• सुनो द्रोणाचार्य, इस बार नहीं कर सकोगे अभिमन्यु की हत्या...

    महाभारत का 13वां दिन... 

    कौरवों की सेना की कमान उनके शिक्षक गुरु द्रोणाचार्य के हाथों में थी। चेलों से मुकाबले की बात सुनकर उनका दंभ और भी बढ़ गया था। द्रोणाचार्य युद्ध को समाप्त कर जीत अपने नाम दर्ज कराने को उतावले हो उठे। युद्ध को एक ही दिन में खत्म करने का महज एक ही तरीका था कि किसी तरह धर्मराज युदिष्ठिर को बंदी बनाना लिया जाए। उन्होंने अपने ज्ञान और अनुभव के तरकश से चक्रव्यूह का तीर निकाला। जिसे भेदने का कौशल उनके अतरिक्त सिर्फ अर्जुन ही जानता था। तय हुआ कि त्रिगत नरेश बंधु श्रीकृष्ण और अर्जुन को घेरकर युद्ध स्थल से इतना दूर ले जाएंगे कि युद्ध की समाप्ति तक वह युद्ध भूमि में वापस न लौट सकें। उनके दूर जाते ही युद्ध की रणनीति बदल दी जाएगी और चक्रव्यूह की रचना कर पांडवों को अंतिम संघर्ष के लिए चुनौती दी जाएगी। गंगापुत्र भीष्म, दानवीर कर्ण, युवराज दुर्योधन और गुरुओं के गुरु द्रोणाचार्य चक्रव्यूह के केंद्र में रहेंगे। पांडव योद्धाओं को चक्रव्यूह के पहले द्वार पर ही मार गिराया जाएगा, लेकिन कोई केंद्र तक पहुंच भी गया तो उसे यह योद्धा बंदी बना लेंगे। बलशाली सिंधु नरेश जयद्रथ को चक्रव्यूह की सुरक्षा का भार सौंपा गया था।


    कौरवों ने जैसा चाहा वैसा ही हुआ... 

    दिन निकला और युद्ध की शुरुआत हुई। सबकुछ योजना के मुताबिक ही चल रहा था।  श्रीकृष्ण और अर्जुन भी त्रिगत के छल का शिकार हो गए। गुरु द्रोणाचार्य ने मौका देखते ही चक्रव्यूह की रचना कर  पांडवों को इसे भेदने की चुनौती दे डाली। ऐसे में धर्मराज युद्धिष्ठर पीछे भी नहीं हट सकते थे और आगे बढ़ने का रास्ता उन्हें पता नहीं था। अपने वंश को पराजय के मुंहाने पर खड़ा देख सुभद्रा और अर्जुन के सोलह वर्षीय पुत्र और महान योद्धा अभिमन्यू ने हुंकार भरी। उसने मां के गर्भ में ही चक्रव्यूह को भेद कर अंदर जाने की कला सीख ली थी, लेकिन जब उसके पिता बाहर निकलने का रास्ता बता रहे थे तब मां को नींद आ गई और चक्रव्यूह से बाहर निकलने का ज्ञान हासिल नहीं कर सका। बावजूद इसके उसने उस युग के महान योद्धाओं को चुनौती देने में देर नहीं लगाई। 

    अभिमन्यू ने तोड़ा अहम...

    धर्मराज को यह बात पता चली तो उन्होंने बच्चे से पहले खुद के प्राण न्यौछावर करने की जिद की, लेकिन धर्म की हार हो यह किसी को मंजूर नहीं था। नतीजन अभिमन्यू ने कमान संभाल ली और मैदान में उतर पड़ा। उसके तीरों का जयद्रथ और दुर्योधन पल भर भी सामना नहीं कर सके। भीष्म और कर्ण तक के होश फाख्ता हो गए। अपनी रणनीति असफल होते देख गुरु द्रोणाचार्य तो मानो पागल ही हो उठे। भीष्म ने अभिमन्यु के रथ को निशाना बनाया... कर्ण ने धनुष और कमान पर...और जब बाल वीर निहत्था हो गया तो गुरु द्रोणाचार्य ने उस सूरवीर पर तीरों की बौछार कर डाली। बावजूद इसके कौरवों के तीनों सेनापति महाभारत के युद्ध में जौहर दिखा रहे सबसे महान योद्धा ना रोक सके और ना ही झुका सके। पराजय के डर से तीनों ने युद्ध के नियमों को तिलांजलि दे एक निहत्थे बालक योद्धा की निर्मम हत्या कर डाली।


    युग बदले धर्म-अधर्म का युद्ध नहीं... 

    महाभारत के युद्ध को खत्म हुए चाहे कई युग गुजर गए हों, लेकिन धर्म और अधर्म की लड़ाई आज भी जारी है। ध्रतराष्ट्र आज फिर अपने पुत्रमोह में अंधा हो चुका है। दुर्योधन सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी हद तक गिरने को तैयार है। द्रोणाचार्य जैसे राजगुरुओं ने अपनी पदवी बचाने के लिए एक बार फिर चक्रव्यूह रचा हैं। भीष्म जैसा निश्चछल योद्धा राजभक्ति के नाम पर फिर अधर्मियों का साथ दे रहा है। कर्ण जैसे लोग दोस्ती के नाम पर नापाक सत्ता बचाने के लिए एक बार फिर निहत्थे बालक पर तीरों की बौछार कर रहे हैं। युधिष्ठर, भीम, नकुल और सहदेव चक्रव्यूह को तोडऩे के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन जयद्रथ उनकी एक नहीं चलने दे रहा। बावजूद इसके अभिमन्यु तुम इस बार छल का शिकार नहीं होगे। कृष्ण और अर्जुन इस बार त्रिगत नरेश बंधु के छल में नहीं फसेंगे। जा लड़, तोड़ डाल इस चक्रव्यूह को। ढ़ाल बन जाएगा अर्जुन तेरी। चक्रव्यूह के अंतिम द्वार को तोडऩे की राह दिखाएंगे कान्हा तुझे। बता दे औकात अधर्मियों को। फहरा भगवा पताका धर्म की। जगत जरूर करेगा जय-जयकार तेरी। 

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