजा मेरे सवाल से लगाया जा सकता है। मैने बरेली और फिरोजाबाद सीट के बूथवार नतीजे मांगे थे, लेकिन आयोग ने मेरे पत्र को सभी राज्य निर्वाचन आयोगों के पास भेज दिया और उन्होंने जिला निर्वाचन अधिकारियों को। नतीजन करीब तीन साल तक मेरे घर इतनी चिट्ठियां आईं, कि पोस्टमैन रास्ता पूछना भूल गया। बावजूद इसके ईवीएम का भूत पकड़ में नहीं आ रहा था। आईआईटी दिल्ली से लेकर रुड़की और भेल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया के अफसरों तक से व्यक्तिगत मुलाकात की। ईवीएम को हैक करने के जितने दावे सामने आते गए उतने ही उसे टेंपर प्रूफ बनाने के सबूत भी मिलते गए। बावजूद इसके सवाल वहीं का वहीं था कि आखिर मतपत्र के आदिम युग की ओर लौटे बिना ईवीएम को और सशक्त कैसे बनाया जा सकता है। सबसे पहला सुझाव बड़े भाई सुधीर पाठक जी ने दिया कि हमें वोट डालने का कोई सबूत मिलना चाहिए। जिसके जवाब में बड़े भाई प्रमोद गुप्ता जी ने एटीएम का उदाहरण पेश किया कि जब पैसे निकालते हैं तो उसके बदले एक पर्ची निकलती है। ऐसे ही वोट डालने पर भी पर्ची निकले और हमें यकीन हो सके कि हमारा वोट उसी शख्स को मिला है जिसके चुनाव चिन्ह का हमने ईवीएम में बटन दबाया है। हालांकि सुधीर पाठक जी ने एक शंका व्यक्त की कि एटीएम की पर्ची का प्रिंट कुछ दिन बाद उड़ जाता है। सुधार की बड़ी कल्पना हमारे सामने थी, लेकिन निर्वाचन आयोग इसके लिए राजी नहीं हुआ तो हमने सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया, लेकिन इसी बीच ईवीएम पर आ रही अटपटी जनहित याचिकाओं से परेशान होकर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं पर जुर्माना लगाना शुरू कर दिया था। सुब्रहमण्यम स्वामी जैसे विद्वान भी इसका शिकार बने तो मेरी हिम्मत थोड़ी टूटी, लेकिन पाठक जी ने हौसला दिखाया। उन्होंने वकील और कोर्ट फीस के साथ-साथ जुर्माना लगने की स्थिति में उस रकम को भी वहन करने की जिम्मेदारी लेने की हामी भरी। गुप्ता जी भी पीछे नहीं हटे और वह भी इस यज्ञ में साझीदार हो गए।
    ईवीएम में सुधार करने और मतदान के बाद पर्ची निकलने की मांग को लेकर मैने दिसंबर 2009 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। जिस पर एक फरवरी 2010 को सुनवाई हुई। जुर्माने और सजा की आशंका से सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर रखा गया मेरा पहला कदम बेहद सहमा हुआ था, लेकिन जब कोर्ट ने मेरी याचिका को मंजूर करते हुए निर्वाचन आयोग को मेरी शंकाओं का समाधान करने एवं पर्ची की व्यवस्था करने का निर्देश दिया तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। हमारे वकील विवेक शर्मा जी तो खुशी से उछल ही पड़े। यहां से हुई शुरुआत इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में पेपर ट्रेल लगाने की। इस लड़ाई में नौकरी गंवानी पड़ी। तमाम अपनों ने साथ छोड़ा। कुछ ने तो याचिका की कॉपी तक राजनैतिक दलों को बेच डाली। खैर अंत भला तो सब भला। जब तक दिल्ली रहा तब तक पेपर ट्रेल को फॉलो किया। नई नौकरी ने शहर छुड़वाया। व्यस्तताएं बढ़ाई। जख्म भरे और शायद पेपर ट्रेल भी भुला दिया। आलम ये था कि इस दौरान कुछ खबरें छपी थीं,लेकिन मेरे पास एक भी नहीं थी। पुराने साथियों ने यूपी के पूरे विधानसभा चुनावों में उन्हें तलाशा, तब जाकर दो आज ही मिल पाई हैं।
    शुक्रिया आशीष इन्हें संभालकर रखने के लिए। काश तुम्हारी तरह दंभ में डूबे यूपी के नेताओं को भी ईवीएम में पेपर ट्रेल लगाने की याद रही होती तो आज ईवीएम पर सवाल उठाने के बजाय चुनाव से पहले सभी जगह पेपर ट्रेल लगाने की मांग कर लेते। लेकिन, जो भी हुआ अच्छा हुआ। कम से कम इस वक्त वह ईवीएम की आड़ में मुंह तो छिपा पा रहे हैं। यदि पेपर ट्रेल लग जाता तो उन्हें यह मौका भी नहीं मिलता। सच्चाई तो यही है कि खोट ईवीएम में नहीं नेताओं की नीयत में है। उसकी जांच के लिए कौन सा पेपर ट्रेल लगवाया जाए। सोचिए सुधीर-प्रमोद भैया। नई जनहित याचिका दायर करनी है।


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