बृहस्पतिवार, 12 अप्रैल 2012

"कलम से कोर्ट तक "............................................... दो दशक की लड़ाई, अखबार मालिकों को औकात बताई



वर्तमान संदर्भ में बात की जाये तो शायद ही कोई मीडिया संस्थान होगा जिसके कर्मचारी यानी तथाकथित पत्रकार नौकरी के लिए मालिकों के आगे पूंछ हिलाते न दिखें। नौकरी बचाने के दबाव में कलम का सिपाही को खुलेआम दलाल की भूमिका निभाते देखना आम बात हो गयी है। 
एक दौर ऐसा भी था जब सम्पादक की बात तो दूर छोटे से पत्रकार को भी सीधे आदेश देने में अखबार मालिक या प्रबंधकों के पसीने छूट जाते थे। दौर बदला कलम के सिपाही की भूमिका बदली और मिशन के इरादे शुरू हुआ काम धंधा बन गया लेकिन कुछ लोग अभी बिकने को तैयार नहीं चाहे उसके लिए उन्हें कितने भी दबाव झेलने पड़ें या कष्टमयी जीवन संघर्ष क्यों न करना पड़े। इसी की एक बानगी है डॉ. बचन सिंह सिकरवार जिन्होंने देश के प्रमुख हिन्दी अखबार अमर उजाला के मालिकों के आगे घुटने टेकने से न सिर्फ साफ इन्कार कर दिया बल्कि सम्पादकीय प्रभारी रहते हुए जन हित की खबरों को नित नयी ऊंचाई देना शुरू कर दिया। मालिकों ने बिना कारण बताये उन्हें कई अन्य कलमकारों के साथ नौकरी से बाहर निकाल फेंका लेकिन पत्रकारों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले इस सिपाही ने मालिकों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंक दिया। 
बीस साल से भी अधिक समय तक चले इस संघर्ष में साथियों ने मालिकों से समझौते कर हथियार डालने में अपनी भलाई समझी वहीं पत्रकारों को इंसाफ दिलाने के नाम पर लालाओं और सरकारों के बीच दलाल की भूमिका निभा रही तथाकथित पत्रकार यूनियनों ने उन्हें खुद से अलग करना ही बेहतर समझा। डॉ. सिकरवार फिर भी नहीं झुके और बीस साल तक अखबार मालिकों से लड़ते रहे और अंततः शानदार जीत दर्ज की। यह जीत किसी एक इंसान की नहीं और ना ही यह हार है उन मौकापरस्त मित्रों, अखबार मालिकों और पत्रकार संगठनों की जिन्होंने कभी ईमानदारी से पत्रकारों का हित नहीं देखा बल्कि मिसाल है हालिया नौजवान पीढ़ी के लिए कि मान-सम्मान और देश का लोकतंत्र- पत्रकारिता के मिशन को बचाये रखना है तो घुटने टेकने की बजाय संघर्ष करो। जनता का काम जनता के द्वारा और जनता के हित में यही मूल मंत्र है इस जीत का।
एक कलम के सिपाही की अखबार मालिकों पर दर्ज हुई पहली जीत की विस्तृत जानकारी इस प्रकार हैः-  इलाहाबाद ३अप्रैल। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री सुधीर अग्रवाल ने उ.प्र.औद्योगिक अधिनियम,१९४७(श्रम न्यायालय के आदेश/अधिनिर्णय )के अन्तर्गत कोई अट्ठारह वर्ष से अधिक पुराने मैसर्स अमर उजाला पब्लिकेशन बनाम अधिष्ठाता अधिकारी,श्रम न्यायालय आगरा तथा अन्य के मामले में श्रम न्यायालय ,आगरा के पत्रकार बचन सिंह सिकरवार को निलम्बन काल के निर्वाह भत्ता देने के निर्णय को उचित मानते हुए मैसर्स अमर उजाला पब्लिकेशन' पर पाँच हजार रुपए खर्चा देने का आदेश पारित करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी है।'
न्यायमूर्ति श्री सुधीर अग्रवाल ने मैसर्स-अमर उजाला पब्लिकेशन द्वारा दायर याचिका सी. संख्या-११२७८/१९९३ की गत ३ अप्रैल को सुनवायी करते हुए श्रम न्यायालय, आगरा के ६ फरवरी, १९९३ के उस निर्णय का सही ठहराते हुए याचिका को निरस्त कर दिया है इसमें उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स,आगरा शाखा के जिलाध्यक्ष एवं दैनिक अमर उजाला कर्मचारी संघ ' के उपाध्यक्ष, अमर उजाला के सम्पादकीय लेखक रहे डॉ.बचन सिंह सिकरवार के निर्वाह भत्ते के वाद में श्रमिक को निर्वाह दिये जाने का आदेश पारित किया था। अपने निर्णय में  माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने  मै.अमर उजाला पब्लिकेशन' के निर्वाह भत्ता न दिये जाने के पक्ष में दी गयी सभी दलीलों को निरस्त किया है। माननीय उच्च न्यायालय ने कहा कि उसका मानना है कि श्रम न्यायालय को पुनर्विचार का अधिकार नहीं है। लेकिन वह पाता है कि श्रम न्यायालय ने मै.अमर उजाला पब्लिकेशन'को श्रमिक को निर्वाह भत्ता देने का निर्देश देकर न्याय किया है। नियोक्ता के  ऐसे  निलम्बन को सर्वाच्च न्यायालय ने ओ.पी.गुप्ता बनाम भारत संघ एआइआर १९८७एससी २२५७ तथा महाराष्ट्र राज्य बनाम चन्द्रभान ताले (१९८३) ३ एससीसी ३८७ मामलों में अत्यन्त निंदनीय माना है, जहाँ नियोक्ता निलम्बित श्रमिक को किसी भी प्रकार का निर्वाह भत्ता न देकर भूखा मरने को छोड़ देता है। उपरोक्त विमर्श को दृष्टिगत रखते हुए उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद २२६ के अन्तर्गत दाखिल याचिका के मामले में श्रम न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप करने का प्राप्त विशेष
क्षेत्राधिकार का उपयोग करने का कोई कारण नहीं पाता है। अतः याचिका ५ हजार रुपए खर्च के साथ खारिज की जाती है। 
ज्ञातव्य है कि श्रम न्यायालय के ६फरवरी ,१९९३ निर्णय के खिलाफ मै.अमर उजाला पब्लिकेशन ने ३१ दिसम्बर, १९९३ में याचिका दायर की, जिसमें उसे अस्थायी स्थगन आदेश मिल गया था। इस याचिका में मै.अमर उजाला पब्लिकेशन' की ओर से यह आपत्ति की गयी कि श्रमिक ने अपने निलम्बन काल में उसके आदेश के बाद भी हाजिरी नहीं लगायी थी। इस कारण वह निर्वाह भत्ता प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है। इसके बाद १७ साल बाद माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री कृष्ण मुरारी ने गत २८.१०.२०१० के अपने निर्णय में मैसर्स अमर उजाला पब्लिकेशन की याचिका को बहुत समय बीत जाने के कारण खारिज कर दिया था। तदोपरान्त डॉ.सिकरवार ने ८.२.२०११ को मै.अमर उजाला पब्लिकेशन को माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के २८.१०.२०१० के निर्णय के प्रति भेजते हुए अपने रुके हुए निर्वाह भत्ते के भुगतान का नोटिस भेजा। इस पर मै. अमर उजाला ने पुनः माननीय उच्च न्यायालय में यह प्रार्थना करते हुए उक्त याचिका पर पुनर्विचार की प्रार्थना की, उनके अधिवक्ता विजय बहादुर सिंह सीनियर अधिवक्ता हैं। २८.१०.२०१०को उन्होंने अपनी बीमार होने की सूचना न्यायालय को भिजवायी थी, किन्तु न्यायालय ने याचिका को इन्फ्रक्चूअस करार देते हुए खारिज कर दिया। इसलिए न्यायहित में उस पर पुनर्विचार किया जाए, अन्यथा अपूरणीय क्षति होगी।  उसके नये अधिवक्ता श्री चन्द्रभान गुप्ता हैं जो उनकी कम्पनी के दूसरे मामले भी
देखते हैं।  
 वस्तुतः आगरा से प्रकाशित दैनिक अमर उजाला में श्रम कानूनों तथा वेतन आयोगों की संस्तुतियों का लगातार उल्लंघन हो रहा था जिससे पत्रकारों तथा दूसरे प्रेस कर्मियों में असन्तोष तथा आक्रोश व्याप्त था। परिणामतः अपने शोषण से छुटकारा पाने के लिए पत्रकारों तथा प्रेस कर्मियों ने सन्‌ १९९० में अमर उजाला कर्मचारी संघ' का गठन किया। इस संगठन की ओर से समाचार पत्र स्वामी और उपश्रमायुक्त को माँगपत्र दिये गए। इससे कुपित होकर समाचार पत्र स्वामियों ने संगठन के पदाधिकारियों का विभिन्न प्रकार से उत्पीड़न शुरू कर दिया। इसी कड़ी में अमर उजाला कर्मचारी संघ' के अध्यक्ष श्री उपेन्द्र शर्मा का मुरादाबाद स्थानान्तरण कर दिया गया। उपाध्यक्ष डॉ.बचन सिंह सिकरवार को दण्डित करने के इरादे से पहले उनसे सम्पादकीय लेखन, फिर हर सोमवार को प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक कॉलम देशदेशान्तर' का लिखाना बन्द करा दिया। तत्पश्चात उनसे सम्पादकीय पृष्ठ पर छपने वाले लेखों का चयन का कार्य भी छीन लिया गया। फिर फर्जी विवाद दिखाकर बचन सिंह सिकरवार को निलम्बित कर दिया गया। इसके पश्चात कोई डेढ़ साल तक निरन्तर अमर उजाला कार्यालय के दरवाजे पर हाजिरी लगाने के बाद उन्हें केवल एक माह निर्वाह भत्ता दिया। इसके लिए यह झूठा बहाना बनाया कि उन्होंने हाजिरी नहीं लगायी है इसलिए उन्हें निर्वाह भत्ता नहीं दे रहे हैं।  
 इस बीच मै.अमर उजाला पब्लिकेशन ने डॉ.बचन सिंह सिकरवार की सेवा समाप्ति के लिए अनुमोदन प्राप्त करने हेतु वाद संख्या २/१९९२ उ.प्र.औद्योगिक विवाद अधिनियम,१९४७की धारा ६-इ (३)के अन्तर्गत श्रम न्यायालय, आगरा में वाद दायर किया। जब उसमें अफलता मिलती दिखी, तो उस वाद को वापस लेने की अर्जी डाल दी। इस पर श्रम न्यायालय ने इस शर्त के साथ कि वह न्यायालय की पूर्व अनुमति के बगैर श्रमिक बचन सिंह सिकरवार का न तो स्थानान्तरण कर सकता, न पदावनती  और न ही  सेवा से पृथक कर सकता है। इसके बावजूद मैं.अमर उजाला पब्लिकेशन से श्रम न्यायालय, आगरा निर्देश की अवहेलना करते हुए घरेलू जाँच में दोषी पाये जाने के मनमाने निर्णय की आड़ में १७.६.१९९५ को सेवाएँ समाप्त करते हुए उनके सभी प्रकार के देय वेतन-भत्ते जब्त कर लिए। अभी डॉ. बचन सिंह सिकरवार ने अनुचित एवं अवैधानिक रूप से अपनी सेवा समाप्ति के खिलाफ मै.अमर उजाला पब्लिकेशन' से श्रम न्यायालय ,आगरा  में  विविध  वाद संख्या-३४७/२०३ चलाया हुआ है।
डॉ. बचन सिंह सिकरवार के पक्ष में हुए उक्त निर्णय को पत्रकारों ने सच्चाई की जीत बताया है उनका कहना है कि दुनिया देर जरूर है अन्धेर नहीं है। ताज प्रेस क्लब,आगरा के महामंत्री डॉ.उपेन्द्र शर्मा ने इस निर्णय पर प्रसन्नता व्यक्त की है। उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसियेशन (उपजा) आगरा शाखा  के उपाध्यक्ष अनिल गर्ग, महामंत्री सुनीत शर्मा, सचिव  धर्मेन्द्र चौधरी, डॉ.धर्मवीर सिंह चाहर, रामकुमार अग्रवाल ,वीरेन्द्र वार्ष्णेय ,विनोद अग्रवाल, हरी नारायन गुप्ता,विनीत सिंह, डॉ.अनुज सिंह सिकरवार, अपूर्व सिंह , रामकृपाल सिंह , धर्मवीर शर्मा आदि ने भी हर्ष व्यक्त किया है।

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

धरोहरों का संरक्षण....



जैसे कल की ही बात हो, छोटी सी कोमल मिट्टी के ढ़ेर पर बैठी बड़े जतन से घरौंदा बनाने में जुटी थी। कोमल की उम्र की तरह ही उसकी दुनियां भी बहुत छोटी थी जहां उसके मां-बाप के साथ कुछ छैनी-हथोड़े ही बसते थे। राजस्थान के छोटे से गांव में जब कोमल ने होश संभाला तो उसके कानों ने मां की आवाज से पहले पत्थरों को तराशते इन्हीं छैनी-हथोड़े की आवाज सुनी थी। गांव में अकाल पड़ा...न रोटी मिली न पानी...पूरा परिवार दाने-पानी की तलाश में दिल्ली की ओर पलायन कर गया। किसी को नहीं पता था कि जिस रास्ते पर वह चल पड़े हैं वहां न सिर्फ उन्हें काम मिलेगा बल्कि उनकी नन्ही सी कोमल को नई पहचान भी मिलने वाली है।
दिल्ली पहुंच कर कोमल के पिता सुन्दर को उनके एक रिस्तेदार ने आदिलाबाद किले में चल रहे जीर्णोद्धार के कार्य में पत्थर तराशने का काम दिला दिया। धूल-मिट्टी में खेलते मजदूरों के बच्चों को देख एक दिन अधीक्षण पुरातत्व अधिकारी मोहम्मद के.के. मन में इनके भविष्य की चिंता घर कर गयी। यहीं से शुरुआत हुई कोमल और उसके जैसे हजारों प्रवासी मजदूरों के बच्चों की नई जिंदगी की, जिनके मां-बाप देश की धरोहर बचाने में दिन रात जुटे थे लेकिन उसकी कीमत चुका रहे थे वो अपने बच्चों के भविष्य को अंधकार में झोंककर।
मोहम्मद के.के. ने साथी अधिकारियों के साथ मिलकर इन बच्चों को न सिर्फ पढ़ाने का बल्कि उनके लिए स्कूल ड्रेस सहित बाकी कपड़ों का इंतजाम भी किया। वर्ष 2008 में दिल्ली के आदिलाबाद किले से हुई यह शुरुआत तुगलकाबाद, कुतुब मीनार, पुराना किला, लाल किला और फिर सफदरजंग के मकबरे तक फैल गयी। जहां स्मारकों के संरक्षण में लगे मजदूरों के एक हजार से अधिक बच्चों को अब तक हिन्दी, अंग्रेजी और गणित विषय के आधारभूत ज्ञान की शिक्षा दी जा चुकी है। इस मुहिम में करीब तीन सौ मजदूर भी अक्षर ज्ञान हासिल कर चुके हैं।
ऐतिहासिक धरोहरों की खोज और उनके जीर्णोद्धार में लगे पुरातत्वविदों द्वारा देश के भावी भविष्य के संरक्षण की इस मुहिम को वर्ष 2011 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा ने भी काफी सराहा। भारत आये ओबामा को जब इस मुहिम की खबर लगी तो वह अपने प्रोटोकॉल को तोड़ कर इन बच्चों से मिलने पहुंच गये और भाव-विभोर होकर टूटी-फूटी हिन्दी में बस इतना ही बोल सके ऐसे ही पढ़ते रहो और आगे बढ़ते रहो।
बजट खत्म होने के कारण स्मारकों के जीर्णोद्धार का काम अगले वित्त वर्ष तक फिलहाल रोक दिया गया है। कोमल भी अपने गांव वापस लौट रही है लेकिन अब उसके हाथ में मिट्टी का घरोंदा नहीं बल्कि एक किताब है।

अनूठा रेप्लिका म्यूजियम

आमतौर पर भारतीय संस्कृति और स्थापत्य कला में रुचि रखने वाले पर्यटकों की पहुंच मुगल कालीन, राजपूताना और ज्यादा से ज्यादा कुछ एक दक्षिण भारतीय शैली की कलाकृतियों तक ही हो पाती है। जबकि हमारा देश मौर्य, कुषाण, शुंग, गंधार, कलचुरि और पल्लवकालीन जैसी दर्जनों अन्य कला शैलियों से भरा पड़ा है लेकिन इन्हें देख पाना धन और समय दोनों ही लिहाज से बेहद खर्चीला साबित होता है। ऐसे में यदि अधिकांश संस्कृतियों की स्थापत्य कला एक ही स्थान पर देखने को मिल जाये तो इससे सुखद संयोग भला दूसरा क्या हो सकता है।
सीरी फोर्ट स्टेडियम के पास चिल्ड्रन म्यूजियम के एक हिस्से में पुरातत्व विभाग ने एक अनूठा रेप्लिका (प्राचीन दुर्लभ मूर्तियों की हू-ब-हू नकल) म्यूजियम बनाया है। । यदि कुषाण काल (लगभग तीसरी शताब्दी) में बनी तपस्यारत भगवान बुद्ध की एक मात्र मूर्ति देखनी हो तो पर्यटकों को पाकिस्तान के लाहौर जाना पड़ता लेकिन अब वह दिल्ली में ही देखी जा सकती है। लगभग छठी शताब्दी के कलचुरी काल में निर्मित विभिन्न पशुओं की विशिष्टता का प्रदर्शन करती भगवान शिव की अदभुत मूर्ति की प्रतिकृति छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से ली गयी है। दूसरी शताब्दी की कृष्णकालीन गंधार कला का प्रतिनिधित्व करती मदोन्मत(नशे में डूबी) स्त्री जिसे उसका पति सहारा देकर उठाता नजर आ रहा है, मथुरा के मोहाली गांव से मिली मूल प्रतिमा की प्रतिकृति है।
आंध्र प्रदेश के चित्तूर में मिले दूसरी ही शताब्दी के पुरावशेषों में सबसे प्रमुख स्थान है एक मुखी शिवलिंग का। अभी तक जितने भी शिवलिंग मिले हैं यह उनसे न सिर्फ अलग है बल्कि अदभुत और प्राचीन भी है। इस मूर्ति में लिंग से वेग के साथ प्रकट होते शिव को प्रदर्शित किया गया है। इसी के साथ पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर भारत की मोनालीसा कही जाने वाली नौवीं शताब्दी की यक्षी शालभंजनिका की प्रतिकृति भी संग्रहालय में प्रदर्शित की गयी है।
रेप्लिका म्यूजियम के योजनाकार अधीक्षण पुरातत्वविद मोहम्मद केके बताते हैं कि यहां प्रदर्शित सभी कलाकृतियां अपनी मूल कलाकृतियों के आकार-प्रकार ही नहीं बनावट में भी समान हैं। जिन्हें देखकर असली और नकली का अंदाजा लगाना असम्भव है। इस म्यूजियम में दुर्लभ 150 कलाकृतियां की रेप्लिका लगाने की योजना है। पटना और बनारस कलाविद्यालय के दर्जनों छात्रों ने कई महीनों की महनत के बाद इन मूर्तियों में जान फूंकी है। अभी 25 कलाकृतियां तैयार की हैं, जिन्हें यहां प्रदर्शित किया गया है।



            पुनर्निमाण एवं जीर्णोद्धार

भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण विभाग की पहचान यूं तो ऐतिहासिक धरोहरों की खोज करने और प्राचीन इमारतों का संरक्षण करने वाले सरकारी महकमे के तौर पर होती है लेकिन अब यह महकमा बिखरे अवशेषों को इकट्ठा कर उनको पुराने स्वरूप में वापस लौटाने के काम को भी अंजाम दे रहा है।

दो दशक पहले इस काम की शुरुआत आगरा में मुगल सम्राट अकबर की इबादतगाह (जहां उसने दीन-ए-इलाही धर्म की शुरुआत की थी) को खोजने और बीच बाजार में स्थित इस ऐतिहासिक स्थल को अवैध कब्जे से मुक्त कराने के साथ हुई। मोहम्मद केके की यह योजना भारत सरकार को बेहद पसंद आयी और इसे पूरे देश में जोर-शोर से शुरू किया गया। अयोध्या में विवादित स्थल पर हुए उत्तखनन में पुरातत्व विभाग की टीम में अकेले मुस्लिम सदस्य मोहम्मद केके ही थे। वह बताते हैं कि उनके लिए सबसे मुश्किल काम  चंबल के बीहड़ों में गुर्जर-प्रतिहार वंश कालीन बटेसर मंदिर श्रंखला के लाखों अवशेषों को पुनः स्थापित करना रहा। दस्यू प्रभावित क्षेत्र होने के कारण सबसे पहले निर्भर गुर्जर जैसे दुर्दांत डांकुओं को मनाने में खासी मसक्कत करनी पड़ी, फिर शिवराज सिंह की भगवा सरकार में ऊंची पहुंच रखने वाले खनन माफियाओं ने इन अवशेषों की तस्करी करना शुरू कर दिया। प्रदेश सरकार के असहयोग से नाराज हो उन्होंने सीधे संघ प्रमुख सुदर्शन को चिट्ठी लिख सवाल कर डाला कि अयोध्या में एक मंदिर बनाने की बात करने वाली भाजपा मध्य प्रदेश की सत्ता में रहते हुए दो सौ मंदिरों की पुनः स्थापना में रोड़े क्यों अटका रही है, संघ के दखल के बाद कहीं जाकर शिवराज सरकार ने खनन माफियाओं पर अंकुश लगा और काम आगे बढ़ा। 200 मंदिरों की इस श्रंखला में से 70 मंदिरों को फिर से स्थापित करने के साथ ही उसे हैरिटेज साइट का भी दर्जा दे दिया गया है।
मोहम्मद की यह मुहिम अब दिल्ली में चल रही है। गालिब की हवेली सहित दर्जनों ऐतिहासिक इमारतों को अवैध कब्जे से मुक्त कराने के बाद अब लाल किले को पुराने मुगलिया स्वरूप में वापस लौटाने की योजना पर तेज गति से काम चल रहा है। इस योजना में मुगल काल के बाद लाल किले में बनी छोटी-बड़ी 150 इमारतों को ढ़हा दिया जायेगा, जिनमें अधिकांश का निर्माण अंग्रेजों ने अपने सैन्य दफ्तर चलाने के लिए किया था और जो मुगलिया इमारतें अंग्रेजों ने ढ़हा दी थीं उनका फिर से निर्माण किया जायेगा। हालाकि इसके लिए सर्वोच्च न्यायलय तक का दरवाजा खटखटाना पड़ा लेकिन अंत में सरकार और अदालत दोनों इसके लिए राजी हो गये।
मोहम्मद कहते हैं कि ऐतिहासिक इमारतें ही भारत की प्राचीन संस्कृति और इतिहास से रूबरू कराती हैं इसलिए देश की इन धरोहरों का संरक्षण किसी एक सरकार, विभाग या नागरिक की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पूरे देश की जिम्मेदारी है और वह अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह करने का प्रयास कर रहे हैं।
उन्हें धरोहरों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए राजीव गांधी ग्लोबल एक्सीलेंसी एवार्ड और सार्क कंट्री एवार्ड जैसे दर्जन भर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

सत्ता, सेक्स और इस्तीफा...


सत्ता, सेक्स और इस्तीफे का रिस्ता बेहद पुराना है। राजनीतिक गलियारों की चकाचौंध माननीयों को कब इस कदाचार की राह पर ले जाती है, पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तब तक वह अपने पद और प्रतिष्ठा दोनों से हाथ धो बैठते हैं। बस पीछे छूट जाती है बदनामी की फेहरिस्त जिसमें कोई अपना नाम तो शामिल नहीं कराना चाहता लेकिन जब शामिल हो जाता है तो यही कहता है कि काश अपने पूर्ववर्तियों से कुछ सबक हासिल कर लिया होता।
पार्टी विद डिफरेंस यानि भाजपा का कर्नाटक अध्याय उसे लगातार शर्मशार करने पर उतारू है। पहले भ्रष्टाचार के आरोपों में रेड्डी बंधुओं से नाता न तोड़ने की जिद और फिर इन्हीं आरोपों में घिरे अपने मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा को कड़ी मशक्कत के बाद हटा पाना। कर्नाटक का नाम आते ही जैसे केन्द्रीय नेतृत्व के पसीने छूट जाते हैं। इस बार परेशानी का सबब बनी सत्ता, सेक्स और इस्तीफे की वो फेहरिस्त जिसमें ताजा नाम जुड़ा है कर्नाटक के तीन भाजपाई मंत्रियों कृष्णा पालेमर, लक्ष्मण सावदी और सीसी पाटिल का। जनता की समस्याओं के समाधान के लिए पूरे प्रदेश के विधायक विधान सभा में जब अपने क्षेत्र की दुर्गम तश्वीर बयां कर रहे थे, तब ये तीनों माननीयलोकतंत्र के इस पावन मंदिर में अश्लील तश्वीरें देखने में व्यस्त थे। मीडिया ने जब रंगे हाथों धर दबोचा तो बगलें झांकने लगे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, पार्टी ने इस्तीफा ले इन्हें मंत्रीमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

इस बाबत जब हमने आरोपी पूर्व महिला एवं बाल कल्यांण मंत्री सीसी पाटिल से बात की तो उन्होंने बेदह चौंकाने वाला जवाब दिया। पाटिल अपनी सफाई में कहते हैं पहले तो मैं यह साफ कर दूं कि वह कोई अश्लील वीडियो नहीं थी। वह एक रेव पार्टी की वीडियो थी जो मत्स्य मंत्री कृष्णा पालेमर ने कुछ देर पहले दी थी। जिसे देखकर सहकारिता मंत्री लक्ष्मण सावदी से चर्चा कर रहा था कि इस तरह की रेव पार्टियों को कैसे रोका जाये।
सत्ता, सेक्स और सीडी की फेहरिस्त में सावदी, पाटिल या पालेमर कर्नाटक की भगवा राजनीति का पहला नाम नहीं हैं, इससे पहले साल 2010 में खाद्य मंत्री हरताल हलप्पा को अपने मित्र की पत्नी के साथ बलात्कार करने के आरोप में बेज्जत होना पड़ा था। हलप्पा के मित्र वैंकटेशमूर्ति ने मंत्री पर आरोप लगाया कि वह उनकी पत्नी से बदसलूकी करते हैं लेकिन उनकी गुहार हर किसी ने अनसुनी कर दी। व्यवस्था से हारकर वेंकटेश ने मंत्री की करतूतों की विडियो बनाने की ठान ली। इसी बीच मंत्री दौरे पर आते हैं और वेंकटेश के घर रुकने के साथ ही उनकी पत्नी से बलात्कार करते हैं। जब यह टेप सामने आया तो मंत्री ने राजनीतिक प्रतिद्वंदता करार दे इसे खनन माफिया रेड्डी बंधुओं की साजिश बता डाला।
येदुरप्पा काल में ही एक और मंत्री एमपी रेणुकाचार्य पर एक महिला नर्स एलए जयलक्ष्मी के साथ नाजायज सम्बंध रखने के आरोप लगे। बापू जी आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज, सिमोगा की इस नर्स ने दावा किया कि उसके दोनों बच्चे माननीय मंत्री की ही देन हैं। अनैतिकता की पराकाष्ठा तो तब हो गयी जब मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने इस मंत्री को बर्खास्त करने के बजाय प्रोन्नत कर कैबिनेट मंत्री बना दिया। नर्स आज भी इंसाफ के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रही है।
भाजपा के पूर्व थिंक टेंक गोविंदाचार्य कहते हैं कि जनप्रतिनिधि जब सत्ता के नजदीक पहुंचता है तो उसके निरंकुश और दुराचारी होने की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं क्योंकि सत्ता की ऐसी ताकत उसने कभी नहीं देखी होती है। दुराचार की इस फेहरिस्त में एक बात सामान्य है कि दुराचारियों का कोई न कोई संरक्षक सत्ता के शीर्ष पर बैठा होता है या फिर वह खुद को सत्ता के साथ सौदेबाजी के लिए सक्षम होता है।
गोविंदाचार्य की नजरों में इस समस्या का हल तभी सम्भव है जब जनता ऐसे दुराचारियों को खुद ही खारिज कर दे क्योंकि उनकी नजर में कानूनी पेचीदगीयां बेहद ज्यादा है और इसका फायदा उठाकर दुराचारी अक्सर बच जाते हैं।
उत्तर प्रदेश की ओर नजर डालें तो गोविंदाचार्य की बातों में काफी हद तक सच्चाई नजर आती है। आजादी के बाद से एक के बाद एक लगातार सत्ता,सेक्स और इस्तीफे का ऐसा दौर कभी नहीं देखा गया जैसा कि बीते एक दशक से इस प्रदेश में देखने को मिल रहा है। इस कलंक कथा की शुरुआत हुई कवित्री मधुमिता शुक्ला कांड से। उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार में मंत्री रहे अमरमणि त्रिपाठी पर कवित्री मधुमिता शुक्ला ने शारीरिक शोषण के आरोप लगाये। मामला चर्चा में आने के कुछ दिन बाद वह गायब हो जाती है और उसके परिजन त्रिपाठी पर हत्या कराने का आरोप लगाते हैं। मामला अदालत में पहुंचता है और अमरमणि के साथ-साथ उनकी पत्नी को कवित्री की हत्या का दोषी पाया जाता है। त्रिपाठी की न सिर्फ कुर्सी छिनती है बल्कि सपत्नीक उन्हें लम्बे समय के लिए जेल भी जाना पड़ता है।
बसपा सरकार के ही एक और मंत्री थे आनन्द सेन। खाद्य एवं रसद मंत्री सेन पर वर्ष 2007 में अवध विश्वविद्यालय की एक छात्रा शशि के साथ अवैध सम्बंध बनाने का खुलासा होता है। मधुमिता की तरह शशि भी गायब हो जाती है। सेन के खिलाफ मामला दर्ज होता है और पुलिस उनके घर छापा मारती है, शशि के लिखे कई प्रेम पत्र बरामद करने के बाद प्रेमिका की हत्या के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है।
बसपा सरकार में ही यूपी फिशरीज कॉर्पोरेशन के चेयरमैन राममोहन गर्ग पर भी एक महिला को बंधक बना उसके साथ लगातार पांच साल तक बलात्कार करने का आरोप लगा। वहीं बसपा से बांदा के विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी पर भी एक नाबालिंग लड़की के साथ बलात्कार का आरोप लगता है, मामला खुला तो उन्हें जेल जाना पड़ा।
इसी बीच बसपा के एक और विधायक योगेन्द्र सागर पर भी स्नातक की एक छात्रा ज्योति को शादी का झांसा देकर बलात्कार करने के आरोप लगे। बदायूं से विधायक सागर के खिलाफ लड़की की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर तो लिया लेकिन उसे गिरफ्तार करने में पुलिस को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा। इस दौर में मानो माननीयों के बीच दुराचार मामलों में फंसने की होड़ सी मच गई थी।
बसपा के कदाचारी विधायकों की फेहरिस्त में अगला नाम जुड़ने वाला था डिबाई (बुलंदशहर) के विधायक भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू का। गुड्डू पर भी आनन्द सेन और योगेन्द्र सागर की तरह एक छात्रा को शादी का झांसा दे बलात्कार के आरोप लगे। आगरा विश्वविद्यालय की शोध छात्रा शीतल के साथ गुड्डू ने कई बार शारीरिक सम्बंध बनाये और बाद में जब शीतल ने शादी करने के लिए दवाब डाला तो उसे जान से मारने की धमकी दी गयी। शीतल ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया लेकिन गुड्डू ने सत्ता की हनक दिखा पुलिस को दबाने की कोशिश की। बाद में जब मीडिया ने पुलिस और गुड्डू की सांठ-गांठ की पोल खोली तो न सिर्फ पुलिस को उसे गिरफ्तार करना पड़ा बल्कि मायावती ने भी पार्टी से बेदखल कर दिया।
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं कि नैतिक रूप से पतित राजनेताओं की सदस्यता खत्म करने का संविधान में प्रावधान है लेकिन भारतीय लोकतंत्र की कमजोरी कहें या ताकत कि जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाते तब तक किसी को सजा नहीं दी जा सकती। इसी का फायदा उठाकर शातिर राजनेता अक्सर बच निकलते हैं। इस बीमारी को खत्म करने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की आवश्यक्ता है लेकिन मिली-जुली सरकारों के इस दौर में किसी दल या व्यक्ति से इस तरह की उम्मीद बेमायने है।
इसे राजनीति का घिनौना चेहरा ही कहेंगे कि बसपा से बेदखल किये गये गुड्डू को अपने पाले में लाने की दूसरे राजनीतिक दलों में होड़ सी मच गयी थी। बाजी समाजवादी पार्टी के हाथ लगी और उसे आसन्न विधान सभा चुनाव में प्रत्याशी भी घोषित कर दिया गया।
वर्ष 2005 में जब उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार थी तब एक हाई प्रोफाइल सेक्स, सीडी और हत्या का मामला सामने आया था। मेरठ विश्वविद्यालय की 29 वर्षीय शिक्षिका डॉ. कविता रानी के परिजनों ने मुलायम सिंह सरकार के दो कद्दावर मंत्रियों मेराजुद्दीन और बाबूलाल पर आरोप लगाया कि उन्होंने कविता का शारीरिक शोषण करने के बाद उसकी हत्या करवा दी है। कविता का मोबाइल खंगाला गया तो दोनों मंत्रियों से कई-कई घंटे बात करने के रिकार्ड मिलने के साथ-साथ एक सेक्स सीडी भी बरामद हुई। लोकदल कोटे के दोनों मंत्रियों बाबूलाल और मेराजुद्दीन को बर्खास्त कर दिया गया लेकिन इसी बीच रविन्द्र प्रधान नाम के एक शख्स को पुलिस ने हत्या के इस हाई प्रोफाइल मामले का मुख्य अभियुक्त बता जेल भेज दिया। जहां उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गयी।
लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी कहते हैं कि लोकतंत्र की स्थापना के शुरूआती दौर में घटे कदाचार के मामले भले ही संख्या में कम और आर्थिक पहलुओं से जुड़े क्यों न हो लेकिन इनका दूरगामी प्रभाव आज की राजनीति में देखने को मिल रहा है। श्री चटर्जी कहते हैं कि यदि लाल बहादुर शास्त्री जी की तरह बाकी राजनेताओं ने भी कदाचार के मामलों में सख्त कदम उठाये होते तो वह एक नजीर साबित होते और आने वाले दिनों में कोई भी इस तरह की भूल करने का जोखिम न उठाता, लेकिन ऐसा न हो सका।
बीते दिनों सुल्तानपुर के सपा विधायक अनूप का मामला भी खासा चर्चा में रहा। ब्यूटीशियन का काम करने वाली एक महिला समरीन ने विधायक पर आरोप लगाया कि वह शादी का झांसा देकर कई सालों से उसका शारीरिक शोषण कर रहे हैं। समरीन ने अनूप के रिश्तों से एक बेटी होने का दावा भी किया लेकिन मामला आपसी रजामंदी से निपटा लिया गया।
इस तरह पैदा हुई संतानों के मामले में कुछ बड़े राजनेताओं ने तो बवाल से बचने के लिए अन्दर खाने उन्हें स्वीकार कर लिया लेकिन कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता एनडी तिवारी झुकने को तैयार नहीं दिखते। अदालती आदेशों के बावजूद वह न तो अपना डीएनए सेम्पल दे रहे हैं और ना ही शेखर तिवारी को अपनी संतान मानने को तैयार हैं। ऐसा नहीं है कि तिवारी के खिलाफ यह इकलौता मामला हो। सत्ता, सेक्स और इस्तीफे के इस खेल में वह आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहते हुए भी फंसे थे। 25 दिसम्बर 2009 को हैदराबाद के एक चैनल ने तिवारी को तीन महिलाओं के साथ रंगरेलियां मनाते दिखाया था। यह वीडियो, चैनल द्वारा किये गये एक स्टिंग ऑपरेशन का हिस्सा था लेकिन तिवारी इसे राजनीतिक षणयंत्र बताते रहे। हालाकि यह बात अलग है कि उन्होंने अगले ही दिन यानि 27 दिसम्बर 2009 को पद से इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत कहते हैं कि राजनेताओं के नैतिक पतन से न सिर्फ उन्हें समाज में बेज्जत होना पड़ता है बल्कि उनकी पार्टी को भी खासी जलालत झेलनी पड़ती है। श्री रावत कहते हैं कि आरोप लगने के बाद इस्तीफा देना सिर्फ रस्म अदायगी बन गया है। इससे सिर्फ मुंह छिपाया जा सकता है लेकिन जनता की नजरों में राजनीति की गिरती साख को नहीं बचाया जा सकता। इसके लिए जनता को ही आगे आना होगा और चरित्र से कमजोर नेताओं को राजनीति से बेदखल करना होगा।
 बीते दिनों राजस्थान की राजनीति में भी सत्ता, सेक्स और सीडी ने जमकर कोहराम मचाया। राजस्थान की लोक गायिका और पेशे से नर्स भंवरी देवी के कई राजनेताओं से अन्तरंग सम्बंध थे, जिनमें से प्रमुख नाम थे प्रदेश सरकार के मंत्री महीपाल मदेरणा और कांग्रेसी विधायक मलखान सिंह। भंवरी ने जब इन लोगों को अपने अंतरंग सम्बंधं की सीडी बनाकर ब्लैकमेल करना शुरू किया तो उसकी हत्या करवा दी गयी। मामला मीडिया में उछला तो प्रदेश सरकार ने सीबीआई को जांच सौंप दी। जांच में दोनों नेताओं और भंवरी के पति सहित 6 लोगों को उसकी हत्या की साजिश रचने का आरोपी पाया गया। मदेरणा ने कांग्रेस मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया।
देश के प्रमुख उद्यमी एवं सांसद राहुल बजाज इसके लिए पारदर्शिता की कमी और कानूनी पेचीदगी को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं कि यदि बड़े राजनीतिक दलों की कार्यशैली में पारदर्शिता होती तो ऐसे कांड होते ही नहीं। इतना ही नहीं कदाचार के मामलों को सालों लटकाने की बजाय आरोपी को जल्द से जल्द न सिर्फ राजनीतिक मंच से बल्कि समाजिक रूप से भी बहिष्कृत करने की सजा दी जाती तो आने वाली पीढ़ियां ऐसा करने की हिम्मत न जुटा पातीं।
सेक्स और सीडी ने कांग्रेस ही नहीं भाजपा की भी जमकर फ़जीहत कराई। वर्ष 2003 में उत्तराखंड में कांग्रेस नेता और तत्कालीन मंत्री हरक सिंह रावत को भी ऐसे ही मामले में मंत्री पद खोना पड़ा। वहीं भाजपा को सिर्फ कर्नाटक जैसे राज्यों में सीडी कांड नहीं झेलने पड़े बल्कि केन्द्रीय नेतृत्व के हाथ भी सीडी कांड की आंच में झुलस गये। वर्ष 2005 में भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन के दोरान राष्ट्रीय महासचिव संगठन संजय जोशी के अंतरंग सम्बंधों वाली एक सीडी बांटी गयी। जोशी ने पद से इस्तीफा दे दिया लेकिन बाद में चली जांच में पाया गया कि सीडी फर्जी है। जोशी की वापसी तो हो गयी लेकिन वह पद और प्रतिष्ठा फिर वापस न मिल सकी।
भाजपा नेत्री उमा भारती कहती हैं कि कई मामलों में राजनेताओं को उनके प्रतिद्वंदियों द्वारा फसाया जाता है। इसलिए किसी नेता को आरोप सिद्ध होने तक राजनीति से बाहर नहीं कर देना चाहिए। हां, यदि आरोप सिद्ध हो जाये तो उसके खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए और जनता को भी उसका बहिष्कार कर देना चाहिए।
अंततः कहीं तमाचों की गूंज तो कहीं फिकते जूते-चप्पल.... चेहरों पर जब पोती जाने लगे कालिख़ तो भला माननीय किस मुंह से कहेंगे कि... दाग अच्छे हैं! देश का संसदीय इतिहास गवाह है कि कथित सफेदपोशों की जमात ने खुद माननीयों की साख पर कालिख पोती और काजल की कोठरी कहकर बदनाम राजनीति को किया। जनता ने चुनकर भेजा था विकास की योजनाएं बनाने और उसके हक की आवाज उठाने के लिए लेकिन लोकतंत्र के मंदिर में जब निर्वाचन क्षेत्र की दुर्गम तश्वीर अश्लील वीडियो के नीचे दबा दी जाये तो जनता क्या करे? आवश्यक्ता अविष्कार की जननी है और अविष्कार जन्म लेता है सवालों की कोख से, सवाल अब यही है कि राजनीति के ऐसे दाग कैसे धोये जायें ?

बुधवार, 14 दिसम्बर 2011

ये बैंक ले डूबेंगे !


ग्रीस जैसी सरकारों के कारण बर्बाद होती बैंक हों या फिर बैंकों के कारण बर्बाद होती आयरलेंड या अमेरिका जैसी सरकारें, वित्तीय व्यवस्था की यह करिश्माई संस्था हमेशा संकट के शूत्रधारों में शामिल रही है।

 
किसी भी देश की अर्थ व्यवस्था में वहां के बैंकों का अहम योगदान होता है क्योंकि यही वह संस्था है जिससे न सिर्फ छोटे से लेकर बड़े उद्यमियों की आर्थिक जरूरतें पूरी होती हैं बल्कि आम जनमानस किसी न किसी रूप में यहां पूंजी निवेश कर खुद को बेहद सुरक्षित महसूस करता है। बैंकिंग प्रणाली का यह रुपहला अंदाज बेहद आकर्षक है लेकिन जब किसी बैंक की तबियत बिगड़ती है तो न सिर्फ आम पूंजी निवेशक के माथे पर बल पड़ जाता है बल्कि देश की अर्थ व्यवस्था के लिए भी यह स्थिति बेहद चिंताजनक होती है।
अमेरिका के सबसे बड़े बैंक लेहमन ब्रदर्स के डूबने पर दुनियां भर में जो हाहाकर मचा था उसे भला कैसे भूला जा सकता था। सिर्फ एक बैंक की माली हालत खराब हुई तो न सिर्फ अमेरिका बल्कि विश्व अर्थ व्यवस्था में फिर से मंदी के काले बादल छाने लगे थे। एक लम्बा अरसा बीत जाने के बाद भी लेहमन प्रभाव से विश्व बाजार अभी तक बाहर नहीं निकल सका है, रही बात अमेरिका की तो दुनिया के सबसे बडी आर्थिक विरासत लाख प्रयत्न करने के बावजूद कंगाली को टाल नहीं पा रही है। यकीनन बैंकों का मामला बेहद संगीन होता है।
अमेरिकी या यूरोपियन बैंकों की ही बात क्यों की जाये भारतीय बैंकों ने भी जोखिम का ढेर सारा बारूद अपने इर्द-गिर्द जुटा रखा है, बस पलीते का इंतजार है। भारतीय बैंकिंग में शायद यह पहला मौका है जब दिनों-दिन गिरती औद्योगिक ग्रोथ, रसातल में जाता रुपया और मंहगाई के चलते फंसते कर्ज से लेकर घटते रिटर्न ऐसे जाग्रत ज्वाला मुखी बन कर उभरे हैं कि यदि इनमें विस्फोट हुआ तो न सिर्फ बैंक तबाह होंगे बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जायेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि यहां अधिकांश बैंक सरकारी हैं और इन बैंकों को अपनी जिस पूंजी के डूबने का डर सता रहा है वह भी सरकारी या अर्ध सरकारी योजनाओं को ही कर्ज के रूप में दी गयी है।
बैंकिंग क्षेत्र के लिए यह खतरे की घंटी हाल ही में मूडीज के रेटिंग घटाने के बाद बजी। वैसे मूडीज ने यह रेटिंग यूं ही नहीं घटाई। इसकी सबसे बड़ी वजह बैंकों का गिरता एनपीए (अन उत्पादक खाते) है। बैंकों के पास ऐसे तमाम सरकारी और कॉर्पोरेट कर्जदार हैं जिन्हें बिगड़ते वैश्विक आर्थिक माहौल में कर्ज चुकाने में दिक्कतें आ रही हैं। इसी के चलते पिछली तिमाही में देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक का न सिर्फ मुनाफा 12 फीसदी गिरा बल्कि एनपीए में भी दो फीसदी की बढ़त दर्ज की गयी। सितम्बर के अंत तक देश के सभी 37 सूचीबद्ध बैंकों के एनपीए में 32 फीसदी तक की बढ़त दर्ज की गयी।
ऐसा नहीं कि फंसे कर्ज की बीमारी सिर्फ सरकारी बैंकों को ही लगी हो इसका शिकार देश के निजी बैंक भी हो चुके हैं। आईडीबीआई कैपिटल की ताजा रिपोर्ट बताती है कि इस वित्त वर्ष की पहली छमाही में विभिन्न बैंकों में 345 अरब रुपये के कॉर्पोरेट कर्जों का भुगतान टालने (सीडीआर) की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पिछले साल यह आंकड़ा महज 51 अरब रुपये का था। इससे देना बैंक, यूको बैंक और इंडियन बैंक की माली हालत को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचना है। यदि केयर की रिपोर्ट पर यकीन किया जाये तो विमानन, माइक्रोफाइनेंस, अचल समप्ति और बिजली कम्पनियां सबसे ज्यादा मुश्किल में हैं। यदि इनके कर्जों का पुनर्गठन कर भी दिया जाता है तब भी 15 फीसदी कर्ज बैंकों मिलते नहीं दिख रहे।
मंदी की मार का दंश झेलना भले ही मजबूरी हो सकता है लेकिन उन सरकारी या अर्ध सरकारी संस्थानों के बारे में क्या कहा जाये जो लगातार सरकार से आर्थिक लाभ उठाने के बावजूद हमेशा घाटा ही दिखाते हैं। घाटे के इन संस्थानों में सबसे ऊपर आते हैं बिजली बोर्ड। रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य बिजली बोर्डों पर सरकारी बैंकों का कर्ज बीती जून में 2,92,342 करोड़ रुपये से ऊपर निकल गया था। इतने बड़े घाटे को देखकर आधा दर्जन से अधिक बैंकों की जान सूख रही है। वहीं नवम्बर की शुरूआत होते-होते इलाहबाद बैंक ने बिजली बोर्डों को और कर्ज न देने का साफ ऐलान ही कर दिया। अब बिजली बोर्डों के डिफाल्टर होने का खतरा बेहद पुख्ता होता जा रहा है इसलिए बैंकों ने इस बकाये का पुनर्गठन यानि वसूली टालने की कार्रवाई शुरू कर दी है। पंजाब नेशनल बैंक ने पिछली तिमाही में तमिलनाडु बिजली बोर्ड के करीब 1,800 करोड़ रुपये के कर्ज का पुनर्गठन किया था।
बैंकों की स्थिति पर वित्त मंत्रालय की ही रिपोर्ट बताती है कि बिजली के झटके सबसे ज्यादा पंजाब नेशनल बैंक, इलाहबाद बैंक, ओरियंटल बैंक, यूको बैंक और सेंट्रल बैंक सहित करीब छह सरकारी बैंकों को सबसे ज्यादा लग रहे हैं। बिजली बोर्डों को अकले पंजाब नेशनल बैंक ने अपने कुल देय का सात फीसदी और इलाहबाद बैंक ने 13 फीसदी का हिस्सा दे रखा है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2009 से लेकर मार्च 2011 के बीच बुनियादी ढ़ांचा क्षेत्रों को बैंक कर्ज में अकेले बिजली क्षेत्र का हिस्सा 42 फीसदी के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुका है। इस हैरतंगेज तरीके से बांटे गये कर्ज पर बैंकों को सबसे ज्यादा चिंता तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बिहार और हरियाणा के बिजली बोर्डों को लेकर है।
बकौल रेटिंग एजेंसी क्रिसिल भारतीय बैंकें बेहद खतरनाक मोड़ पर खड़ी हैं क्योंकि इन्हें सरकारी एवं अर्ध सरकारी क्षेत्र ही नहीं बड़े कॉर्पोरेट हाउसों को दिये गये लोन पटते नहीं दिख रहे इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अगले तीन सालों में लगातार बड़े राज्यों और देश में होने वाले चुनाव हैं। इसलिए सरकारें कर्ज की उगाही से ज्यादा लोन माफ करने की अपनी लोकलुभावनी या यूं कहें कि अर्थ व्यवस्था डुवाबनी कर्ज माफी घोषणाएं करेंगे। जिससे न सिर्फ बिजली बोर्डों की बेलेंस सीट रसातल में जायेगी बल्कि बैंकों को भी धक्के खाने होंगे।
ताजा फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट पर नजर डालें तो बैंकों के लिए मंदी की मार और बिजली के झटके ही नहीं कांपती जमीन भी किसी बड़ी सुनामी के संकेत दे रही है। इर रिपोर्ट के मुताबित अचल सम्पत्तियों पर फंसे हुए कर्ज बढ़ने की रफ्तार 20 फीसदी से ज्यादा बढ़ती जा रही है। कॉमर्शियल प्रापर्टी में एनपीए 71 फीसदी की गति से बढ़ रहे हैं। देश की सबसे बड़ी रियल स्टेट कम्पनी डीएलएफ, यूनिटेक और एचडीआईएल जैसे प्रमुख संस्थान गले तक कर्ज में डूबे हैं। रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर यकीन करें तो रियल स्टेट कारोबारी 1.22 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दबाये बैठे हैं। अकेले डीएलएफ का कर्ज पिछली तिमाही में 1000 करोड़ रपये से बढ़कर 22,000 करोड़ रुपये की सीमा को लांघ चुका है। वहीं कम्पनी की बेलेंस सीट बताती है कि उसका मुनाफा 11 फीसदी गिरा है। लेकिन इसे हमारी आर्थिक नीतियों का दोष कहें या लाभ की राजनितिक लालसा इतने बड़े कर्ज के बावजूद रिजर्व बैंक के सारे नियम कानूनों को ताक पर रखकर डीएलएफ को देश के नामी सरकारी बैंकों ने फिर से नया कर्ज देने में देर नहीं लगाई।
इतनी पतली हालत के बावजूद यदि सरकार की चली तो जमा ब्याद दर बढ़ाने का उसका इरादा बैंकों के लिए बेहद जोखिम भरा होगा। फिलहाल देश की पूरी बैंकिग प्रणाली में कुल जमा का आकार 14.46 खरब रुपये का है यदि ब्याज दर एक फीसदी भी बढ़ती है तो जमा पर बैंक को 14,000 करोड़ रुपये अतरिक्त देना होगा। कुल मिलाकर देश के आधे से भी ज्यादा बैंक गंभीर खतरे में फंसे हुए हैं जिनमें ज्यादातर सरकार द्वारा नियंत्रित हैं। यदि हालात यही रहे तो निश्चित ही सरकार को अगले छह महीनों में बैंकों के लिए अमेरिका के लेहमन ब्रदर्स की तरह बेलआउट पैकेज की घोषणा करनी पड़ेगी।
वरिष्ठ अर्थशास्त्री रमेश जैन बैंकों की इस हालात के लिए देश में चल रही घाटे की अर्थव्यवस्था के मॉडल को जिम्मेदार मानते हैं। उनके मुताबिक घाटे की अर्थ व्यवस्था का सबसे बड़ा घाटा यह है कि पैसा जुटाने के लिए दिखाये जाने वाले घाटे के चक्कर में असल मुनाफा तो लुप्त हो ही जाता है वहीं भ्रष्टाचार के चलते बढ़ने वाला घाटा व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है।

शनिवार, 10 दिसम्बर 2011

ढ़ह गया “आधार”!

खोखली नींव पर टिका आधार आखिरकार ढ़ह ही गया। भारतीय आवाम की जिन चिंताओं को जल्दबाज और दंभी यूपीए सरकार ने दरकिनार कर दिया था, उन्हीं सरोकारों को आधार बनाकर संसद की स्थाई समिति ने नागरिकों की विशिष्ट पहचान वाली कथित महत्वाकांक्षी परियोजना को न सिर्फ गैर जरूरी बल्कि बेहद खर्चीली, गैर योजनाबद्ध और असुरक्षित बता सिरे से खारिज कर दिया।
आजादी के बाद से ही आम आदमी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयास सरकारें करती आ रही हैं। राशन कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसी योजनाओं इसी मुहिम का एक हिस्सा थीं लेकिन एक व्यक्ति की दर्जनों पहचान और इनमें होने वाली खामियों के चलते हर बार एक और नई स्पष्ट एवं स्थाई योजना की आवश्यक्ता महसूस की जाती रही।
वर्ष 2001 में अमेरिका ने प्रवासी नागरिकों पर नकेल कसने के इरादे से इनकी विशिष्ट पहचान का डाटा एकत्र करना शुरू किया। इस योजना में फिंगर प्रिंट, रेटीना स्केन सहित अन्य सभी पहचान पत्रों का विवरण एक ही स्थान पर एकत्र कर प्रवासियों को उनकी नई पहचान का दस्तावेज सौंपा गया जो हर समय उन्हें अपने साथ रखना था और जरूरत पड़ने पर अपनी पहचान साबित करनी थी। सिर्फ बीस फीसदी आबादी को इस तरह की विशिष्ट पहचान देने के पीछे अमेरिकी सरकार की मंशा वहां होने वाले अपराधों और पहचान सम्बधीं जटिताओं पर नियंत्रण करना था।
इस योजना से प्रभावित होकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसी ही योजना को भारत में लागू कराने का प्रयास किया। वाजपेयी की पहल पर उनकी कैबिनेट ने इस योजना को मंजूरी भी दे दी थी लेकिन उससे पहले इससे सम्बंधित सभी संदेहों और समस्याओं के निस्तारण कर यूआईडी का भारतीय वर्जन तैयार करने पर कैबिनेट ने जोर दिया जिसे स्वीकार भी कर लिया गया लेकिन अगले चुनावों में भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की हार के साथ ही यह योजना ठंडे बस्ते में डाल दी गयी।
यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में जब मनमोहन सिंह फिर से प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण बनाकर इस योजना के क्रियान्वयन की पुनः शुरुआत कर दी लेकिन वाजपेयी कैबिनेट की सुरक्षा और संरक्षा सम्बंधी शंकाओं का निवारण करना तो दूर उन पर अपनी कैबिनेट में चर्चा तक नहीं की गयी और ना ही इस योजना को शुरू करने के लिए संसद की इजाजत ही ली गयी। इतना ही नहीं प्राधिकरण की कमान औद्योगिक घरानों के हाथ में थमाकर उन्होंने इस योजना के दुरुपयोग की शंकाओं को और मजबूत कर दिया। जानकारों ने तो यहां तक कह दिया कि इस योजना को जल्दबाजी में इसलिए शुरु किया क्योंकि इसमें देश की बड़ी पूंजी निवेश कर औद्योगिक-प्रौद्योगिक हित साधने की असीम संभावनाएं अंतनिर्हित हैं। इस प्राधिकरण का अध्यक्ष एक औद्योगिक घराने के सीईओ नंदन नीलकेणी को बनाकर, तत्काल उन्हं 6600 करोड़ रूपए की धन राशि सुपुर्द कर दी गई। बाद में इस राशि को बढ़ाकर 17900 करोड़ रूपए कर दिया गया। जब यह योजना अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचेगी तब अर्थशास्त्रियों के एक अनुमान के मुताबिक इस पर कुल खर्च डेढ़ लाख करोड़ रुपए होंगे।
इसके बावजूद तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए मई 2010 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के नंदूरबार जिले के थेंभली गांव से यूनीक आइडेंटिफिकेशन नंबर वाली योजना को 'आधार' नाम से लॉन्च किया। लॉन्चिंग के मौके पर प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के 10 गांवों को यूआईडी नंबर दिए। इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि आधार प्रोजेक्ट अपने तय समय से 4 महीने पहले ही शुरू हो गया था।
'आधार' की लॉन्चिंग के मौके पर प्रधानमंत्री से लेकर सोनिया गांधी, नीलकेणी और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया तक ने यूआईडी को एक अनोखा आईडी प्रूफ बताते हुआ कहा था कि इससे सबसे ज्यादा फायदा गरीब तबके का होगा, जो कोई आइंडेटिटी प्रूफ न होने की वजह से बैंकिंग के साथ-साथ सरकार की तमाम स्कीमों का फायदा नहीं उठा पा रहा है। आधार के बाद लोगों को अलग-अलग पहचान पत्र रखने की जरूरत नहीं होगी।
आधार की लॉचिंग के साथ ही विवादों का पिटारा खुलना शुरु हो गया। सबसे पहली आपत्ति रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (आरजीआई) ने प्राधिकरण के काम काज के तरीके पर दर्ज कराई। आरजीआई ने यूआईडी के कामकाज पर नाराजगी जताते हुए कहा कि वह बैंक या बीमा कंपनियों से सीधे तौर पर डाटा इकट्ठा कर सभी को यूआईडी नंबर मुहैया न कराए। बल्कि इसके लिए प्राधिकरण को आरजीआई के डाटा का उपयोग करना चाहिए। जिससे न सिर्फ करोड़ों रुपये की बर्बादी रुकेगी बल्कि फर्जीवाडे पर भी रोक लगेगी। आरजीआई की आपत्ति में दम भी था क्योंकि जिस कार्य के लिए देश की दो बड़ी एजेंसियां पहले से ही अरबों रुपये फूंक चुकी हों उसके लिए फिर नये सिरे से कवायद करना गैर जरूरी ही है। वहीं फर्जी बाडे की संभावना को भी नहीं नकारा जा सकता।
आरजीआई की आपत्ति से गर्माया माहौल अभी तक शांत भी नहीं हुआ था कि गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने सुरक्षा सम्बंधी चिंताएं जताकर आधार की चूलें ही हिला दीं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को भेजे पत्र में चिदंबरम ने साफ-साफ कह दिया कि यूआईडीएआई द्वारा एकत्र डाटा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से राष्ट्रीय आबादी रजिस्टर के तहत आवश्यक आश्वासनों पर खरा नहीं उतरता। इसी के साथ बिना किसी जांच के दर्ज किये जा रहे आंकड़ों से न सिर्फ नागरिकों की पहचान को खतरा उत्पन्न होगा बल्कि घुसपैठियों को रोकना भी असम्भव हो जायेगा।
सुरक्षा सम्बंधी जो चिंताएं चिदम्बरम ने जाहिर की थीं वह पहले से ही विद्यमान थीं।
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने पूरे काम के लिए तीन कंपनियों को चुना-एसेंचर, महिंद्रा-सत्यम-मोर्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन। इन तीनों कंपनियों पर ही इस कार्ड से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारियां हैं और जब इन तीनों कंपनियों पर ग़ौर करते हैं तो डर सा लगता है। एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं, इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनका अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रिश्ता रहा है। एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन अमेरिका की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनियों में से है, जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन और इलेक्ट्रानिक पासपोर्ट आदि जैसी चीजों को बेचती है। अमेरिका के होमलैंड सिक्यूरिटी डिपार्टमेंट और यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के सारे काम इसी कंपनी के पास हैं, यह पासपोर्ट से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक बनाकर देती है।
अब सवाल यह है कि सरकार इस तरह की कंपनियों को भारत के लोगों की सारी जानकारियां देकर क्या करना चाहती है? एक तो ये कंपनियां पैसा कमाएंगी, साथ ही पूरे तंत्र पर इनका क़ब्ज़ा भी होगा। इस कार्ड के बनने के बाद समस्त भारतवासियों की जानकारियों का क्या-क्या दुरुपयोग हो सकता है, यह सोचकर ही किसी का भी दिमाग़ हिल जाता है। समझने वाली बात यह है कि ये कंपनियां न स़िर्फ कार्ड बनाएंगी, बल्कि इस कार्ड को पढ़ने वाली मशीन भी बनाएंगी। सारा डाटाबेस इन कंपनियों के पास होगा, जिसका यह मनचाहा इस्तेमाल कर सकेंगी जो एक खतरनाक स्थिति होगी।
विकीलीक्स के हवाले से अमेरिका के एक केबल के बारे में ज़िक्र करते हुए यह लिखा कि लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे संगठन के आतंकवादी इस योजना का दुरुपयोग कर सकते हैं.

वैसे सच्चाई क्या है, इसके बारे में आधार के चीफ नंदन नीलेकणी ने खुद ही बता दिया। जब वह नेल्सन कंपनी के कंज्यूमर 360 के कार्यक्रम में भाषण दे रहे थे तो उन्होंने बताया कि भारत के एक तिहाई कंज्यूमर बैंकिंग और सामाजिक सेवा की पहुंच से बाहर हैं। ये लोग ग़रीब हैं, इसलिए खुद बाज़ार तक नहीं पहुंच सकते। पहचान नंबर मिलते ही मोबाइल फोन के ज़रिए इन तक पहुंचा जा सकता है। इसी कार्यक्रम के दौरान नेल्सन कंपनी के अध्यक्ष ने कहा कि यूआईडी सिस्टम से कंपनियों को फायदा पहुंचेगा।
 बड़ी अजीब बात है प्रधानमंत्री और सरकार की ओर से यह दलील दी जा रही है कि यूआईडी से पीडीएस सिस्टम दुरुस्त होगा, ग़रीबों को फायदा पहुंचेगा, लेकिन नंदन नीलेकणी ने तो असलियत बता दी कि देश का इतना पैसा उद्योगपतियों और बड़ी-बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च किया जा रहा है, बाज़ार को वैसे ही मुक्त कर दिया गया है। विदेशी कंपनियां भारत आ रही हैं, वह भी खुदरा बाज़ार में, तो क्या यह कोई साज़िश है, जिसमें सरकार के पैसे से विदेशी कंपनियों को ग़रीब उपभोक्ताओं तक पहुंचने का रास्ता दिखाया जा रहा है। बैंक, इंश्योरेंस कंपनियां और निजी कंपनियां यूआईडीएआई के डाटाबेस के ज़रिए वहां पहुंच जाएंगी, जहां पहुंचने के लिए उन्हें अरबों रुपये खर्च करने पड़ते।
खबर यह भी थी कि कुछ ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडर इस योजना के साथ जुड़ना चाहते थे अगर ऐसा होता तो देश का हर नागरिक निजी कंपनियों के मार्केटिंग कैंपेन का हिस्सा बन जाता जो देश की जनता के साथ किसी धोखे से कम नहीं होता। अगर देशी और विदेशी कंपनियां यहां के बाज़ार तक पहुंचना चाहती हैं तो उन्हें इसका खर्च खुद वहन करना चाहिए। देश की जनता के पैसों से निजी कंपनियों के लिए रास्ता बनाने का औचित्य क्या है, सरकार क्यों पूरे देश को एक दुकान में तब्दील करने पर आमादा है?
यही वह तमाम आपत्तियां रहीं जिसके चलते वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने विशिष्ट पहचान पत्र (यूआईडी) संबंधी बिल को खारिज कर दिया। पूर्व वित्त मंत्री और विपक्ष के नेता यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता में गठित समिति ने नेशनल आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनआईए बिल), 2010 को इन्हीं तमाम बिंदुओं पर खरा नहीं उतरने की वजह से खारिज कर दिया। एक ही तरह के कामकाज दो संस्थाओं के जरिए होने, सुरक्षा कारणों से ऐतराज और एनआईए बिल पर गंभीर मतभेदों की वजह से ऐसा किया गया। समिति के सदस्य प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को दिशाहीन बताने से भी नहीं चूके। समिति ने बिल के मौजूदा स्वरूप और इस परियोजना को स्वीकार करने योग्य नहीं माना है और सरकार को इसकी समीक्षा के बाद नया बिल तैयार करने की बात कही है।
इतनी आपत्तियों और विरोध के बावजूद यदि सरकार समिति की सिफारिशों को नहीं मानती है तो इससे न सिर्फ राजनीतिक माहौल फिर से गर्मायेगा बल्कि देश की सुरक्षा और आम नागरिक के मूल अधिकारों का हनन भी माना जायेगा। वहीं दूसरा पहलू यह भी है कि यदि समिति की सिफारिशों को मानकर आधार को बंद कर दिया जाता है तो अब तक खर्च हुए 556 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई कौन करेगा। सरकार, कांग्रेस या फिर वह निजी कम्पनियां जो इस योजना से मौटा मुनाफा कमाने के साथ भविष्य में होने वाले मुनाफे की व्यूह रचना कर रहीं थीं।