• देशी गोरे और नमक हराम कुत्ते ....

    एक अंग्रेज हुक्मरान का नाम फिर जेहन में कौंध उठा... यह अनायस नहीं था... उस हुक्मरान को गुजरे हुए एक जमाना बीत गया लेकिन... उसके कुछ वंशज आज भी हिन्दुस्तानीं सरजमीं पर राज कर रहे हैं... शायद ये साहब थे ... लार्ड डलहौजी....पेशे से बनिया थे {माफ कीजिये... मैं यहां किसी जाति का जिक्र नहीं कर रहा, मैं बात कर रहा हूं.. पेशे की उस बनिया की जिसका सिर्फ एक ही मकसद होता है लाभ कमाना } कम्पनी का नाम था ईस्ट इंडिया... धंधा.. हिन्दुस्तानी सर जमीं से सस्ती चीजों खासतौर पर मसालों और बेशकीमती जवाहरातों को खरीद कर उन्हें... अपनी बेस्वाद जमीं के रंगहीन और गंध हीन लोगों के बेचना.... विरासत में इन्हें अपने पूर्वजों से एक ख्वाब मिला था... .. बंधुआ मजदूर तैयार करने का.... इस सपने को पूरा करने की ललक में ये साहब एक और ख्वाब पाल बैठे... लोगों को गुलाम बनाने का ... सच भी है बनिया ज्यादा से ज्यादा फायदा देखता है.... मजदूर को तो मजदूरी देनी ही पड़ेगी चांहे एक बार या बार-बार, गुलाम को तो रोटी भी नहीं दो तब भी बेचारा जुबान नहीं खोलेगा..... इस ख्वाब को पूरा करना थोड़ा मुश्किल था... ख्वाब अभी अंकुरित हो रहा था... ये धंधा करने भरी जवानी में अपने घर से कोसों दूर .... इंडिया आ गये... जैसे ही इनके कदम इस पाक जमींन पर पड़े..... वैसे ही इनके नापाक होटों पर मुस्कराहट खिल उठी..... शायद इन्हें वो जमीं मिल गयी थी जहां ये अपने पूर्वजों के साथ साथ अपने ख्वाब को पूरा कर सकते थे..... इसकी एक ठोस वजह भी थी और वो वजह थी, सबसे पहले इस जमीं पर मिले वो दो कुत्ते जो एक रोटी के लिए लड़ मर रहे थे.... मांफ किजियेगा.... उस वक्त हमारी हालत किसी कुत्ते से कम नहीं थी....आज भी नहीं है.... डलहौजी ने बड़ी आसानी से हिन्दुस्तानी कुत्तों को को लड़ाया... एक दो शेर रास्ते का रोड़ा बने तो उनका शिकार भी हिन्दुस्तानी कुत्तों से ही करा दिया.... शायद आप बोर हो गये.... क्योंकि इस सच्चाई को आप अपने बचपन से पढ़ते और सुनते आ रहे हैं....लेकिन फिर भी कोई असर नहीं पड़ता.... शायद गोरों ने तलवा चाटने की ऐसी आदत डाली है कि ... बाकी सब भूल गये... क्या वफादारी क्या नमक हलाली.... गोरे चले गये... देश आजाद हो गया.... लेकिन राज करने की नीति वही रही ... सदियों बाद भी.... अब देशी गोरे ... टुकड़े डालते हैं.... और कुत्ते .... जी हां ... हिन्दुस्तानी कुत्ते फिर लड़ मरते हैं.... हां एक चीज बदल गयी... कुत्तों की कीमत बढ़ गयी.... अब ब्रेड से काम नहीं चलता.... देश के टुकड़े चाहिए... किसी को गोरखालेंड... किसी को तेलंगाना.... तो किसी को देश के हृदय प्रदेश का उत्तम हिस्सा.... वैसे भी हिन्दुस्तान में शेरों की संख्या दिनों दिन घटती जा रही है.... और कुत्तों की .... इतनी बढ़ गयी है कि देशी गोरे उन्हें मारने के लिए या फिर बधिया करने के लिए निगम की विशेष टीम को जिम्मेदारी देने लगे हैं....मैं तो डर कर भाग आया हूं कि कहीं इन देशी गोरों को ज्यादा खतरा महसूस हुआ तो ये सारे कुत्तों को निपटा ही न दें.... और इस सोच में पड़ा हूं कि अस्तित्व समाप्त होने से पहले या तो अपना विकास कर लिया जाये और शेर बन लिया जाये या फिर कुछ न कर सकूं तो अपने मालिक जिसका नमक खाता हूं... इस सर जमीं का वफादार कुत्ता ही बन जाऊं... दोस्तो यही सही वक्त है ... मैं तो दोनों में से एक रास्ता चुनने जा रहा हूं .... और आप... क्या लड़ते ही रहेंगे ... टुकड़ों के लिए...या तो दौनों में से एक रास्ता चुन ली जिये ... या फिर मुझे जी भरके गरियाईये....
    ये खुद आपको तय करना है.... आजाद होना हैं या गुलाम बनकर तलुए ही चाटते रहना है.... पीछे से बधिया करने वाली गाड़ी आ रही है... किनारे होकर सोचो ... नहीं तो इस लायक कुछ भी नहीं बचना है......
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