• रेल किरायाः जेब पर डाका या सुरक्षा पॉलिसी प्रीमियम

    दशकों से पड़ी मुफ्तखोरी की आदत आखिर एक झटके में कैसे छूट जाएगी। किराया बढ़ने के बावजूद रोडवेज के मुकाबले रेलवे यात्रा के आधे दाम ही वसूल सकेगा, बावजूद इसके कथित चिंतकों ने सिर आसमान पर उठा लिया। आखिर सोचिए भी तो सही कि केंद्र सरकार ने किराया क्यों बढ़ाया, दवा कड़वी होती है और मर्ज बढ़े इसके पहले इसे लेना भी जरूरी होता है। बस यही समझ लीजिए कि रेल हादसे में जान गंवाने से बेहतर है जरा का किराया ज्यादा देकर बीमार रेलवे की सेहत दुरुस्त करने की ओर पहला कदम उठा लिया जाए। रेलवे के हाल और हालात पर नजर डालती एक रिपोर्टः
            जब से देश में गठबंधन सरकारों का दौर आया है तब से प्रमुख सहयोगी दल को रेल मंत्रालय देने का चलन बन गया है. रेलवे की बदहाली की शुरुआत पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनने के साथ शुरू हुई। इस सरकार में चार रेल मंत्री बदले गए। शुरुआत राष्टीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रमुख सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार को रेल मंत्री बनाने के साथ हुई। नितीश के बाद ममता बनर्जी, राम नायक और आखिरी साल में वाजपेयी को फिर नीतीश को रेल मंत्रालय देना पड़ा। इसके बाद जब कांग्रेस की अगुवाई में केंद्र में संप्रग सरकार आई तो पहले राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव तो बाद में तृणमूल की ममता बनर्जी के हाथ में रेल मंत्रालय आया. काबिले गौर है कि मनमोहन सिंह के दस साल के कार्यकाल में आठ बार रेल मंत्री बदले गए। अब सवाल यह उठता है कि आखिर रेल मंत्रालय से जुड़ी वे कौन सी बाते हैं जिनकी वजह से हर प्रमुख सहयोगी इस मंत्रालय को अपने हाथ में लेना चाहता है? इस बारे में रेलवे की यात्री सेवा समिति के हाल तक सदस्य रहे रघुनाथ गुप्ता कहते हैं, ‘इसकी असली वजह यह है कि रेल सीधे तौर पर देश की एक बड़ी आबादी से जुड़ा हुआ है. इसलिए रेल मंत्री के पास यह अवसर होता है कि वह अपने लोकलुभावन फैसलों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करे.इसकी सबसे बड़ी उदाहरण ममता बनर्जी हैं. संप्रग के पहले कार्यकाल में रेल मंत्री थे लालू प्रसाद यादव. जब 2004 में लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री बने तो सालों से घाटे में चल रही भारतीय रेल अचानक से फायदे में आ गई और रेलवे के मुनाफे की खबरों के मीडिया पट गई. संप्रग 2009 में दोबारा सत्ता में आई और बिहार में लालू प्रसाद यादव की पार्टी बुरी तरह हारी। नतीजा यह हुआ कि रेल मंत्रालय लालू के हाथ से निकलकर संप्रग के नए सहयोगी तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख ममता बनर्जी के हाथों में चला गया। संप्रग के दूसरे कार्यकाल में कई विभागों में भयानक अराजकता दिखने लगी. रेलवे की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही. पहले कार्यकाल में जहां रेलवे भारी मुनाफा कमाती हुई दिख रही थी वह अचानक से कर्ज के बोझ तले दबी हुई दिखने लगी. हालांकि, जानकार यह मानते हैं कि लालू प्रसाद यादव ने अपनी कलाकारी से रेलवे को फायदे में दिखाया था जबकि हकीकत यह थी कि रेलवे मुनाफा नहीं कमा रही थी.                                लालू यादव के हटने के बाद जब संप्रग के दूसरे कार्यकाल में रेल मंत्रालय ममता बनर्जी के हाथ में पहुंचा तो उन्होंने भी कहा कि लालू का मुनाफे का दावा खोखला था और रेलवे को कोई मुनाफा नहीं हो रहा था. ममता बनर्जी रेलवे पर एक श्वेत पत्र लाईं. जिसने यह साबित किया कि रेलवे की माली हालत बहुत बुरी है. इस बाबत  रेलवे से संबंधित कई जानकारों के मुताबिक भले ही रेलवे लालू के समय में मुनाफा नहीं कमा रही थी, लेकिन रेलवे को उतना घाटा भी नहीं हो रहा था जितना ममता के कार्यकाल में हुआ। रेलवे की हालत ऐसी हो गई कि जो घोषणाएं पहले से हुई हैं, उन्हें लागू करने के लिए रेलवे के पास पैसे नहीं था. रेलवे के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए भी रेलवे के पास पैसे नहीं थे और इस वजह से कई मुद्दों पर रेल मंत्रालय और योजना आयोग के बीच मतभेद की खबरें भी आती रहीं. कई जानकार तो इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल की नाकामी का सबसे बड़ा उदाहरण रेलवे बना. पहले बिहार के मुख्यमंत्री रहे और उसके बाद रेलवे की स्‍थायी संसदीय समिति के सदस्य रामसुंदर दास कहते हैं कि कांग्रेस ने तो चुनावी लाभ के लिए रेलवे का इस्तेमाल करने की पूरी छूट ममता को दे दी. इस वजह से रेलवे की क्या हालत हुई, आज यह सबके सामने है. मनमोहन सिंह की सरकार की नाकामी का सबसे बड़ा उदाहरण रेलवे है.                                                                               रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष रहे आरएन मल्होत्रा कहते हैं, ‘हर रेल मंत्री पर रेलवे के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप लगे हैं. रेलवे की खराब हालत के लिए इसका राजनीतिक इस्तेमाल काफी हद तक जिम्मेदार है.जब से ममता बनर्जी रेल मंत्री बनीं तब से उन पर यह आरोप लगते रहे कि वे रेलवे और खास तौर पर रेल बजट का इस्तेमाल पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने के लिए ही किया। वे 2009 में रेल मंत्रालय में आई थीं और उन्होंने जो तीन रेल बजट संसद में पेश किए उनमें से सभी में उन्होंने अपने गृह राज्य पश्चिम बंगाल पर खास मेहरबानी दिखाई. वित्त वर्ष 2011-12 के लिए रेल बजट पेश करते समय भी ममता बनर्जी ने बंगाल के लिए कई घोषणाएं कीं. पश्चिम बंगाल के चुनावी माहौल को देखते हुए ममता बनर्जी ने इस राज्य को न सिर्फ नई रेलगाडि़यां दी थीं बल्कि यहां रेलवे की कई परियोजनाएं लगाने की भी घोषणा की थी. इसमें दार्जिलिंग में सॉफ्टवेयर एक्सिलेंस पार्क, नंदीग्राम में रेल इंडस्ट्रीयल पार्क और सिंगुर में मेट्रो रेल कोच कारखाना प्रमुख हैं. पिछले साल ममता पर बिहार और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के सांसद भेदभाव का आरोप लगा रहे थे. दरअसल, रेल बजट में अपने राज्य को ज्यादा देने का चलन नया नहीं है. बिहार से रेल मंत्री बनने वाले नेताओं ने भी ऐसा किया है और अब इसे स्वाभाविक मान लिया गया है. रामविलास पासवान से लेकर लालू यादव और नितीश कुमार तक, बिहार से आने वाले सभी रेल मंत्रियों पर आरोप लगता रहा है कि उन्होंने अपने गृह राज्य को रेल बजट में खास तरजीह दी. जिसका फायदा उन्होंने राज्य की जनता को लुभाने में उठाया।                                                                                  ममता के खासमखास माने जाने वाले पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह स्वीकार किया कि रेलवे बीमार हालत में है. उन्होंने कहा, ‘अगर सुधार के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो रेलवे का परिचालन और इसकी माली हालत दोनों की दशा काफी बिगड़ जाएगी.उनके बयान से यह साफ है कि भारतीय परिवहन व्यवस्था की जीवन रेखा मानी जाने वाली रेलवे संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल में नाकामी का कितना बड़ा उदाहरण बन गया है. ऑल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के तत्कालीन महासचिव शिवगोपाल मिश्रा कहते हैं, ‘जब तक रेलवे का राजनीतिक इस्तेमाल बंद नहीं होगा तब तक देश की परिवहन व्यवस्‍था की जीवनरेखा यानी भारतीय रेल का कायाकल्प नहीं हो सकता.
    अब रेलवे की समस्याएं को एक-एक करके समझते हैं. कोई भी व्यवस्था तब ही सही ढंग से चल पाती है जब आमदनी और खर्च का एक सही संतुलन कायम रहे. भारतीय रेलवे से यह संतुलन गायब है. भारत में रेल पटरियों की कुल लंबाई 64,015 किलोमीटर है और देश के कुल रेलवे स्टेशनों की संख्या 7,030 है. अभी भारतीय रेल का परिचालन औसत 95.7 फीसदी है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर रेलवे को 100 रुपये की आमदनी हो रही है तो तो इसमें 95.7 रुपये परिचालन पर खर्च हो रहा है. यानी रेलवे के विकास योजनाओं पर निवेश के लिए हर 100 रुपए में से बचे सिर्फ 4.3 रुपये. उल्लेखनीय है कि 2007-08 में परिचालन औसत 75.9 फीसदी था और हाल के सालों में इसमें हुई बढ़ोतरी को सीधे तौर पर रेल की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. लेकिन अभी रेलवे को होने वाली कुल आमदनी का महज 4.3 फीसदी ही विकास योजनाओं पर निवेश के लिए बच रहा है. हालांकि, रेलवे से जुड़े कई जानकार परिचालन औसत को बहुत ज्यादा महत्व नहीं देने की बात करते हैं. गुप्ता कहते हैं, ‘रेलवे का संचालन मुनाफा बनाने के मकसद से नहीं हो रहा बल्‍कि इसका मकसद जन कल्याण है. यह देश के बड़े तबके से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है.कुछ ऐसी ही राय मिश्रा की भी है. वे कहते हैं, ‘मुनाफा को अगर आधार बनाया जाएगा तो फिर रेलों का परिचालन तो एक दिन भी नहीं हो सकता. जैसे सरकार कई सरकारी योजनाओं को जन कल्याण के मकसद से चलाती है और इन पर करोड़ों रुपये खर्च करती है उसी तरह का दृष्‍टिकोण रेलवे के प्रति भी होना चाहिए.एक कड़वा सच यह भी है कि खराब परिचालन औसत की वजह से ही रेल बजट में राजनीतिक लाभ के लिए की जाने वाली लोकलुभावन घोषणाओं पर अमल नहीं हो पा रहा है. क्योंकि पैसे नहीं होने की वजह से संप्रग की दूसरी सरकार उन घोषणाओं को जमीन पर नहीं उतार पा रही है.                                                       2011-12 का रेल बजट पेश करते हुए ममता बनर्जी ने 131 नई ट्रेनों की घोषणा की थी. रेल मंत्रालय की तरफ से मिली आधिकारिक सूचना के मुताबिक 31 जनवरी, 2012 तक इनमें से 70 नई ट्रेनों को ही शुरू किया जा सका था जबकि 61 ट्रेनों के बारे में बताया गया कि चालू वित्त वर्ष में ही इन्हें शुरू करने की कोशिश हो रही है. रेलवे में घोषणाओं का हश्र क्या होता है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि ममता बनर्जी ने 33 ट्रेनों के रूट में विस्तार की बात कही थी लेकिन अब तक चार ट्रेनों का रूट विस्तार नहीं हो पाया है. पिछले साल बजट पेश करते हुए ममता बनर्जी ने यह घोषणा भी की थी कि 266 स्टेशनों को विकास आदर्श रेलवे स्टेशन के तौर पर किया जाएगा लेकिन इनमें से सिर्फ नौ स्टेशनों पर ही अब तक यह काम पूरा हो पाया है. बनर्जी ने 2010-11 का रेल बजट पेश करते हुए भी यह घोषणा की थी कि 201 स्टेशनों को आदर्श रेलवे स्टेशन बनाया जाएगा लेकिन इनमें से भी अब तक सिर्फ 76 का काम ही पूरा हो पाया है. रेलवे की खराब माली हालत का सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि पिछले कुछ सालों में रेल दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद रेलवे ने यात्रियों की बीमा खरीदना बंद कर दिया है. 2009 से रेलवे ने अपनी ट्रेनों में सफर करने वाले लोगों का बीमा करवाना बंद कर दिया है क्योंकि इस पर रेलवे को हर साल औसतन 78 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ रहे थे. इसका परिणाम यह हो रहा है कि रेल दुर्घटनाओं में जो लोग मारे जा रहे हैं या जो घायल हो रहे हैं, उन्हें मुआवजा का भुगतान रेलवे को अपनी जेब से करना पड़ रहा है. आज यह बात हर कोई स्वीकार कर रहा है कि रेलवे के बुनियादी ढांचे में जरूरी निवेश नहीं करना संप्रग सरकार की सबसे बड़ी गलती साबित हो रही है और इस वजह से पिछले सालों में कई रेल दुर्घटनाएं हुई. इन दुर्घटनाओं में हजारों लोगों की मौत हुई है. पिछले कुछ समय से बढ़ी रेल दुर्घटनाओं की वजह से रेल यात्रा करने वाले लोगों के मन में भय पैदा हो रहा है. कहना गलत नहीं होगा कि हर रोज दो करोड़ लोगों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वाली भारतीय रेल के लिए आज सुरक्षा सबसे बड़ी सरदर्दी बन गई है. कुछ महीने पहले रेल मंत्रालय ने देश के प्रख्यात परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में रेलवे की समस्याओं के अध्ययन और इनके समाधान की राह सुझाने के लिए एक समिति का गठन किया था. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में यात्रियों को सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचाने की रेलवे की क्षमता पर सवाल उठाया था. रेलवे ने प्रति व्यक्ति यात्री सुरक्षा पर महज 2.86 रुपये का निवेश किया है. यह खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक कैग की रिपोर्ट ने किया है. सुरक्षा उपायों पर पैसा खर्च करने के मामले में रेलवे किस कदर लापरवाह है, इसकी जानकारी भी कैग की रिपोर्ट देती है.
    कैग की रिपोर्ट कहती है कि रेलवे ने सुरक्षा मद में आवंटित रकम को भी पूरी तरह से खर्च नहीं किया. यह इसलिए चिंताजनक है क्योंकि सुरक्षा खमियों की वजह से रेल दुर्घटनाएं लगातार होती रहीं. रेल मंत्रालय के आंकड़े ही बताते हैं कि 2001 से 2011 के बीच कुल 2,431 रेल दुर्घटनाएं हुईं. इनमें 120 मामले टक्कर के हैं तो 1,410 पटरी से उतरने के. सिर्फ 2007-08 से 2010-11 के बीच हुई रेल दुर्घटनाओं में 1,019 लोग काल के गाल में समा गए. हर साल कई लोगों की मौत ट्रेन से कटकर भी हो जाती है लेकिन रेलवे इसे अपने नेटवर्क में हुई मौतों में नहीं गिनता. इस बारे में काकोदकर समिति कहती है, ‘हर साल तकरीबन 15,000 लोगों की मौत ट्रेन से कटकर होती है. इसमें तकरीबन 6,000 लोगों की जान तो सिर्फ मुंबई के लोकल नेटवर्क की वजह से जाती है. रेलवे भले ही इन मौतों को रेल दुर्घटना नहीं माने लेकिन कोई भी सभ्य समाज अपने रेल तंत्र द्वारा हो रही इतनी मौतों को स्वीकार नहीं कर सकता.भारत में दुर्घटनाओं की वजह से होने वाली कुल मौतों में आठ फीसदी मौतें रेल दुर्घटनाओं की वजह से हो रही हैं. चिंता की बात यह भी है कि 2010 में पूरी दुनिया में हुई 50 बड़ी रेल दुर्घटनाओं में से 14 भारत में हुईं. रेल दुर्घटनाओं में सिर्फ यात्रियों की ही मौत नहीं हो रही बल्‍कि रेलकर्मी भी मारे जा रहे हैं. काकोदकर समिति बताती है कि 2007-08 से 2010-11 के बीच ड्यूटी के दौरान रेलवे के तकरीबन 1,600 कर्मचारी मारे गए और 8,700 कर्मचारी घायल हो गए. मारे जाने वाले रेलकर्मियों में पटरी की मरम्मत करने से लेकर रेल कारखानों में काम करने वाले और यार्ड में काम करने वाले कर्मचारी शामिल हैं.
    जब नीतीश कुमार रेल मंत्री थे तो उन्होंने 2003 में कॉरपोरेट सेफ्टी प्लान की शुरुआत की थी. इस योजना को दस साल में दो चरणों में पूरा किया जाना था. पहला चरण 2008 में पूरा होना था. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. यह बात रेलवे पर बनी समितियां समय-समय पर उठाती रहीं. कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया है कि 31,835 करोड़ रुपये के फंड के साथ 2003 में शुरू हुए कॉरपोरेट सेफ्टी प्लान का पहला चरण 2008 में नहीं पूरा किया जा सका. इसके तहत पुराने रेल इंजनों को बदला जाना था, पटरियों और पुलों की स्‍थिति सुधारी जानी थी. ऐसे में रेलवे को लेकर मौजूदा संप्रग सरकार के रवैये को देखते हुए अब इस प्लान के दूसरे चरण के 2013 तक पूरा होने की संभावना पर भी ग्रहण लग गया है. मल्होत्रा कहते हैं, ‘अगर रेलवे को यात्रियों का भरोसा वापस पाना है और अपनी ब्रांड वैल्यू बचाकर रखनी है तो सुरक्षा के मोर्चे पर सबसे अधिक तत्परता के साथ निवेश की जरूरत है. रेल दुर्घटनाएं सुरक्षा के मोर्चे पर रेलवे की नाकामी बयां कर रही हैं.’                                       काकोदकर समिति कहती है, ‘जब तक बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने का काम नहीं होता तब तक रेलवे को नई गाडि़यां नहीं शुरू करनी चाहिए. आज देश की ज्यादातर रेल पटरियों पर उनकी क्षमता से अधिक रेलगाडि़यों का परिचालन हो रहा है. कई रूट पर तो इतनी अधिक गाडि़यां चल रही हैं कि पटरियों के मरम्मत के लिए भी वक्त नहीं मिल पा रहा है. पिछले एक दशक में इन गाड़ियों की संख्या में 30 फीसदी बढ़ोतरी हुई है.बुनियादी ढांचा को दुरुस्त किए बगैर नई गाडि़यां चलाए जाने के रेल मंत्रालय के राजनीतिक कदम के खिलाफ दबी जुबान में विरोध जोनल रेलवे के अधिकारियों ने भी मनमोहन सरकार में किया था. इन अधिकारियों ने यह कहा था कि उनके जोन में मौजूदा क्षमता को देखते हुए और अधिक रेलगाडि़यों के परिचालन की क्षमता नहीं है. रेल मंत्रालय के ही एक अधिकारी कहते हैं, ‘कोई भी अधिकारी नई गाड़ी शुरू करने का खुलेआम विरोध इसलिए नहीं कर पाता क्योंकि देश में रेल और राजनीति एक साथ चलती है. नई ट्रेनों की शुरुआत के कई फैसले राजनीतिक होते हैं.
    रेलवे कितनी सुरक्षित है, इसकी पोल खोलते हुए काकोदकर समिति अपनी रिपोर्ट में कहती है, ‘देश में तकरीबन 3,000 ऐसे रेल पुल हैं जिनकी उम्र 100 साल से अधिक हो गई है. वैज्ञानिक ढंग से न तो इनकी मरम्मत की जा रही है और न ही इन पर निगाह रखा जा रहा है. ऐसे में तब-तब सुरक्षा को लेकर खतरा बना रहता है जब-जब इन पुलों से होकर कोई रेलगाड़ी गुजरती है.रेल दुर्घटनाओं की वजह बताते हुए समिति कहती है, ‘कुल रेल दुर्घटनाओं में पटरी से उतरने की घटना की हिस्सेदारी 50 फीसदी है. पटरी से उतरने की तकरीबन 30 फीसदी घटनाएं रेल पटरियों की खराब हालत की वजह से हो रही है. इन पटरियों पर क्षमता से अधिक बोझ पड़ रहा है इसलिए पटरियों में दरार आने की वजह से रेल दुर्घटना के मामले सामने आ रहे हैं.’                                                                                                               अहम सवाल यह है कि क्या काकोदकर समिति की सिफारिशों पर अमल किया जाएगा? जब इस समिति का गठन रेल मंत्रालय ने किया था तो रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कहा था कि रेलवे की माली हालत खराब होने के बावजूद काकोदकर समिति की सिफारिशों को लागू करने की कोशिश की जाएगी. रेल मंत्रालय के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए इन सिफारिशों के लागू होने की संभावना कम ही लगती है. पहले भी कई समितियों का गठन रेलवे ने बड़े उत्साह के साथ किया लेकिन जब सिफारिशों को लागू करने की बात आई तो रेलवे पीछे हट गया. संप्रग के दूसरे कार्यकाल में भी सिफारिशों पर अमल करने के मामले उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एचआर खन्ना की अध्यक्षता वाली समिति ने रेल सुरक्षा पर 1998 में रिपोर्ट दी थी लेकिन उस समित‌ि की सिफारिशों पर अब तक अमल नहीं हो पाया है. दास कहते हैं, ‘जब तक इन समितियों की सिफारिशों को ठंढ़े बस्ते में रखा जाएगा तब तक रेलवे की समस्याओं का समाधान संभव नहीं लगता.खुद काकोदकर समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि अगर उसे सिर्फ एक सिफारिश करनी हो तो वह यह होगी की सुरक्षा संबंधी सिफारिशों को सही और समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए. समिति ने सिफारिशों के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक अधिकारप्राप्त समिति के गठन का सुझाव भी दिया है.                                                                                         रेल दुर्घटनाओं की एक बड़ी वजह के तौर पर जानकार उन रेलवे क्रॉसिंग को भी जिम्मेदार मानते हैं जो अब भी मानवरहित हैं यानी जिनकी निगरानी के लिए अब भी कोई व्यक्ति वहां तैनात नहीं है. ऐसे रेलवे क्रॉसिंग की संख्या अभी तकरीबन 14,896 है जो कुल रेलवे क्रॉसिंग का 36 फीसदी है. 2004 से लेकर अब तक हुई रेल दुर्घटनाओं में से एक तिहाई के लिए यही जिम्मेदार हैं. कुल रेल दुर्घटनाओं में से 59 फीसदी मौतें मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर हुई दुर्घटनाओं में ही हुई है. मिश्रा कहते हैं, ‘मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर तैनाती की बात हर बार चलती है लेकिन संसाधनों की कमी की वजह से यह योजना उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ रही जितनी तेजी से बढ़नी चाहिए थी.’ जानकार बताते हैं कि रेलवे की सुरक्षा से संबंधित सभी कार्यों को पूरा करने के लिए कम से कम 70,000 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत है. पैसे के अभाव में रेलवे सुरक्षा संबंधी बंदोबस्त नहीं कर पा रही है. रेल दुर्घटनाओं को रोकने के मकसद से कोंकण रेलवे ने 1999 में ही टक्कर रोकने वाला उपकरण विकसित किया था लेकिन धन नहीं होने की वजह से इन उपकरणों को ट्रेनों में नहीं लगाया जा सका है. दुनिया के कई प्रमुख देशों में रेल दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जीएसएमआर के नाम की तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसके जरिए रेल पटरी पर ट्रेन की रफ्तार खुद-ब-खुद निर्धारित होती है और रेड सिग्नल पार करने व एक ही पटरी पर दो ट्रेनों की आने की हालत में ट्रेन खुद-ब-खुद रूक जाती है. लेकिन रेलवे की नाकामी का ही नतीजा है कि इस तकनीक को भी पैसे की कमी का रोना रोकर भारत में इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है.
    पिछले दो साल में रेल दुर्घटनाओं की संख्या में बढ़ोतरी के लिए रेलवे की खाली पदों को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. जानकार बताते हैं कि रेलवे के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह इन खाली पदों को भर पाए. भारतीय रेलवे में 13,102 ड्राइवरों का पद खाली है. कुछ दिनों पहले खुद रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कहा था कि रेलवे की सुरक्षा से संबंधित तकरीबन 1.26 लाख पद खाली पड़े हैं. कुल मिलाकर देखा जाए तो रेलवे में तकरीबन 2.54 लाख पद खाली हैं. भारतीय रेल से संबंधित एक आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि पिछले 20 साल में सवारी और मालवाहक गाड़ियों की संख्या बढ़ने के बावजूद रेलवे कर्मचारियों की संख्या घटी है. 1990 में रेल कर्मचारियों की कुल संख्या 16 लाख थी जो अब घटकर 12.34 लाख पर पहुंच गई है. रेलवे की सुरक्षा में लगे जवानों की संख्या भी उस अनुपात में नहीं बढ़ी है जिस अनुपात में रेल यात्रियों की संख्या बढ़ी है. कैग रिपोर्ट कहती है, ‘2005-06 में रेल यात्रियों की कुल संख्या थी 572.5 करोड़. जो 2009-10 में 28 फीसदी बढ़कर हो गई 738 करोड़. जबकि इस बीच रेलवे स्टेशनों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार जीआरपी जवानों की संख्या महज 3.37 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 31,259 से बढ़कर 32,312 पर ही पहुंची.जीआरपी में खाली पदों की संख्या 2005-06 की सात फीसदी की तुलना में बढ़कर 16 फीसदी पर पहुंच गई. रेलवे सुरक्षा बल आरपीएफ का भी यही हाल है. आरपीएफ में भी बड़ी संख्या खाली पदों की है. इस वजह से रेल और रेल यात्री दोनों की सुरक्षा पर हर वक्त खतरा मंडराता रहता है. कैग ने अपने सर्वेक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा है, ‘हर रोज 12,709 रेलगाडि़यों का परिचालन किया जाता है. 2009-10 में इनमें से औसतन सिर्फ 32 फीसदी यानी 4,019 रेलगाडि़यों पर ही सुरक्षा बल तैनात किए जाते थे. जिन रेलगाडि़यों पर एस्कॉर्ट पार्टी नहीं थी उनमें तिरुवेंद्रम राजधानी, मुंबई राजधानी, अगस्त क्रांति राजधानी और मैसूर-चेन्नई शताब्दी जैसी हाई-प्रोफाइल माने जाने वाली गाडि़यां भी शामिल थीं.’ एस्कॉर्ट पार्टी के नहीं होने का परिणाम भी कैग रिपोर्ट में बताया गया है. इसमें कहा गया है, ‘जिन गाडि़यों में एस्कॉर्ट पार्टी नहीं जाती थी उनमें होने वाले आपराधिक घटनाओं की संख्या 2007-08 में 4,797 थी जबकि 2009-10 में यह बढ़कर 6,072 हो गई. वहीं जिन गाडि़यों के साथ एस्कॉर्ट पार्टी रहती थी उनमें होने वाली आपराधिक घटनाओं की संख्या इस दौरान 2,781 से घटकर 2,571 हो गई.रेलवे में खाली पदों की कहानी यह है कि सुरक्षा के लिहाज से भारतीय रेल के लिए डॉग स्कावॉयड में 405 कुत्तों की जरूरत बताई गई है. लेकिन अभी रेलवे के पास सिर्फ 292 कुत्ते ही हैं. यानी डॉग स्क्वॉयड में भी जरूरत से 28 फीसदी यानी 113 कुत्ते कम हैं.
    जानकारों का मानना है रेलवे में भी तेजी से तकनीकी बदलाव हो रहा है लेकिन इसके सही संचालन के लिए रेल कर्मचारियों को उचित प्रशिक्षण नहीं मिल पा रहा है. संप्रग के दूसरे कार्यकाल में रेलकर्मियों के प्रशिक्षण का स्तर सुधारने के लिए भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. मल्होत्रा कहते हैं, ‘बगैर सही प्रशिक्षण के आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि सही ढंग से भारतीय रेल जैसे विशाल तंत्र का संचालन हो पाएगा. रेलवे को अपने कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर भी अच्छा-खासा निवेश करना चाहिए.प्रशिक्षण के मामले में रेल कर्मचारी की लापरवाही की बात भी सामने आ रही है. कैग की रिपोर्ट में कहा गया है, ’2005 से 2010 के बीच भारतीय रेल ने 4,112 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए. इनमें भाग लेने के लिए रेलवे ने 32,622 कर्मचारियों को नामित किया था लेकिन 1,112 कर्मचारियों ने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं लिया.’ विरोध प्रदर्शन के लिहाज से भी रेलवे को सबसे आसान निशाना समझा जाता है. इस वजह से रेलवे को आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है. कैग की रिपोर्ट में 2010 के नौ महीनों का अध्ययन करके यह बताया गया है कि उस साल अप्रैल से दिसंबर के बीच रेल रोके जाने के कुल 115 मामले सामने आए. इनमें से कुछ ऐसे थे जो तीन सप्ताह से अधिक तक चले. उल्लेखनीय है कि उस साल जाट आरक्षण को लेकर राजस्थान में आंदोलन चल रहा था और आंदोलनकारियों ने रेल पटरी पर कब्जा जमा रखा था. कैग ने अनुमान लगाया है कि उस नौ महीने के दौरान ही रेल रोको अभियान की वजह से भारतीय रेल को 504.62 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा.
    बड़ी घोषणाओं के इतर भी अगर देखा जाए तो आज रेलवे कई मामूली लेकिन अहम मोर्चों पर भी फिसड्डी साबित हो रही है. आज अगर कोई आदमी रेलवे स्टेशन पर जाता है तो उसे कई तरह की बुनियादी सुविधाओं के अभाव का सामना करना पड़ता है. एक आम यात्री को रेलवे स्टेशन पर न तो पीने लायक पानी मिलता है और न ही उसे साफ-सुथरे शौचालय मिलते हैं. अगर किसी को रेलवे स्टेशन या रेलगाड़ी में प्यास लग गई तो उसे 20  से 25 रुपए खर्च करके बोतलबंद पानी खरीदना पड़ता है. खुद रेलवे भी रेल नीर के नाम से बोतलबंद पानी बेचकर हर साल करोड़ो रुपए कमा रही है. रेलवे स्टेशन के शौचालय भी बदहाल हैं. कई स्टेशन पर तो इन शौचालयों में इतनी गंदगी होती है कि उनमें जाना और सकुशल निकल पाना जंग लड़ने सरीखा हो जाता है. गंदगी भारतीय रेल की एक ऐसी समस्या बनती जा रही है, जो कभी नहीं खत्म होने वाली हो.                                                     ममता बनर्जी रेलवे पर जो श्वेत पत्र लाईं थीं उसमें भी इस समस्या को रेखांकित किया गया है और कहा गया है कि इस मोर्चे पर जितना काम होना चाहिए था उतना नहीं हुआ. रेलगाड़ी के अंदर भी गंदगी की समस्या बरकरार है. खास तौर पर सवारी गाडि़यों में यह समस्या कुछ ज्यादा ही बड़ी दिखती है. सरकारी अधिकारी गंदगी के लिए यात्रियों को जिम्मेदार ठहराकर अपना पल्ला झाड़ते नजर आते हैं. काकोदकर समिति ने स्पष्ट किया है कि रेलवे की गंदगी की समस्या किस तरह से यात्रियों की सुरक्षा के लिए खतरा बनती जा रही है, ‘ट्रेनों के शौचालयों से मल-मूत्र पटरियों पर गिरता है. इससे गंदगी तो बढ़ती है साथ में सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा होता है. क्योंकि मल-मूत्र की गंदगी की वजह से पटरियों का देखरेख और मरम्मत का काम मुश्‍किल हो जाता है. अगर इस समस्या का समाधान नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में रेल पटरियों के और खराब होने और इनकी मरम्मत और देखरेख से रेलकर्मियों के इनकार जैसी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है.   रेलवे की सभी समस्याओं के जड़ में पैसे की कमी को मुख्य वजह बताया जाता है. काकोदकर समिति ने भी भारतीय रेल की मौजूदा माली हालत पर चिंता जताई और कहा कि इसे सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है. अब सवाल यह है कि आखिर रेलवे की माली हालत कैसे सुधरे? कई लोग यह मानते हैं कि रेलवे की माली हालत सुधारने का एकमात्र रास्ता यात्रा किराये में बढ़ोतरी करना है. लेकिन ऐसे लोगों के इस तर्क को खुद रेलवे की आमदनी के आंकड़े काटते हैं. 1 अप्रैल, 2011 से 31 मार्च, 2012 के बीच रेलवे की कुल आमदनी पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 10.4 फीसदी बढ़कर 84,155.4 करोड़ रुपये हो गई. इस अवधि में यात्री सेवाओं से होने वाली आमदनी भी 9.41 फीसदी बढ़कर 23,345.48 करोड़ रुपये पर पहुंच गई. इसका मतलब यह हुआ कि यात्री किराये में बढ़ोतरी के बगैर भी इस क्षेत्र में रेलवे की आमदनी बढ़ रही है लेकिन फिर भी रेलवे की जरूरतें नहीं पूरी हो पा रही हैं. संकेत साफ है कि आमदनी के वैकल्‍पिक रास्ते तलाशने होंगे या फिर जन कल्याणकारी सेवा की अपनी साख बचाने के लिए सरकार से भारी सब्‍सिडी मांगनी होगी.
    आमदनी के वैकल्‍पिक रास्तों के तौर पर कुछ जानकार रेलवे की खाली पड़ी जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल की वकालत करते हैं. गुप्ता कहते हैं, ‘रेलवे की काफी जमीन देश के प्रमुख व्यावसायिक केंद्रों पर खाली पड़ी है. अगर रेलवे अपनी जमीन का सही ढंग से व्यावसायिक इस्तेमाल करे तो रेलवे की माली हालत सुधारने में काफी मदद मिलेगी.बीते दिनों रेल मंत्रालय ने स्टेशनों के आधुनिक बनाने के अलावा खाली जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल की संभावनाओं को तलाशने के मकसद से एक अलग कंपनी रेलवे स्टेशन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड की स्‍थापना की. रेलवे ने 2000 में रेलटेल नाम से एक कंपनी का गठन किया था. इसके तहत दूरसंचार सेवाएं मुहैया कराके पैसा कमाने की योजना रेलवे ने बनाई ‌थी. उस वक्त कई जानकारों ने इसे रेलवे की माली हालत सुधारने की दिशा में अहम कदम माना था. क्योंकि भारत में दूरसंचार क्षेत्र का कारोबार तेजी से बढ़ रहा था. लेकिन12 साल गुजरने के बाद भी इस मोर्चे पर कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पाई है.
    रेलवे की माली हालत सुधारने के उपाय बताते हुए दास, मिश्रा और गुप्ता, तीनों यह कहते हैं कि सरकार को यह मानसिकता बदलनी चाहिए कि रेलवे का संचालन एक मुनाफा कमाने वाली कंपनी की तरह किया जा सकता. दास कहते हैं कि रेलवे से करोड़ों लोगों का कल्याण सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है इसलिए इसमें जन कल्याण की बात सबसे पहले होनी चाहिए. वहीं मिश्रा निजी कंपनियों के तर्ज पर रेलवे को बेलआउट पैकेज देने की बात करते हैं. मिश्रा कहते हैं, ‘मेरा मानना है कि अगले पांच साल में रेलवे में 2.5 लाख करोड़ रुपये निवेश की जरूरत है. अगर हर साल भारत सरकार रेलवे में 50,000 करोड़ रुपये निवेश करे तो देश की परिवहन व्यवस्‍था की जीवनरेखा यानी भारतीय रेल की सेहत सुधर जाएगी. अगर ऐसा नहीं किया गया तो खतरा इस बात का है कि कहीं भारतीय रेल भी एयर इंडिया की राह न चल पड़े और कर्मचारियों का वेतन समय पर मिलना बंद हो जाए.गुप्ता के मुताबिक कर राहत से लेकर कई तरह की छूट जब निजी कंपनियों को मिल सकती है तो फिर देश के आम लोगों के जीवन से सीधे तौर पर जुड़े रेलवे के लिए भी सरकार को सब्‍सिडी का रास्ता अपनाना चाहिए.
    आखिर में एक बात और आज हर मामले में भारत और चीन की तुलना होती है. अगर रेल के क्षेत्र में इन दोनों देशों की तुलना हो तो एक समय इस मामले में भारत से काफी पीछे रहा चीन आज भारत से काफी आगे निकल गया है. भारत में पहली रेल 1853 में दौड़ी थी जबकि चीन में इसके 23 साल बाद यानी 1876 में पहली रेलगाड़ी चली थी. जब 1947 में भारत आजाद हुआ तो उस समय भारत का रेल नेटवर्क 53,596 किलोमीटर में फैला हुआ था जबकि उस वक्त चीन का रेल नेटवर्क सिर्फ 27,000 किलोमीटर का था. आजादी के 65 साल कुछ महीने में पूरे हो जाएंगे और तब से लेकर अब तक भारत के रेल नेटवर्क में 10,000 किलोमीटर की बढ़ोतरी भी नहीं हो पाई. अभी देश के कुल रेल नेटवर्क की लंबाई 64,015 किलोमीटर है. जबकि चीन 78,000 किलोमीटर के रेल नेटवर्क के साथ भारत से इस मामले में काफी आगे निकल गया है. ऐसे में यदि नरेंद्र मोदी सरकार ने किराया बढ़ाने की घोषणा की है तो उसकी वजह साफ है, रेलवे की हालत को सुधारना, हजारों जिंदगियां बचाना और दुनियां के दूसरे सबसे बड़े यातायात नेटवर्क को दुरुस्त रखना। जैसे कुछ लोगों के पास इस फैसले का विरोध करने की वजह है तो जनता के पास इसका स्वागत करने की भी वजह है। तय आपको ही करना है कि सुधार चाहिए या फिर बदहाली, अव्यवस्था और मौत का रास्ता चुनेंगे।


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