• अति गंड योग...

    सवाधान.... मेहरबान.... कदरदान.... थूकदान-पीक दान.... आपका इंतजार खत्म हुआ.... पेश है गंडेश्वर नम्बर तीन का चमत्कार... दिल थाम कर बैठिये....जो जिधर बेठा है उधर ही बेठा रहे.... जो जिधर खड़े है उधर ही खडे रहे... नहीं तो होगा उसका जो भी नुकसान ... हम नहीं होगा उसका जिम्मेदारान.... क्योंकि चालू हो चुका है अति गंड योग.... जी हां गंड योग का बाप... बड़ा भाई ... जो भी बोले... आपकी मर्जी ... लेकिन एक तो होते है कोढ़ और दूसरे होते हैं कोढ़ में भी खाज... ये वोही इच है बाप....हां भाईलोगों को सलाम, नमस्कार करना तो हम भूल ही गया... करता भी तो कैसे राती के तीन बजे को कौन सी गुड बोलते हैं अपून को मालूम ही नहीं है.... हे रात के कीड़ो दिन के नाम पर कलंको... समझ जाओ.. क्योंकि तुमको तो पताइच होगा ना कि इतने बजे कौन सा गुड... बोलते हैं ......मैने किया था जो आपसे वायदा कि ब्रेक के बाद सुनाऊंगा गंड योग की बचा हिस्सा आधा... शुरू हो रही है वही कहानी.... चंदन की परेशानी... तो वो इच टाइम आगेला है बाप,,, बचाओ... बचाओ... बचाओ... ... हो गये हम तो हैरान परेशान.... मदारी रात के तीन बजे खेल लिखरेला है ... लेकिन ये कौन चीख रेला है ... अरे ये तो अपना हीरो चंदन इच है... हमने थोड़ा प्यार जताया... पानी पिलाया ...आ भाई आ बैठ क्यों दौड़ रिया है... इतनी तेज दौड़ेगा तो वो साला बोल्ट का रिकार्ड भी तोड़ देगा ... क्या हुआ .... क्यों मुझे डिस्टर्ब कर रिया है.... क्या करूं दोस्त मेरी तो बुरी तरह से फट गयी है... ऐसी फटी है कि पैरासूट के धागे से भी नहीं सिली जा सकती.... क्यों अब क्या हुआ.... क्या हुआ....ये पूछो क्या नहीं हुआ.... जिसका डर था वो ही हुआ... अब तक तो लोग चंदन को काट रहे थे... सबको खुशबू बांट रहे थे... काटने तक तो सही था लेकिन अब घिस-घिस के मेरा अंत ही करने में जुट गये हैं.... मैने उससे पूछा क्यों कहां गयी तेरी ज्योतिष... तेल लेने... बेचारा डरा सहमा बोला ...भाई मेरे सितारे ही तो गर्दिश में चल रहे हैं ... क्या करूं गंड योग तक तो ठीक था लेकिन अब उसका भी बाप ... अति गंड योग चालू हो गया है.... अरे साला... इतना सुनकर तो मेरे रोंगटे खड़े हो गये....कितना भी समझाओ.. चांहे जितना मोबाइल का बिल बढ़ाओ... साला समझता ही नहीं... जब ओखली में सिर दिया तो मूसल क्या अब कोई और खायेगा... खा बेटा खा... आ बैल मुझे मार .... खुद तो मार खा चुका है अब मुझे आगे करके बैल से कह रहा है ले मदारी को भी मार... पागल थोड़े ही हूं.... पीएचडी की है... चल निकल ... आप लोग परेशान मत हो मैने चंदन को भगाया नहीं है ... बस उसे समझाने का नया फार्मूला अपनाया है... डाक्टर हूं ना दवाई नहीं दे सकता तो क्या हुआ फार्मूले तो फिट कर सकता हूं... डाक्टरी की पढ़ाई ने सब सिखा दिया... गाइड के लिए बहुत सारी जुगाड़ जुटाई थीं मैने तभी तो जो काम कोठे बाई ने किया... उसपे गाइड महाराज ने मेरा नाम छाप दिया और मैं बन गया डाक्टर.... तुम लोग डिस्टर्ब बहुत करते हो यार ... मुद्दे से हर बार भटका देते हो... चंदन के अति गंड योग की शुरूआत तो उसी वक्त हो गयी थी... जब वो गुरुओं के गुरू महागुरू बनने का लालच पाल बैठे थे.... चलो काम की बात पर आते हैं.... चंदन का एक चेला था उनका रिश्ते का भाई ... गंडेश्वर नम्बर तीन यानी मालपानी उनका ही यजमान था... जो उन्हें गुरुदक्षिणां में उनके ज्ञानी चेले से मिला था... माल पानी करोड़ों के ख्वाब दिखाता.... दिन रात एक करके जैसे ही गुरू लोग उसके सामने मलाई रखते... वो मुर्गे को सूई चुभो देता ... हो जाती सुबह और गुरु घंटालों के सारे ख्वाब टूट जाते ... जेब तो कटती ही कटती... कभी कभी.... भी फटती...(यहां का रिक्त स्थान खुद भर लेना. बड़े बड़े सारे काम में नहीं करूंगा)..... गुरुघंटाल को जब कुछ न सूझा तो उसने भी अपने ज्ञानी चेले का फार्मूला अपनाया... महागुरू को मालपानी दान कर आया....माल पानी की गोलाई-मोटाई देख.... महागुरू चंदन जी महाराज भी हर्षाये इठलाये.... मन ही मन मुस्कुराये... चलो जग में रह कर नाम तो हम ने खूब कमाया है... लगता है दाम कमाने का वक्त अब आया है.... चंदन जी महाराज कुछ और सोचते इससे पहले ही गंडेश्वर चीखे चिल्लाये... गोली मार दूगा... गोली मार .... नहीं मिली तो जहर खा लूंगा ... जहर तो मिल जायेगा चूहे मारने वाले से ही काम चला लूंगा... चंदन ने पहले पानी पिलाया फिर समझाया ... यार मारना ही है तो अपने बुरे वक्त को मारो... गंडेश्वर बोले कैसे मारूं... बुरे वक्त को मारने के चक्कर में तो आपके दो चेले मर गये... उन्होंने अपना सबकुछ दिखा दिया... अब आपके हाथ में थमा दिया... चंदन ने अपना ज्ञान बघारा... पोथी-पत्रा निकाला....उसकी कुंडली बांची (लेकिन चंदन लक्ष्मी के चक्कर में अपनी कुंडली बंचना भूल गया....) ...और बोला तुम्हारे बुरे दिन अब खत्म होने वाले हैं.. लक्ष्मी मेहरबान होगी.... लेकिन फिलहाल तुम्हारी बीबी परेशान होगी... गंडेश्वर गड़गड़ाये... साली नौटंकी करती है.... लाखों रुपये लुटवा चुकी है... दर्द ही दर्द चिल्लाती है... कोई भी दाई उसकी परेशानी नहीं समझ पाती है... चंदन मुख से शीतलता झड़ी... बोले नहीं वो वाकई परेशान है ... एक प्रेक्टीकल करते हैं... गायत्री मंत्र पढ़ते हैं .... उसके पेट पर हाथ फिराना और जब वैसा ही दर्द तुम्हारे पेट में हो तो उसकी परेशानी समझ जाना... जजमान फंसा... गंडेश्वर हंसा... घर गया पेट पर हाथ फिराया... और फिर दौड़ा दौड़ा चंदन के चरणों आ गिरा... मर गया मैं तो लुट गया मैं तो... चंदन चिल्लाया ... आखिर हुआ क्या... गंडेश्वर ने अपने पेट के दर्द का हाल सुनाया... चंदन के न जाने किसको याद किया और गंडेश्वर को पानी पिलाया.... पानी पेट के अंदर और दर्द बाहर.... फिर तो तारीफों के पुल बंधने लगे.... चंदन ताड़ पर चढ़ने लगे.... उनके गंडयोग के योग और मजबूती से बढ़ने लगे.... चंदन ने दार्शनिक अंदाज में पूछा अच्छा अब बताओ और क्या क्या परेशानी हैं.... मौका के की नजाकत भांप गंडेश्वर सीधे काम की बात पर आ गया... और गंड शिरोमणी का खिताब पा गया.... बोला....इंसान की सबसे बड़ी जरूत होता है पैसा... लेकिन उससे मेरा रिश्ता है न जाने कैसा.... लाखों रुपये रोज सट्टे में लगाता हूं... लेकिन जीत एक भी नहीं पाता हूं.... चंदन तब तक ताड़ पर चढ़ चुके थे... पैसे का नाम सुनकर खिल उठे थे.... बोले यार मैं तुम्हारी ये परेशानी चुटकी बजाते ही खत्म कर सकता हूं... लेकिन ....जैसे ही चंदन ने लेकिन लगाया ... गंडेश्वर ने पीछे से ढेर सारा धूंआं बहाया.... और सीधा गिर गया पैरों में.... तुम ही मेरे पिता हो माता हो... तुम ही मेरे भाग्य विधाता हो... तुम अगर-मगर को निकालो... जल्दी से अपनी शर्तें बता डालो.... चंदन को भी लगा मुर्गा फंस गया... अपना तो काम बन गया.... चंदन ने आव देखा न ताव बोले,,,, जो भी कमाओगे दसवां हिस्सा .... यहां चढ़ाओगे..... गंडेश्वर तो थे ही गंडेश्वर.... ऊपर से उन्हें गंडशिरोमणी का खिताब भी मिल चुका था.... उन्होंने तुरन्त अपनी भी एक शर्त जोड़ डाली..... ठीक है दसवां हिस्सा नहीं हम आधे-आधे के हिस्सेदार बनेंगे.... लेकिन पहले सुन लो.... मेरा घर-जेवर-गाड़ी-घोड़.... सब गिरवी रखा है... पहले उसे छुड़वाओ और अपनी कला दिखाओ... किसी औरत के पेट तक हाथ डालकर दर्द तो सभी मर्द पैदा कर देते हैं.... तुम अपनी असली मर्दानी दिखाओ... पहले मेरा ये छोटा सा काम कराओ.... चंदन भी चकराया... लगा मुर्गा गया हाथ से... वो तो न जाने क्या क्या सोच बैठा था इतनी देर में .... मुर्गा कटेगा तो बटर चिकिन बनायेगा... कढ़ाई चिकिन बनायेगा... काली मिर्च में डुबोके खायेगा.... लेकिन ये क्या लात मार रिया है साला... कोई नहीं हलाल नहीं हो रहा तो क्या झटके का बनाऊंगा.... चंदन ने दिमांग दौड़ाया पोथी-पत्रा बिछाया... और गंडेश्वर की गिरवी रखी साख निकालने का रास्ता बताया.... दिन बीते... हफ्ते और फिर महीने.... गंडेश्वर रोज आते .... पांच रुपये की मूंगफली और दो रुपये के केले लाते.... उन्हें अच्छे से पता था कि चंदन को खिलाओ तो वो खिल उठता है... लेकिन खाने को उतना ही लाते जितना चंदन की जीभ तक पहुंच सके... पेट तक पहुंच गया तो डकार मार कर सो जायेगा.... ये वो अच्छे से जानता था.... चंदन के पास लोगों का तांता लगा रहता ... जब चार मूंगफली और आधा केला उसके सामने होता तो अपनी साख बचाने के लिए उसे आधा किलो मूंगफली और दर्जन भर केले मंगाने ही पड़ते.... नहीं तो जो चेले आयेंगे वो उल्हाना मारेंगे कि चंदन बस दूसरों का खाता ही रहता है खिलाता कुछ नहीं.... जब छह महीने बीत गये तो गंडेश्वर सौ ग्राम लड्डू लेकर चंदन के पैरों पर गिर गये... बोले मान गय उस्ताद ... क्या कमाल करते हो.... तुम्हें तो अब लाखों के बिजनिस में पार्टनर बनाना ही पड़ेगा.... चंदन इठलाये शर्माये... बोले बताओ तो सही हुआ क्या.... गंडेश्वर गडगडाये और बोले जो तुम डेली चार्ट देते हो, उसने तो मेरी लाइफ ही बदल दी..... गाड़ी-घोड़ा-मकान-दुकान सब फिर से मेरा हो गया.... तुम तो छा गये वाह भाई वाह.... गंडेश्वर ने पहले मिठाई दी... जो चंदन तक पहुंचने से पहले उनके चेले ही चट कर गये... जिनमें से एक हरामखोर मैं भी वहीं बेशर्मों की तरह इस आस के साथ खा गया कि चंदन को तो अभी और मंगानी ही है वो गंडेश्वर की मिठाई खाकर करेंगे क्या..... फिर उसने जेब की तरफ हाथ बढ़ाया... मेरी क्या सबकी समझ में यही राग आया... कि आज तो मोटी कमाई होगी चंदना की ..... मार लिया हाथ भाई मान गये... आज तो लक्ष्मी का वरण होगा.... लेकिन गंडेश्वर ने फिर से मुर्गे को सूई चुभो दी... भोर हो गयी... ख्वाब टूट गये.... गंडेश्वर के हाथ से एक खर्रा छूट गया... खर्रा क्या होता है मैं पहले ही बता चुका हूं... दुबारा मत पूछना..... चंदन को तो जैसे लकवा मार गया... मुर्गा कटने की बजाय फिर काट गया.... गंडेश्वर फिर गडगडाये... जैसा कि तय हुआ था... आपने अपनी मर्दानगी साबित करदी....मेरी लक्ष्मी मुझे वापस कर दी.... सो अब में भी अपने वायेदे पर खरा उतरना चांहता हूं ... आपसे धंधे का रिश्ता जोड़ना चांहता हूं..... धंधा शुरू करने के लिए दमड़ी चाहिए.... लेकिन फाइनेंसर मेरी चमड़ी उखाड़ रहे हैं... 65 लाख का कर्जा है ... वो मांग रहे हैं.... मैं कहां से दूं आपका हाथ कैसे थाम लूं..... चंदन को मिली फूटी कौड़ी भी नहीं..... ऊपर से चेले चपाटों की जो पंचायत जुटी थी उसमें भी इज्जत दांव पर लगी थी.... मांगना वांगना तो सब भूल गये ... गंडयोग के फेर में फिर फंस गये.... चंदन दहाड़ा.... लाल-पीला करके कागज फाड़ा, पोथी पत्रा खोला और तथास्तू बोला.... गंडेश्वर हंस गये बोले चंदन जी तो फिर फंस गये... लेकिन एक लघु शंका थी.... हालत परेशान थी.... सोचा मौका भी है माहौल भी बैठे ही बैठे कर देता हूं.... सवाल... महाराज लेकिन ये सब होगा कैसे....ताड़ पर बैठे चंदन चेलों की चक चक से आसमान पर चढ़ चुके थे.... लेकिन तबभी उन्होंने न तो अपनी कुंडली बांची और न ही अपनी जमीन पर निगाह डाली... जो न जाने कितनी दूर हो चली थी... बोले तुम्हारी दो समस्याओं का समाधान में एक साथ करता हूं... फाइनेंसर को फिट करता हूं... बोले कमाने धमाने का चक्कर छोड़ो सालों लग जायेंगे.. और मेरा धीरज भी अब डोलता जा रहा है..... बटुआ बोलता जा रहा है... इसलिए सीधे जाओ फाइनेंसर को समझाओ वो पुराना बिल्कुल नहीं मांगेगा.... नया और दे देगा .... लेकिन मेरी एक शर्त साफ सुन लो जो मिले उसमें से दसवां हिस्सा मुझे तत्काल चाहिए.... सब चेले चालू चंदन की चालाकी समझते इससे पहले चंदन ने सफाई दी... यार धंधा जो शुरू करना है....डरता डराता गंडेश्वर फाइनेंसर के पास पहुंचा... साला था भी तो गंडशिरोमणी ना ... जहां जाता लेकर ही आता.... मुर्दे के पास जाता तो वहां से भी खाली हाथ न आता... आप सोच रहे होंगे मुर्दे के पास देने के लिए होता ही क्या है.... अरे मुर्खो कफन क्या अपनी छमियां पहनती है.... पहला चेक मिल गया.... फाइनेंसर लेना भूल गया... गंडेश्वर मुस्कुराया... चंदन की काबिलियत पर हर्षाया इठलाया.... और चेक जेब के हवाले कर घर चला आया.... फिर वही खेल शुरू हुआ सट्टे का चंदन रोज लिस्ट देता गंडेश्रवर रोज दांव लगाता... लेकिन गंडेश्वर हमेशा हार जाता.... हैरान परेशान चंदन की समझ न आता... एक दिन चंदन ने गणित भिड़ाया उसने भी सट्टा लगाया... दांव फंस गया ... दिन-हफ्ते—महीने उसका आंकड़ा ही दोहराया.... फिर भी वो गंडेश्वर को न समझ पाया.... इस बीच गंडेश्वर ने एक और चाल चली.... चंदन की फिर फटी.... गंडेश्वर बोला चाय पीने घर आओ... चंदन खुसबू छिड़क काजल बिंदी लगा... नयी नवेली दुल्हन की तरह पहुंच गये गंडेश्वर के कोठे पर .... सौरी.... सौरी ... सौरी ..... कोठी पर .... कोठा इस लिए लिख गया क्योंकि गंडेश्वर का तो काम था ही तू न सही तो कोई और सही वाला ... गलती सुधार ली ना यार क्यों समाज का सारा ठेका मेरे सिर पर फोड़ रहे हो तुम लोग... चुपचाप आगे की कहानी सुनो.... नई नवेली दुल्हन बन चंदन गंडेश्वर की कोठी में दाखिल हुए... ठीक वैसे ही जैसे सुहागरात वाले दिन (न जाने क्यों सारा काम रात में होता है फिर भी लोग इसे दिन बोलते हें) दुल्हन के मंन में तूफान खड़ा होता है... चंदन के मन में चल रहा था... आज तो मुंह दिखाई होगी.... जरूर कुछ न कुछ कमाई होगी... आज तो मैं कोठे (कोठी) में दाखिल हो जाऊंगी (जाउंगा) ...नथ उतरी तो समझ लो लॉटरी निकल पड़ेगी... रोजाना लाखों तो नहीं हजारों में खेलूंगी.... दिमांग पर जोर मत डालो दोस्तो यहां लिंग मैने जानबूझकर बदला है क्योंकि चंदन नयी नवेली दुल्हन की तरह सज कर निकला है..... इसलिए लिंगीय कऩफ्यूजन न हो हम थोड़ी देर के लिए चंदन को चंदना बना देते हैं.... अपनी ही प्रपर्टी है कुछ भी करें आपसे क्या....भड़को मत आगे की कहानी सुनो... अच्छी लग रही तो ठीक है नहीं तो निकल लो... कहीं भी जाकर मराओ हमसे क्या... हम तो बुलाने नहीं गये थे... कोठे का यही दस्तूर होता है... तो बात चल रही थी कोठे की .... चंदना सहमी सकुची... कमरे में दाखिल हुई... एक सखी ने उसे सेज पर बिठा दिया... बोली बैठो... जिनका तुम्हें बड़ी बेसब्री से इंतजार है वो बस आने ही वाले हैं..... थोड़ी देर तक चंदना फिर गुलाबी ख्यालों में खोई रही....नथ उतराई में जो रकम मिलेगी उसे उड़ाने के रास्ते खोजती रही... तभी दरवाजा खुला... साजन सेज की तरफ बढ़ा.... चंदना का दिल धक-धक करने लगा... जैसे इसी दिन के इंतजार में वो यौवन को सजा संवार रही थी.... आने वाले क्षणों की कल्पना में सिहर रही थी... मन कर रहा था जो होना है बस हो जाये.... गंडेश्वर आये... चाय की प्याली उसकी तरफ बढ़ी.... लगा जैसे दूध का गिलास आगे बढ़ा दिया हो.... क्या कहा आपने हिन्दी पिक्चरों में दूध का ग्लास गंडेश्वर बढ़ाते हैं.... अरे यार आप लोगों को तो बार बार समझाना पड़ता है लगता है दिमांग जेब में रखकर मेरी पिक्चर देख रहे हो... ये कहानी रामगोपाल वर्मा के लिए लिख रहा हूं....अब चांहे तो में पहले डरना मना है की लिखूं या फिर डरना जरूरी है ... आप पिक्चर देखो बस जो समझ में आजाये उसी पिक्चर की कहानी समझ लेना.... बीच में टपक पड़ते हो जैसे चाय में मक्खी.... चाय पर लौटते हैं... चंदना चाय को दूध समझ कर एक ही बार में गटक गयी... सही में दूध की जरूरत तो नयीनवेली दुल्हन को ही पड़ती है... सब कुछ उसे ही झेलना होता है... सो यही सोच कर तैयार हो गयी वो.... चंदना का दिल छत तक उछल रहा था... धड़कने साफ सुनाई दे रहीं थीं... बस इंतजार में बैठी थी कि गंडेश्वर अब छुएं कि अब घूंघट उठायें कि अब नथ उतारें... लेकिन गंडेश्वर जले फुके आशिक की तरह चंदना को दूध पिलाकर सेज पर दूसरी ओर पसर गये... दुनियां भर की बातें हुईं लेकिन न तो नथ उतराई हुई न रकम का जिक्र..... हां इस बीच एक घटना और हो गयी... जिस तरह जला फुका आशिक सेज पर अपनी बीबी को सब बता देता है...पिछली राम कहानी...गंडेश्वर भी शुरू हो गये कुछ इसी अंदाज में..... बोले मेरी बीबी की जितनी बार आप हालत ठीक करते हो वो ठीक रहती है... लेकिन फिर पड़ जाती है बिस्तर में.... जब वो बिस्तर में होती है तो मेरी फट ही जाती है... फट इसलिए जाती है ... क्योकि उसके इलाज में इतना दम लगाना पड़ता है कि डाक्टरों को सबसखोलकर दिखाना पड़ती है... बेचारी चंदना पर तो जैसे किसी ने फ्रिज से निकाल कर ठंडा-ठंडा पानी डाल दिया हो..... मुंह से बस निकलते निकलते रह गया... हरामी मैने उसे सटाने में अपनी फडवा ली... खोलकर रख दी सबके सामने..... अपने सारे बल्ब, रौड, इन्वर्टर तक फुकवा दिया उसे करंट देते देते... अब वो ही ठंडी पड़ी है तो क्या मैं अपना प्लग लगाके उसे गरम करूं.... मर रही है मरने दे ठेका नहीं लिया मैने उसका... धंधे की बात कर जो डील हुई थी उसमें उस ठंडी को गरम करने का कोई क्लॉज नहीं जुड़ा था.... बात करता है बीबी की.... मुझे यहां बुलाकर गरम कर दिया अब साला चाय पिलाकर अरमानों पर ठंडा पानी डाल रहा है....आखिर जब कहीं से भी शुरुआत होती न दिखी तो.... नयी नवेली दुल्हन की तरह सकुचाते लजाते... हया दिखाते दबे होंठों से चंदना ने बोल ही दिया... जी वो नथ उतराई की रकम मिल जाती तो..... गंडेश्वर को जैसे सांप सूंघ गया.... उसे उम्मीद भी नहीं रही होगी कि इतना फूकने के बाद अभी भी इसकी तमन्नाएं हिलोरें ले रही हैं... गंडेश्वर ने टका सा जवाब देकर बात खत्म करने का इशारा कर दिया.... जवाब .... देखो जो पैसा आया है वो नाहक ही मैं लुटाना नहीं चांहता... अय्याशी तो चलती ही रहती है... थोड़ी कम कर लेंगे रोज रोज नयी से अच्छा है ... फिलहाल पुरानी से काम चलाया जाये.... और उससे जो पैसा आये ... वो बांट लिया जाये.... तुम ज्यादा ही कहती हो तो... में तुम्हारे लिए अपने कोठे पर ही एक कमरा खुलवाये देता हूं... तुम यहीं रहो... खाओ पीयो... तुम ही मेरा काम चलाओ... बिना नथ उतरवाये...मेरी बांदी बनकर .... और फिर बाहर किसको क्या पता ... मैने तुम्हारे साथ क्या किया और नहीं.... बाहर तुम सुहाग के जोड़े में चलना मेरे साथ .... बस फिर क्या था.... चंदना को चंदन जी महाराज बनने में देर न लगी... और तुरन्त हिसाब लगा डाला अपनीं कुंडली का... धत्ततेरेकी ... ये तो मेरा अति गंड योग चल रहा है .... मेरे पास आकर ले लेता था.... यहीं तक बात खत्म हो जाती तो भी ठीक था... अब तो ये खुलकर कह रहा है मरानी है तो मेरे ठिकाने पर आना पड़ेगा... और मैं आभी गया..... कभी कुंडली, कभी अति गंड योग तो कभी गंडेश्वर शिरोमणि को देखता चंदन.... जब कुछ न सूझा तो सरपट भाग लिया ... और दौड़ते दौड़ते आ पहुंचा मुझे डिस्टर्ब करने.... उसकी तो मरी पड़ी थी मेरी भी मरवाना चांह रहा था.... ले गंडेश्वर इसकी भी मार.... खुदा खैर करे .... बच गया बेचारा बोल्ड ... महाधावक... मैं भटकता हुआ देश के किसी और कौने पर बैठा होता तो... चंदन वहां तक की दौड़ लगा देता और बोल्ट का रिकार्ड नाहक ही टूट जाता... और शुरू हो जाता उसका भी गंड योग.... चलो इस कहानी को मैं यहीं खत्म करना चांहूंगा ... लेकिन एक सवाल आप लोगों के लिए छोड़े जाता हूं ... शायद चंदन का भला हो जाये... गंडेश्वरों से बचने के लिए चंदन को अब क्या करना चाहिए.... मैं तो उसे समझा नहीं पा रहा हूं शायद आप ही कोई हल तलाश दें....आप जो भी सलाह देंगे में उसे चंदन तक पहुंचा दूंगा.. जैसे कि गंड योग पर समा जी... कसमा जी... इनके नाम की स्पेलिंग में यही पढ़ सका हूं और कृष्ण कुमार मिश्रा जी ने लिखा था... मैने चंदन को बता दिया... मैं खुद भी आप तीनों लोगों का आभारी हूं... लेकिन सावधान... गंड योग खत्म होने के बाद सलाह दें... नहीं तो गंडेश्वर आपकी भी....... जय हो।
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