• डेढ़ सौ साल पुरानी वॉशिंग मशीन देखो...


    डेढ़ सौ साल पुरानी वॉशिंग मशीन
    शेर  की दहाड़ देखो... चाहे दरा का पहाड़ देखो... कोटा आए हो तो एक बार तकनीकि का विस्तार भी देखो। जमाना भले ही हमें कितना भी पिछड़ा साबित करने पर तुला रहे, लेकिन हमारे संग्रहालयों में मौजूद विरासतें इस झूठ की पोल खोलने को काफी हैं। जहां भी दरबारों का जिक्र आता है, राजाओं के पीछे पंखा झलने वाले दो लोग खड़े कर दिए जाते हैं, लेकिन कोटा दरबार में 150 साल पहले से ऊर्जा से चलने वाला पंखा लगा था। और तो और कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन भी थी।  आज भले ही रेफ्रिजरेटर बेचने वाली नामी कंपनियां एक मिनट में बर्फ जमाने का दावा करती हों, लेकिन कोटा दरबार में डेढ़ सौ साल पहले महज आधे मिनट में कुल्फी जमाई जाती थी। वह भी फ्रिज से। 

              
      जनाब कभी गढ़ पैलेस स्थित राव माधोसिंह संग्रहालय में जाकर तो देखिए...। यहां रखी हॉफ मिनट फ्रिजिंग मशीन देख आपको यकीन हो जाएगा।  मूर्तिकला और वास्तुशिल्प के साथ-साथ कोटा डेढ़ सौ साल से तकनीकि रूप भी समृद्ध रहा है। इससे भी पहले गर्मी से निजात दिलाने के लिए यहां पंखे का इस्तेमाल किया जाता था। केरोसिन से चलने वाले इन पंखों की निर्माण कला खासी अदभुत थी। ऎसी ही तमाम चीजें संग्रहालय में मौजूद हैं जो हमारी तकनीकि समृद्धता का अहसास कराने के लिए काफी हैं। हालांकि इन चीजों को कभी इतना प्रचार नहीं मिल सका कि लोग देखने के लिए दौड़ते चले आएं। हालात यह है कि कोटा के संग्रहलायों में किसी रोज दस लोग भी जुट जाएं तो काफी है।  

       यह भी है खास  
    पृथ्वीराज चौहान की तलवार : संग्रहालय में हथियारों के जखीरे के बीच एक तलवार ऎसी है जो खुद-ब-खुद अपने मालिक की गवाही देती है। सालों बाद भी चमचमाती इस शमशीर पर लिखा है... पृथ्वीराज चौहान की तलवार। 


    पैरों से फूटता था संगीत
     यहां अनूठा हारमोनियम भी है। इसमें भले ही सप्तक पर अंगुलियां इस्तेमाल होती हों, लेकिन धमण पैरों से दी जाती थी। यानि पैर से चलने वाला हारमोनियम।  संग्रहालय में मौजूद गुप्तकालीन दुर्लभ प्रतिमा हैं, जिसमें
    केश विन्यास वाला बालक दोनों हाथों से वाद्ययंत्र बजा रहा है। बाहरी भाग पर पत्रलता है जो मकरमुख से निकल रही है। यह गांधार श्ौली की गुप्तकालीन स्थापत्यकला श्ौली में दुर्लभ प्रतिमा है।  हाथ से उकेरा सद्भाव : यहां हस्तलिखित गीता पंचरत और कुरान मजीद भी है। 18वीं शताब्दी में तैयार की गई इस गीता में प्राकृतिक रंगो से चित्र उकेरे हैं और स्याही से लिखे श्लोकों के चारों ओर सुनहरी बाउंड्री है। कुरान भी इसी तरह से हस्तलिखित है और इसे भी 18-19वीं शताब्दी का माना जाता है।  
    भगवान विष्णु की दुर्लभ प्रतिमा यहां रखी है दुनियां की सबसे दुर्लभ और अनूठी प्रतिमा... जिसमें चर्तुहस्त भगवान विष्णु, नाग के सप्तफण की छाया में विश्राम की मुद्रा में (पदभनाथ मुद्रा) में विराजमान हैं। उनकी नाभि से निकल रहे कमल पर सृष्टि के रचियता ब्रह्मा विराजमान हैं और साथ में हैं देवी लक्ष्मी। इस प्रतिमा की खासियत यह है कि इस पर मधु-कैटभ का युद्ध में रत चित्रांकन भी है। आठवीं शताब्दी के बाडोली समूह की है यह प्रतिमा.... vineet singh.


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