• रुहेलखंड में चीनी मांझे पर प्रतिबंध



    कमिश्नर के रविंद्र नाइक ने रुहेलखंड में लोगों की जान से खिलवाड़ करने वाले खूनी चीन के मांझे पर प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने मंडल के सभी डीएम को इस संबंध में कार्रवाई के निर्देश भी दिए। बरेली सहित आसपास के जिलों में चीनी मांझे का कारोबार खूब होता है। घरेलू मांझा उद्योग का खून चूसने वाला यह मांझा लोगों की जान का भी दुश्मन है। बरेली में ही इससे कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा तो कई लोग घायल हुए। समय समय पर इसके खिलाफ अभियान चलाए गए। इस पर प्रतिबंध की भी बात हुई, लेकिन सब कागजी साबित हो कर रह गए। सामाजिक सरोकारों से ताल्लुक रखते हुए इसे मुद्दा बनाया और सोमवार से खूनी मांझे के खिलाफ अभियान चलाया। मांझे से घायल लोगों के परिवारों के साथ ही कई संस्थाओं ने भी इसकी सराहना कर अभियान को ताकत दी। कमिश्नर के रविंद्र नाइक ने भी संबंधित खबरों का संज्ञान लिया और इसे लोगों की जान का दुश्मन करार दिया। चीनी मांझे से हो रहे हादसों पर वे गंभीर हुए और इसे रुहेलख्रंड में प्रतिबंधित करने का फैसला किया। उन्होंने मंडल के सभी डीएम को पत्र लिख कर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।


    ‘कातिल’ को नहीं मिल सकी ‘मुकम्मल’ सजा

    कई सूबों की सरकार और अदालतें ‘कातिल’ मांझे को ‘कालेपानी’ की सजा सुना चुकी हैं, लेकिन हुक्मरानों ने कभी भी इस सजा को अंजाम तक नहीं पहुंचाया। नतीजन, किसी मासूम को मौत के घाट उतारने के बाद कुछ दिनों तक तो खूनी मांझा बाजार से गायब हो जाता है, लेकिन माहौल शांत होते ही फिर नए शिकार की तलाश में हवा में तैरने लगता है। इस बार अभियान के बाद कमिश्नर ने मंडल के चारों जिलों में चाइनीज मांझे पर पाबंदी का भरोसा दिया है। उम्मीद जगी है कि अब और जिंदगियां कातिल मांझे की भेंट नहीं चढ़ेंगी।

    सबसे पहले गुजरात सरकार ने लगाई रोक 

    पड़ोसी मुल्क चीन से कातिल मांझे की शक्ल में आई मौत पर सबसे पहले गुजरात सरकार ने लगाम कसी। मकर संक्रांति से पहले ही गुजरात का आसमान पतंगों से पट जाता है, लेकिन साल 2008 में अचानक पक्षियों की मौत में इजाफा होने लगा। नवंबर के आखिरी सप्ताह में तो गुजरात के प्रमुख शहरों से लोगों की गर्दनें कटने की खबरें बड़ी तेजी से आने लगीं। सरकार ने आनन-फानन में मामले की जांच के आदेश दिए और जब जांच पूरी हुई तो पता चला कि चीन के खूनी मांझे ने ही हजारों पक्षियों को मौत के घाट उतारा है। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 दिसंबर 2009 को गुजरात में चीनी मांझे के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया।

    सरकार को नहीं सुनाई देती चीखें

    गुजरात, राजस्थान और दिल्ली ही नहीं महाराष्ट्र की सरकार भी चीनी मांझे पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा चुकी है। हालांकि उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों में चाइनीज मांझे के कारण लोगों की मौत के सैकड़ों मामले बीते चार-पांच साल में दर्ज किए जा चुके हैं। बावजूद इसके सूबे की सरकार को मासूमों की चीखें सुनाई नहीं देतीं। सरकार ने कातिल मांझे के खिलाफ अभी तक कोई कदम नहीं उठाया। दीगर बात यह है कि बीते सालों में बनारस, मेरठ, आगरा, बिजनौर, सहारनपुर और बरेली का पुलिस-प्रशासन कोई हादसा होते ही चीनी मांझे पर प्रतिबंध लगाने की बात तो करता है, लेकिन मामला ठंडा पड़ते ही बस भूलते रहे। इस बार मंडल में प्रतिबंध लगा है तो उम्मीद बढ़ी है।राज्य सरकारों या जिला प्रशासन के प्रतिबंध के बावजूद चीनी मांझे की खरीद-फरोख्त पर पूरी तरह लगाम कस पाना संभव नहीं है। ‘कातिल’ मांझे को तब तक मुकम्मल सजा नहीं मिलेगी जब केंद्र की सरकार चीन से इसके आयात पर प्रतिबंध नहीं लगाती।

    इंसाफ बाकी है..........

    जुमे के दिन अम्मी का दिया खास सफेद मलमल का कुर्ता पहन वो दोस्तों के साथ नमाज अदा करने घर से निकला ही था कि खूनी मांङो ने उस पर कातिलाना हमला कर दिया। अखलाक आखिरी पल तक हौसला नहीं हारा और कटी गर्दन के साथ अस्पताल तक जा पहुंचा। उसे देखते ही दरवाजे पर खड़ी नर्स तक बेहोश होकर गिर पड़ी। डॉक्टरों ने 18 घंटे तक मौत से जद्दोजहद की, लेकिन आखिर में जिंदगी ने घुटने टेक दिए। 1नौ अगस्त 2013 का दिन। होनहार इंजीनियर अखलाक हुसैन, दोस्तों संग जुमे की नमाज अदा करने मस्जिद की ओर निकला। किला फाटक पर पहुंचा ही था कि खूनी मांझे ने उस पर कातिलाना हमला कर दिया। अखलाक संभल भी नहीं पाया था कि उसका कुर्ता खून से सुर्ख हो गया। अचानक गर्दन से निकली खून की धार देख दोस्त हक्के-बक्के रह गए। तभी साथ में चल रहे फिरोज ने की नजर मांङो पर पड़ी, वो चीख पड़ा। चीनी मांङो ने गला रेत दिया। सामने खड़ी मौत भी अखलाक का हौसला तोड़ नहीं पाई। जेब से रूमाल निकाला और कटी गर्दन पर लगा पास ही के अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा। पीछे-पीछे दोस्त भी उसे हिम्मत बंधाने लगे। अस्पताल में घुसते ही गेट पर खड़ी नर्स से उसने मदद की गुहार लगाई, लेकिन खूनी मंजर देख नर्स खुद होश खो बैठी। अस्पताल में हडकंप मच गया, डॉक्टर भागे-भागे आए और अखलाक को सीधे ऑपरेशन थियेटर में ले गए। 38 टांगे लगे थे उसकी गर्दन पर। खून ज्यादा बह चुका था, इसलिए डॉक्टर ने तुरंत दो यूनिट खून का इंतजाम करने को कहा। एक यूनिट चढ़ चुकी थी और दूसरे चढ़ रही थी, अखलाक भी मौत से जमकर मुकाबला कर रहा था, लेकिन किसी को खबर तक नहीं लगी कि उसकी सांसें कब थम गईं। इसी मनहूस दिन नौ अगस्त को तीन और लोगों का गला खूनी मांङो ने रेत डाला था। सुभाष नगर निवासी पियूष सक्सेना पर चौपुला चौराहे के पास खूनी मांङो ने जानलेवा हमला किया। स्वाले नगर निवासी तस्लीम मियां भी किला पुल पर चाइनीज मांङो से घायल हो गए थे। उनके पीछे-पीछे आ रहे जरी कारीगर अफरोज का भी किला पुल पर खूनी मांङो ने कान काट डाला। अखलाक की मौत को पूरा एक साल होने वाला है, लेकिन उसकी अम्मी अभी तक इस सदमे से नहीं उबर सकीं हैं। अब्बू अरबाज खान कहते हैं कि जिस दिन चीनी मांङो पर रोक लगेगी उस दिन उनके कलेजे को सकून हासिल होगा।


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