• ... गैर जात



    रेडियो ऑन करते ही... सोलह बरस की बाली उमर को सलाम करती... मोहब्बत के दुश्मनों की लाख कोशिशों के बावजूद भी न झुकी उस नजर को सलाम भेजती... मधुर आवाज .... शायरके अल्फाजों को सीधे उसके दिल में उतारती चली गयी... पिछला सुर अभी थमा ही था कि .... चुलबली आवाज ... सुन दीदी सुन तेरे लिए एक रिश्ता आया है.... की शोख-मस्ती कबीर को बेचैन कर गयी.... उसने भी तो दीदी से यही कहा था... मैं शादी करना चाहता हूं... एक ही सांस में दी से सारे हालात-ए-दिल बयां कर बैठा था वो... इस ताकीद के साथ कि दी सिर्फ जीजू को ही बताना और किसी को नहीं.... जो भी रास्ता निकालना है वो निकालेंगे...
    दो दिन करवटें बदलते-बदलते गुजरे थे... फिर एक दिन अचानक अल-सुबह बजी मोबाइल की वो मनहूस घंटी न जाने कितने रिश्तों में खटास भर गयी... उन रिश्तों में जिन पर कबीर बेहद इतराता फिरता था... अपना कहता था... उन्हीं लोगों ने तो उसकी महज एक .... हां महज एक... दिली ख्वाहिश का बड़ी बेरहमी से गला घोंट डाला था... फोन पर दूसरी तरफ छुटकी थी... जो तफ्शील से घर में बरपे उस हंगामे का खुफिया ब्यौरा दे रही थी... भाई! आपको पहले घर पर बताना चाहिए था ... क्या बूआ-फूफा, मामा-मामी और क्या चाचा-चाची ... सब चू-चपड़ करने में लगे थे... खानदान का वारिस... युवराज... सबसे जिम्मेदार..... कैसे दूसरी जात में शादी करने की गैर-जिम्मेदाराना हरकत कर सकता है.... नश्ल का क्या होगा.... हमारे बच्चों का क्या होगा... उनकी शादी कैसे होगी अपनी जात के ऊंचे खानदानों में.... और क्या होगा सदियों की उस विरासत का ... ऊंची नाक का जो बड़े जतन से पाल-पोश कर बड़ी हुई थी।
     
    अनायास हुए हमले के लिए कबीर बिल्कुल भी तैयार न था... उसे भरोसा नहीं हो रहा था कि उसकी दी.... जिसे वो अपनी जान से भी ज्यादा चांहता था... जिसका प्यार उसे मिल जाये ... सिर्फ इत्ती सी बात के लिए भिड़ गया था... खानदान... विरासत और उस ऊंची नाक से... जिस पर अब विश्व व्यापी संकट आ खड़ा हुआ था... तभी उसके जहन में बिजली की तरह कौंधे वो अल्फाज... गैर जात
    हां वो गैर जात की ही थी... लेकिन क्या इक इशारे भर से बड़ी से बड़ी बात को पल भर में समझ जाना... जात से ज्यादा बड़ा था... या फिर कई हजार दिनों तक हर दिन और शाम को साथ बिताये वो पल... शर्दी-खांसी-जुकाम जैसी मामूली हरकत से लेकर कई हफ्तों तक अस्पताल के उस गंध भरे बिस्तर पर जन्नत का एहसास करातीं सिर को सहलाती उन उंगलियों का हिसाब... जात के हिसाब से कहीं कमजोर था... नहीं बिल्कुल भी नहीं.... किसी भी कीमत पर नहीं... लगभग चीख पड़ने के अंदाज में बड़बड़ाता.... खयाली हिसाब-किताब से बाहर निकलता कबीर... तेजी से उठ खड़ा हुआ... वो फैसला कर चुका था अपनी जिंदगी का... जात का, मजहब का... जो उस वक्त सिर्फ और सिर्फ मोहब्बत ही थी...
    मुझे शादी करनी है.... कबीर बोला... हां तो कर लो... हट्टे-कट्टे हो... अच्छा कमाते हो... खूबसूरत!... तो नहीं हो लेकिन चलेगा.... वैसे, लड़की देखी है या फिर कोई खानदानी-विरासती मामला है... पुराना... बचपन का ... हंसती, चुटकीयां लेती सोनाली... सुलगाये पड़ी थी कबीर को.... बीते दिनों की उठापटक से बेसुध-बेखबर.... लेकिन कबीर, गुंस्से में लाल-पीला हुए जा रहा था... यार, हर वक्त मजाक बेहतर नहीं रहता... मुझे तुम्ही से शादी करनी है ... चलो ....

    वारी जाऊं.... छह साल हो गये इंतजार करते हुए... तुम्हारे फूटे मुंह से अब तक यह अल्फाज नहीं उगलवा सकी थी.... मेरी जान... आज तो तुमने मेरा दिल ही जीत लिया... सोनाली की चकल्लस अगले ही पल काफुर हो गयी... जब उसे राजपूताना हवेली में मचे घमासान का पुरसा हाल कबीर ने सिलसिलेबार बयां किया...ठीक है मैं घर बात करती हूं... माहौल बेहद गंभीर हो चला था उस वक्त.. सोनाली की अल्फाज अदायगी तो कुछ ऐसा ही बयां कर रही थी... कबीर ताड़ गया.... अपने सोना को बाहों में भरते हुए... दिलासा देते... हिम्मत बंधाने की कोशिश में जुट गया... लेकिन खुद कबीर का मन हर दम नई उठा-पटक में उलझा हुआ था... लाख कोशिशों के बावजूद हजारों सवाल ऐसे थे जिनके जवाब उसे तलाशे नहीं मिल रहे थे....सवाल!... हां सवाल.... यही कि जीजू ने बात क्यों नहीं की अभी तक... दी ने क्यों अपना वायदा तोड़ा... और सबसे बड़ा सवाल ये कि पा के तमाम सवालों का जवाब वो कैसे देगा... क्या देगा... चलो मां को तो वह मनुहार करके मना लेगा... लेकिन... लेकिन क्या?.... यही कि जिन लोगों की आह भर निकलती थी और वो जान छिड़कने पर अमादा हो जाता था... उन अपनों ने उसके साथ ये बेगानों जैसा बर्ताव क्यों किया... जबकि वो लोग अच्छे से वाकिफ थे कि कबीर उनकी इजाजत के बगैर कोई फैसला लेना तो दूर उसके बारे में सोचेगा तक नहीं... खैर, इस पल तो सब बिखर ही चुका था.... वो प्यार... वो भरोसा... वो वायदा और वो रिश्ता..... कुछ रोज ऐसे ही बीते... खामोशी... उथल-पुथल.. और चिंताओं के ज्वार-भाटे पर सैर करते...
     क्या हुआ बॉस... बत्ती क्यों गुल है... इस पॉवर हाउस की... जनरेटर सप्लाई ले लेते... अभी तक वो सारी चकल्लस अनसुनी किये जा रहा था... लेकिन अगले ही पल उछला एक सवाल कबीर की हालात बयां करने के लिए काफी था... दीया पूछ रही थी, कहां है तुम्हारा जनरेटर.... बैटरी बैक-अप....कहां है, मतलब... अपने केबिन में होगी....दीया के सवाल का जवाब भी सवाल ही था... नहीं यार... दो-तीन दिन से दिख नहीं रही वो... आखिर क्या चल रहा है तुम दौनों के बीच... उसकी लीव तो तु्म ही सेंक्शन करते होगे ना... मानो दीया ने सवालों की झडी लगा दी हो.... लेकिन कबीर के पास उसके किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं था.... बीते छह सालों में तो कभी ऐसा नहीं हुआ... कि वो सोना से जुड़े किसी सवाल का जवाब न दे सका हो..... वो समझ नहीं पा रहा था कि आखिर चल क्या रहा है हम दौनों के बीच.... उसने लीव भी नहीं मांगी और दफ्तर भी नहीं आ रही... हो सकता है मैं बिजी हूं तो सीधे जीएम से लीव सेंक्शन करा ली हो... लेकिन बताना तो चाहिए था.... कबीर को सवालों के भंवर से निकालते हुए सिर पर खड़ी दीया बोली... हैलो!... पॉवर कट खत्म हो जाये तो आ जाना घर... खाना मेरे यहीं खाना दौनों लोग... तुम खाली न हो तो मैं फोन कर दूंगी उसे... बॉय.... और वो चली गयी, नई टेंशन देकर..... तभी घंटी बजी.... आवारापन बंजारापन... कौन खला है सीने में... जाने कैसी आग लगी है, क्या ख्वाब जगा है सीने में.... कुछ ऐसी ही धुन बज रही थी... लेकिन ये क्या डिसप्ले पर सोना नहीं पा लिखा दिख रहा था उसे..
    प्रणाम.... कैसे हैं आप.... कॉल रिसीव करते-करते कलेजा मुंह को आ गया था कबीर का... दूसरी ओर पिताजी की रौबदार आवाज खनकी... हम तो ठीक है... आप के हालात कुछ ठीक नहीं लगते.... मैमने की तरह मिमियाता कबीर बोला... मैं ठीक हूं... बिना वक्त गंवाये... कबीर को कुछ कहने.... सफाई देने का मौका दिये बगैर पा बोले.... कौन है वो लड़की... क्या करती है... उसका परिवार... फोटो तो होगी ही... घर भेज दो... और आखिर में... शिद्दत के साथ की गयी एक शिकायत या उससे कहीं ज्यादा मशविरा था शायद वो... ये बात आप हमसे कह सकते थे... हमने हमेशा आपके फैसलों की कदर की है... खैर, कोई बात नहीं... बस आगे से ऐसा न हो... और जो भी करना है हमें बता कर करियेगा की ताकीद करते हुए उन्होंने फोन रख दिया।
    थोड़ा दुख भी हुआ और ज्यादा सी खुशी भी... दुख इस बात का कि पा का दिल दुखा. दी को की गयी उस कॉल की वजह से... और, बेहिसाब खुशी इस बात की कि उन्होंने इजाजत दे दी.... उसकी मोहब्बत पर मंजूरी की मोहर लगाते हुए ... उसके दिल के गुलशन को उजाड़ने से इन्कार कर दिया था... सारी बगावतें कुचल दी थीं उन्होंने... जो उनके मुगले आजम के खिलाफ सिर उठाने की हिमाकत कर रहीं थीं.... कहीं दूर गूंजते तराने की मंद सी आवाज उसे सुनाई पड़ रही थी उस वक्त... सुन साहिबा सुन, प्यार की धुन.... मैने तुझे चुन लिया, तू भी मुझे चुन-चुन-चुन..... लेकिन जिसे चुनना था वो आखिर है कहां.... ख्याल आते ही माथे पर बल पड़ गये कबीर के.....
    हैलो, कहां हो तुम... सब ठीक तो है.... कितने दिन की लीव ली थी.... मुझे बताने की जरूरत भी नहीं समझी तुमने.... मेरे सरकार... अभी तो महज शादी की बात हुई है... तब आपके भाव सातवें आसमान पर हैं और जब शादी हो जायेगी तो क्या अपनी उंगलियों पर नचाने का इरादा है.... मस्ती भरे अंदाज में सोनाली को छेड़ते हुए कबीर फोन पर बतियाने में मशगूल था.... लेकिन.... लेकिन क्या... लेकिन यही कि कहीं कुछ कमी थी... शोख-चंचल हसीना... का असल अंदाज... चकल्लस... कहीं लापता था... वो बेहद बेरुखी... संजीदा सी जान पड़ रही थी उसे.... लेकिन कबीर ने मन ही मन सोचा, हो सकता है वो कुछ ज्यादा खुश है इसलिए उसे सोना की आवाज बेजान मालूम पड़ रही है.... चलो ठीक है फोन पर क्या बात करनी.... दीया ने खाने पर बुलाया है.... तैयार हो जाना मैं तुम्हारे घर आकर ले लूंगा.... कबीर बोला.... नहीं, मुझे कहीं नहीं जाना... तुम कितनी देर में घर पहुंच रहे हो... मैं मिलने आ रही हूं तुमसे.... सोनाली की तरफ से जवाब आया... बस जितना वक्त दफ्तर से घर तक पहुंचने में लगे.... ठीक है... वहीं मिलते हैं.... और दौनों ने फोन रख दिया.... कबीर के दिमाग में ख्याल कौंधा ... बेहद खुश होगी... इसलिए तो आज खुद को रोक नहीं पायी मेरे फ्लैट पर आने से... छह साल में शायद ही कोई सुबह और कोई शाम गुजरी होगी... जिसके गुजरे हर पल में उसने लगभग मिन्नतें सी न की हों ..... सोना को अपने फ्लैट पर बुलाने के लिए... लेकिन उसने वहां आना तो दूर उस गली से गुजरना तक मुनासिफ न समझा....
    दफ्तर से घर तक का रास्ता बेहद लम्बा जान पड़ रहा था, कबीर को.... घर पहुंचते ही सोना की फैवरेट कॉफी और मैगी बनाने में जुट गया था... तभी घंटी बजी.... दरवाजा खोला तो सामने... उसकी जिंदगी खड़ी थी... बस बेसब्री से बांहों में भर लिया.... मानो जैसे मसल ही डालेगा उसे आज... ठीक है ठीक है... अब छोड़ो भी... दरवाजा खुला है ... कोई क्या सोचेगा... झिझकते हुए सोनाली बोली... जो सोचेगा सोचने दो अपनी होने वाली बीबी के साथ इश्क फरमा रहा हूं... कबीर ने बड़ी बेतकल्लुफी से जवाब दिया... लेकिन अगले पल जो उसे सुनाई पड़ा, उसे सुनकर हैरत में पड़ गया वो... अभी बनी नहीं हूं तुम्हारी बीबी... जब बन जाऊं तब ऐसी कोशिशें करना.... बोलते-बोलते वो सोफे पर पसर गयी.... हड़बड़ाया कबीर समझ नहीं पाया उसकी इस पहेली को... मेरी जान... बस फेरे लेने की कमी रह गयी है... कहो तो अभी पंडित को बुला लें... कर डालते हैं ये नेक काम भी....
    नहीं... मैं तुमसे शादी नहीं कर सकती.... मानो आसमान से लाखों बिजलियां नौंचकर सोनाली ने एक ही झटके में कबीर पर गिरा डाली हों.... क्या बकवास कर रही हो तुम... बदहवास सा कबीर कुछ समझ नहीं पा रहा था... मजाक की भी हद होती है यार... और ऐसा मजाक जो मेरे जज्बातों से जुड़ा है मैं कतई बर्दास्त नहीं कर सकता.... कबीर लगभग खिसियाने अंदाज में बोला... लेकिन सोना भी शायद चुप न रहने की कसम खाकर आयी हो.... नहीं दोस्त मजाक नहीं कर रही .... ये शादी नहीं हो सकती.... लेकिन क्यों ....कबीर ने जानने को उतावला था... पापा मान गये हैं... वो तुमसे मिलना चाहते हैं... वो हर खुशी जो कुछ घंटों पहले उसे मिली थी... बता देने को उतावला था...
    बिना वक्त गंवाये अपनी जात के मुताबिक सारे नफे-नुकसान का बही-खाता खोलकर बैठ गयी वो..... क्या तुम चाहते हो कि जिस घर में मैं शादी का जोड़ा पहनकर जाऊं, छह महीने बाद उस दहलीज से मेरी अर्थी गुजरे... या फिर तुम चाहते हो कि जिस सुर्ख मेंहदी से में अपनी हथेली पर तुम्हारा नाम सजाऊं... उस हथेली को तुम बदहवास थामे मुझे लपटों के बीच जलता छोड़ आओ... सोनाली कभी इतनी संजीदा नहीं हुई थी... लेकिन संजीदगी से ज्यादा उसकी मौत का डर कबीर की समझ से परे था... पगलाने से अंदाज में वह सिर्फ यही पूछ सका... आखिर बात क्या है... सोनाली ने माहौल में तैरती मनहूसियत को थोड़ा कम करने के लिए कॉफी की तरफ इशारा करते हुए कहा... वो जल जायेगी... उसे सर्व कर लो फिर बताती हूं... कॉफी की सिप के साथ उसके होठ भी हिलें... जुबान खुले बस इसी इंतजार में एक टक निहारे जा रहा था कबीर... इस नई और अन्जान अंदाज सोना को... मैने अपनी दी को बोला था... वो और जीजू बहुत खुश हुए... पापा से बात करने से पहले वो हमारी कुंडली मिलवाना चांहते थे... इसलिए परसों वो पंडित जी से मिलने गये... मैं और दी भी जबरदस्ती उनके साथ हो लिये... पंडित जी ने कुंडली देखकर साफ-साफ कह दिया कि ये शादी नहीं हो सकती क्योंकि ये शादी हुई तो मैं... यानि तुम्हारी जान... छह महीने बाद ही इस दुनियां से रुख्सत हो जायेगी.... अब तुम ही बताओ किसे अपनी जान की फिकर नहीं होती... तुम्हें न हो मगर मुझे है... मैं शादी कर भी लूं तो क्या तुम्हें जिंदगी भर रोता हुआ छोड़जाने के लिए.... एक सांस में दिल की सारी भड़ास निकाल दी उसने.... कबीर भी इस नई मुसीबत के लिए कतई तैयार नहीं था... उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वाकई में हो क्या रहा है... बीते एक सप्ताह से उसकी जिंदगी... अचम्भों... और नाकाबिले बर्दास्त खबरों के भंवर में फंस कर रह गयी है.... गहरी सांस लेते हुए बस वो यही बोल सका, ठीक है... मैं तुम पर दवाब नहीं डालूंगा... और डालूंगा भी तो कैसे... मैं तुम्हें हमेशा ऐसे ही हंसते हुए देखना चाहता हूं... आग की लपटों में घिरे नहीं.... कई घंटे गुजर चुके थे दौनों को साथ में... क्या घर और क्या कार... सब बेकार था... तन्हाई का... खामोशी का जैसे मनहूस साया उन्हें अन्जान बनाने पर तुला था... गमों का... एक दुसरे से जुदाई के ख्याल का... समंदर थपेडे मार रहा था... कब आई और कब उसे घर तक छोड़ा पता ही न चला ... वो आई भी थी...
    हैलो... गुरुजी प्रणाम..... मैं कबीर बोल रहा हूं मुम्बई से... जी... आपसे एक काम था... मेरे लिए एक रिश्ता आया है... कुंडली मिलवाना चाह रहा था आपसे... अगले दो दिन तक कबीर ने इन अल्फाजों को न जाने कितनी बार नहीं दोहराया होगा फोन पर... कोई ऐसी मुअज्जिज जगह नहीं बची थी जहां उसने दस्तक न दी हो... लेकिन वो हैरान था उनके जवाब सुनकर... बेटा ये शादी मत करना... नहीं तो अगले छह महीने में तुम्हारी जिंदगी खत्म समझो.... आगे तुम्हारी और ईश्वर की मर्जी.... वो समझ नहीं पा रहा था कि सोना ने इतना बड़ा झूठ क्यों बोला... हां झूठ ही तो था .... वो रिश्ता खत्म करने का इल्जाम भी अपने सिर पर ढ़ोना चाहती थी... इस लायक भी नहीं समझा उसने.... दो दिन जांच पड़ताल और दो दिन खुद को संभालने में लग गये उसे...
    उधर सोनाली भी कहां उसके बगैर रहना चांहती थी... उसकी तो दुनियां ही उजाड़ दी थी उस कुंडली ने... फिर भी वो दफ्तर में मौजूद थी... लेकिन उसका मन बस कबीर की कुर्सी पर ही अटका था... न जाने कहां है... फौन भी नहीं उठा रहा... हो सकता है उठाना ही न चाहता हो... कोई बात नहीं इस बहाने दूर तो हो सकेगा वो मुझसे.... बस अभी सोच ही रही थी ये सब... नजरें उठीं तो कबीर सामने ही खड़ा था... तमाम सवालों का जवाब थामे... कुंडली... इसी की बात कर रहीं थी तुम... लेकिन महान बनने की तुम्हारी जल्दी ने सब बेकार कर दिया... हां, मुझे पता चल चुका है कि तुम शादी सिर्फ इसलिए नहीं करना चांहती क्योंकि जान तुम्हारी नहीं मेरी जायेगी.... कबीर के सब्र का बांध टूट चुका था... लेकिन वो हंसी और बोली... बेवकूफ थे और बेवकूफ ही रहोगे... तुम जान किसकी हो मेरी ना... और तुम्हें कुछ हो गया तो तुम्हारा तो सिर्फ शरीर साथ छोड़ेगा लेकिन जान.... जान तो मेरी ही जायेगी ना... वो समझ नहीं सका कि आखिर क्या बोले....
    कई रोज यूं ही साथ रहते... चलते... खाते-पीते... बिना कुछ बोले... पगडंडियां नापते गुजर गये... फिर एक दिन सोनाली बोली.... पापा ने मेरी शादी तय कर दी है.... शायद अगले महीने की तारीख तय हुई है... शब्द गूंजे तो जरूर थे... लेकिन किसने सुने पता नहीं... क्योंकि खामोशी पल-पल और गहरी होती गयी... अगले दिन दफ्तर पहुंचते ही कबीर ने सोना को रिजाइन करने के लिए कह दिया... सोना ने कर भी दिया... बिना कुछ पूछे... बिना वजह जाने.... बस इंतजार कर रही थी अगले आदेश का.... वो आ भी गया... सामान पैक कर लेना... परसों घर छोड़ आऊंगा... लेकिन... सोना ने हिम्मत जुटाकर कुछ कहना चाहा... कबीर ने उसे कुछ कहने से पहले ही रोक दिया... लेकिन-वेकिन कुछ नही... मुझे पता है तुम ज्यादा से ज्यादा वक्त मेरे साथ गुजारना चाहती हो... लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम घर रुको... रिवायतों को समझो.... कुछ न बोल सकी वो... ठीक है कितने बजे निकलना होगा... सुबह जल्दी चलेंगे... इसी के साथ दोनों जुदा हो जुदा होने के लिए एक सुबह फिर मिले... खुदा की तय की गयी जुदा-जुदा राहों पर आगे बढ़ने के लिए... जिसकी शायद कोई मंजिल होगी.... या फिर थी ही नहीं ... सोना जा चुकी थी... वो खुद उसे घर छोड़कर आया था... उसकी शादी में भी वो शामिल हुआ... दुनिया जहां जश्न में डूबी थी.. वो सिर्फ कुछ तलाशती अपनी जान की नजरों में ही डूबा रहा... उन नजरों में जो उससे हटने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं.... वो कतरा-कतरा डूब जाना चाहता था... नई जिंदगी देने वाली उन आखों में... एक मोती... हां एक ही था... दोनों ओर डबडबाया... गम के समंदर को थामे... दो जिस्म और एक जां.... चल पडे अपनी-अपनी राहों पर जिनकी मंजिल कुछ वक्त पहले ही जुदा हुई थी.... आंख मली और कबीर चल पड़ा उस राह पर जो उसे उसकी गैर जात.... जान बख्शने वाली ने... उसके लिए मुकर्रर की थी.... तेज बारिस में पैदल ही चल पड़ा ताकि कोई उसे रोता हुआ न देख ले... कहीं दूर से आवाज आ रही थी... अबके सावन में.... आग लगेगी मन में.... घटा बरसेगी... नजर तरसेगी... मिल न सकेंगे... एक ही आंगन में...........................................................................................................


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