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खोखली नींव पर टिका “आधार” आखिरकार ढ़ह ही गया। भारतीय आवाम की जिन चिंताओं को जल्दबाज और दंभी यूपीए सरकार ने दरकिनार कर दिया था, उन्हीं सरोकारों को आधार बनाकर संसद की स्थाई समिति ने नागरिकों की विशिष्ट पहचान वाली कथित महत्वाकांक्षी परियोजना को न सिर्फ गैर जरूरी बल्कि बेहद खर्चीली, गैर योजनाबद्ध और असुरक्षित बता सिरे से खारिज कर दिया।
आजादी के बाद से ही आम आदमी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयास सरकारें करती आ रही हैं। राशन कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसी योजनाओं इसी मुहिम का एक हिस्सा थीं लेकिन एक व्यक्ति की दर्जनों पहचान और इनमें होने वाली खामियों के चलते हर बार एक और नई स्पष्ट एवं स्थाई योजना की आवश्यक्ता महसूस की जाती रही।
वर्ष 2001 में अमेरिका ने प्रवासी नागरिकों पर नकेल कसने के इरादे से इनकी विशिष्ट पहचान का डाटा एकत्र करना शुरू किया। इस योजना में फिंगर प्रिंट, रेटीना स्केन सहित अन्य सभी पहचान पत्रों का विवरण एक ही स्थान पर एकत्र कर प्रवासियों को उनकी नई पहचान का दस्तावेज सौंपा गया जो हर समय उन्हें अपने साथ रखना था और जरूरत पड़ने पर अपनी पहचान साबित करनी थी। सिर्फ बीस फीसदी आबादी को इस तरह की विशिष्ट पहचान देने के पीछे अमेरिकी सरकार की मंशा वहां होने वाले अपराधों और पहचान सम्बधीं जटिताओं पर नियंत्रण करना था।
इस योजना से प्रभावित होकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसी ही योजना को भारत में लागू कराने का प्रयास किया। वाजपेयी की पहल पर उनकी कैबिनेट ने इस योजना को मंजूरी भी दे दी थी लेकिन उससे पहले इससे सम्बंधित सभी संदेहों और समस्याओं के निस्तारण कर यूआईडी का भारतीय वर्जन तैयार करने पर कैबिनेट ने जोर दिया जिसे स्वीकार भी कर लिया गया लेकिन अगले चुनावों में भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की हार के साथ ही यह योजना ठंडे बस्ते में डाल दी गयी।
यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में जब मनमोहन सिंह फिर से प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण बनाकर इस योजना के क्रियान्वयन की पुनः शुरुआत कर दी लेकिन वाजपेयी कैबिनेट की सुरक्षा और संरक्षा सम्बंधी शंकाओं का निवारण करना तो दूर उन पर अपनी कैबिनेट में चर्चा तक नहीं की गयी और ना ही इस योजना को शुरू करने के लिए संसद की इजाजत ही ली गयी। इतना ही नहीं प्राधिकरण की कमान औद्योगिक घरानों के हाथ में थमाकर उन्होंने इस योजना के दुरुपयोग की शंकाओं को और मजबूत कर दिया। जानकारों ने तो यहां तक कह दिया कि इस योजना को जल्दबाजी में इसलिए शुरु किया क्योंकि इसमें देश की बड़ी पूंजी निवेश कर औद्योगिक-प्रौद्योगिक हित साधने की असीम संभावनाएं अंतनिर्हित हैं। इस प्राधिकरण का अध्यक्ष एक औद्योगिक घराने के सीईओ नंदन नीलकेणी को बनाकर, तत्काल उन्हं 6600 करोड़ रूपए की धन राशि सुपुर्द कर दी गई। बाद में इस राशि को बढ़ाकर 17900 करोड़ रूपए कर दिया गया। जब यह योजना अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचेगी तब अर्थशास्त्रियों के एक अनुमान के मुताबिक इस पर कुल खर्च डेढ़ लाख करोड़ रुपए होंगे।
इसके बावजूद तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए मई 2010 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के नंदूरबार जिले के थेंभली गांव से यूनीक आइडेंटिफिकेशन नंबर वाली योजना को 'आधार' नाम से लॉन्च किया। लॉन्चिंग के मौके पर प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के 10 गांवों को यूआईडी नंबर दिए। इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि आधार प्रोजेक्ट अपने तय समय से 4 महीने पहले ही शुरू हो गया था।
'आधार' की लॉन्चिंग के मौके पर प्रधानमंत्री से लेकर सोनिया गांधी, नीलकेणी और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया तक ने यूआईडी को एक अनोखा आईडी प्रूफ बताते हुआ कहा था कि इससे सबसे ज्यादा फायदा गरीब तबके का होगा, जो कोई आइंडेटिटी प्रूफ न होने की वजह से बैंकिंग के साथ-साथ सरकार की तमाम स्कीमों का फायदा नहीं उठा पा रहा है। आधार के बाद लोगों को अलग-अलग पहचान पत्र रखने की जरूरत नहीं होगी।
आधार की लॉचिंग के साथ ही विवादों का पिटारा खुलना शुरु हो गया। सबसे पहली आपत्ति रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (आरजीआई) ने प्राधिकरण के काम काज के तरीके पर दर्ज कराई। आरजीआई ने यूआईडी के कामकाज पर नाराजगी जताते हुए कहा कि वह बैंक या बीमा कंपनियों से सीधे तौर पर डाटा इकट्ठा कर सभी को यूआईडी नंबर मुहैया न कराए। बल्कि इसके लिए प्राधिकरण को आरजीआई के डाटा का उपयोग करना चाहिए। जिससे न सिर्फ करोड़ों रुपये की बर्बादी रुकेगी बल्कि फर्जीवाडे पर भी रोक लगेगी। आरजीआई की आपत्ति में दम भी था क्योंकि जिस कार्य के लिए देश की दो बड़ी एजेंसियां पहले से ही अरबों रुपये फूंक चुकी हों उसके लिए फिर नये सिरे से कवायद करना गैर जरूरी ही है। वहीं फर्जी बाडे की संभावना को भी नहीं नकारा जा सकता।
आरजीआई की आपत्ति से गर्माया माहौल अभी तक शांत भी नहीं हुआ था कि गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने सुरक्षा सम्बंधी चिंताएं जताकर आधार की चूलें ही हिला दीं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को भेजे पत्र में चिदंबरम ने साफ-साफ कह दिया कि यूआईडीएआई द्वारा एकत्र डाटा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से राष्ट्रीय आबादी रजिस्टर के तहत आवश्यक आश्वासनों पर खरा नहीं उतरता। इसी के साथ बिना किसी जांच के दर्ज किये जा रहे आंकड़ों से न सिर्फ नागरिकों की पहचान को खतरा उत्पन्न होगा बल्कि घुसपैठियों को रोकना भी असम्भव हो जायेगा।
सुरक्षा सम्बंधी जो चिंताएं चिदम्बरम ने जाहिर की थीं वह पहले से ही विद्यमान थीं।
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने पूरे काम के लिए तीन कंपनियों को चुना-एसेंचर, महिंद्रा-सत्यम-मोर्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन। इन तीनों कंपनियों पर ही इस कार्ड से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारियां हैं और जब इन तीनों कंपनियों पर ग़ौर करते हैं तो डर सा लगता है। एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं, इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनका अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रिश्ता रहा है। एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन अमेरिका की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनियों में से है, जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन और इलेक्ट्रानिक पासपोर्ट आदि जैसी चीजों को बेचती है। अमेरिका के होमलैंड सिक्यूरिटी डिपार्टमेंट और यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के सारे काम इसी कंपनी के पास हैं, यह पासपोर्ट से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक बनाकर देती है।
अब सवाल यह है कि सरकार इस तरह की कंपनियों को भारत के लोगों की सारी जानकारियां देकर क्या करना चाहती है? एक तो ये कंपनियां पैसा कमाएंगी, साथ ही पूरे तंत्र पर इनका क़ब्ज़ा भी होगा। इस कार्ड के बनने के बाद समस्त भारतवासियों की जानकारियों का क्या-क्या दुरुपयोग हो सकता है, यह सोचकर ही किसी का भी दिमाग़ हिल जाता है। समझने वाली बात यह है कि ये कंपनियां न स़िर्फ कार्ड बनाएंगी, बल्कि इस कार्ड को पढ़ने वाली मशीन भी बनाएंगी। सारा डाटाबेस इन कंपनियों के पास होगा, जिसका यह मनचाहा इस्तेमाल कर सकेंगी जो एक खतरनाक स्थिति होगी।
विकीलीक्स के हवाले से अमेरिका के एक केबल के बारे में ज़िक्र करते हुए यह लिखा कि लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे संगठन के आतंकवादी इस योजना का दुरुपयोग कर सकते हैं.
वैसे सच्चाई क्या है, इसके बारे में आधार के चीफ नंदन नीलेकणी ने खुद ही बता दिया। जब वह नेल्सन कंपनी के कंज्यूमर 360 के कार्यक्रम में भाषण दे रहे थे तो उन्होंने बताया कि भारत के एक तिहाई कंज्यूमर बैंकिंग और सामाजिक सेवा की पहुंच से बाहर हैं। ये लोग ग़रीब हैं, इसलिए खुद बाज़ार तक नहीं पहुंच सकते। पहचान नंबर मिलते ही मोबाइल फोन के ज़रिए इन तक पहुंचा जा सकता है। इसी कार्यक्रम के दौरान नेल्सन कंपनी के अध्यक्ष ने कहा कि यूआईडी सिस्टम से कंपनियों को फायदा पहुंचेगा।
बड़ी अजीब बात है प्रधानमंत्री और सरकार की ओर से यह दलील दी जा रही है कि यूआईडी से पीडीएस सिस्टम दुरुस्त होगा, ग़रीबों को फायदा पहुंचेगा, लेकिन नंदन नीलेकणी ने तो असलियत बता दी कि देश का इतना पैसा उद्योगपतियों और बड़ी-बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च किया जा रहा है, बाज़ार को वैसे ही मुक्त कर दिया गया है। विदेशी कंपनियां भारत आ रही हैं, वह भी खुदरा बाज़ार में, तो क्या यह कोई साज़िश है, जिसमें सरकार के पैसे से विदेशी कंपनियों को ग़रीब उपभोक्ताओं तक पहुंचने का रास्ता दिखाया जा रहा है। बैंक, इंश्योरेंस कंपनियां और निजी कंपनियां यूआईडीएआई के डाटाबेस के ज़रिए वहां पहुंच जाएंगी, जहां पहुंचने के लिए उन्हें अरबों रुपये खर्च करने पड़ते।
खबर यह भी थी कि कुछ ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडर इस योजना के साथ जुड़ना चाहते थे अगर ऐसा होता तो देश का हर नागरिक निजी कंपनियों के मार्केटिंग कैंपेन का हिस्सा बन जाता जो देश की जनता के साथ किसी धोखे से कम नहीं होता। अगर देशी और विदेशी कंपनियां यहां के बाज़ार तक पहुंचना चाहती हैं तो उन्हें इसका खर्च खुद वहन करना चाहिए। देश की जनता के पैसों से निजी कंपनियों के लिए रास्ता बनाने का औचित्य क्या है, सरकार क्यों पूरे देश को एक दुकान में तब्दील करने पर आमादा है?
यही वह तमाम आपत्तियां रहीं जिसके चलते वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने विशिष्ट पहचान पत्र (यूआईडी) संबंधी बिल को खारिज कर दिया। पूर्व वित्त मंत्री और विपक्ष के नेता यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता में गठित समिति ने नेशनल आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनआईए बिल), 2010 को इन्हीं तमाम बिंदुओं पर खरा नहीं उतरने की वजह से खारिज कर दिया। एक ही तरह के कामकाज दो संस्थाओं के जरिए होने, सुरक्षा कारणों से ऐतराज और एनआईए बिल पर गंभीर मतभेदों की वजह से ऐसा किया गया। समिति के सदस्य प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को दिशाहीन बताने से भी नहीं चूके। समिति ने बिल के मौजूदा स्वरूप और इस परियोजना को स्वीकार करने योग्य नहीं माना है और सरकार को इसकी समीक्षा के बाद नया बिल तैयार करने की बात कही है।
इतनी आपत्तियों और विरोध के बावजूद यदि सरकार समिति की सिफारिशों को नहीं मानती है तो इससे न सिर्फ राजनीतिक माहौल फिर से गर्मायेगा बल्कि देश की सुरक्षा और आम नागरिक के मूल अधिकारों का हनन भी माना जायेगा। वहीं दूसरा पहलू यह भी है कि यदि समिति की सिफारिशों को मानकर आधार को बंद कर दिया जाता है तो अब तक खर्च हुए 556 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई कौन करेगा। सरकार, कांग्रेस या फिर वह निजी कम्पनियां जो इस योजना से मौटा मुनाफा कमाने के साथ भविष्य में होने वाले मुनाफे की व्यूह रचना कर रहीं थीं।
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने इसके लिए तीन कंपनियों को चुना-एसेंचर, महिंद्रा सत्यम-मोर्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन. इन तीनों कंपनियों पर ही इस कार्ड से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारियां हैं. इन तीनों कंपनियों पर ग़ौर करते हैं तो डर सा लगता है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं. इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनका अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रिश्ता रहा है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन अमेरिका की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनियों में से है, जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन और इलेक्ट्रानिक पासपोर्ट आदि जैसी चीजों को बेचती है. अमेरिका के होमलैंड सिक्यूरिटी डिपार्टमेंट और यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के सारे काम इसी कंपनी के पास हैं. यह पासपोर्ट से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक बनाकर देती है.
ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी जैसे संगठनों से रहा है. अब सवाल यह है कि सरकार इस तरह की कंपनियों को भारत के लोगों की सारी जानकारियां देकर क्या करना चाहती है? एक तो ये कंपनियां पैसा कमाएंगी, साथ ही पूरे तंत्र पर इनका क़ब्ज़ा भी होगा. इस कार्ड के बनने के बाद समस्त भारतवासियों की जानकारियों का क्या-क्या दुरुपयोग हो सकता है, यह सोचकर ही किसी का भी दिमाग़ हिल जाएगा. समझने वाली बात यह है कि ये कंपनियां न स़िर्फ कार्ड बनाएंगी, बल्कि इस कार्ड को पढ़ने वाली मशीन भी बनाएंगी. सारा डाटाबेस इन कंपनियों के पास होगा, जिसका यह मनचाहा इस्तेमाल कर सकेंगी. यह एक खतरनाक स्थिति है.
विकीलीक्स के हवाले से अमेरिका के एक केबल के बारे में ज़िक्र करते हुए यह लिखा कि लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे संगठन के आतंकवादी इस योजना का दुरुपयोग कर सकते हैं.
वैसे सच्चाई क्या है, इसके बारे में आधार के चीफ नंदन नीलेकणी ने खुद ही बता दिया. जब वह नेल्सन कंपनी के कंज्यूमर 360 के कार्यक्रम में भाषण दे रहे थे तो उन्होंने बताया कि भारत के एक तिहाई कंज्यूमर बैंकिंग और सामाजिक सेवा की पहुंच से बाहर हैं. ये लोग ग़रीब हैं, इसलिए खुद बाज़ार तक नहीं पहुंच सकते. पहचान नंबर मिलते ही मोबाइल फोन के ज़रिए इन तक पहुंचा जा सकता है. इसी कार्यक्रम के दौरान नेल्सन कंपनी के अध्यक्ष ने कहा कि यूआईडी सिस्टम से कंपनियों को फायदा पहुंचेगा. बड़ी अजीब बात है, प्रधानमंत्री और सरकार की ओर से यह दलील दी जा रही है कि यूआईडी से पीडीएस सिस्टम दुरुस्त होगा, ग़रीबों को फायदा पहुंचेगा, लेकिन नंदन नीलेकणी ने तो असलियत बता दी कि देश का इतना पैसा उद्योगपतियों और बड़ी-बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च किया जा रहा है. बाज़ार को वैसे ही मुक्त कर दिया गया है. विदेशी कंपनियां भारत आ रही हैं, वह भी खुदरा बाज़ार में. तो क्या यह कोई साज़िश है, जिसमें सरकार के पैसे से विदेशी कंपनियों को ग़रीब उपभोक्ताओं तक पहुंचने का रास्ता दिखाया जा रहा है. बैंक, इंश्योरेंस कंपनियां और निजी कंपनियां यूआईडीएआई के डाटाबेस के ज़रिए वहां पहुंच जाएंगी, जहां पहुंचने के लिए उन्हें अरबों रुपये खर्च करने पड़ते. खबर यह भी है कि कुछ ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडर इस योजना के साथ जुड़ना चाहते हैं. अगर ऐसा होता है तो देश का हर नागरिक निजी कंपनियों के मार्केटिंग कैंपेन का हिस्सा बन जाएगा. यह देश की जनता के साथ किसी धोखे से कम नहीं है. अगर देशी और विदेशी कंपनियां यहां के बाज़ार तक पहुंचना चाहती हैं तो उन्हें इसका खर्च खुद वहन करना चाहिए. देश की जनता के पैसों से निजी कंपनियों के लिए रास्ता बनाने का औचित्य क्या है, सरकार क्यों पूरे देश को एक दुकान में तब्दील करने पर आमादा है?
ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी जैसे संगठनों से रहा है. अब सवाल यह है कि सरकार इस तरह की कंपनियों को भारत के लोगों की सारी जानकारियां देकर क्या करना चाहती है? एक तो ये कंपनियां पैसा कमाएंगी, साथ ही पूरे तंत्र पर इनका क़ब्ज़ा भी होगा. इस कार्ड के बनने के बाद समस्त भारतवासियों की जानकारियों का क्या-क्या दुरुपयोग हो सकता है, यह सोचकर ही किसी का भी दिमाग़ हिल जाएगा. समझने वाली बात यह है कि ये कंपनियां न स़िर्फ कार्ड बनाएंगी, बल्कि इस कार्ड को पढ़ने वाली मशीन भी बनाएंगी. सारा डाटाबेस इन कंपनियों के पास होगा, जिसका यह मनचाहा इस्तेमाल कर सकेंगी. यह एक खतरनाक स्थिति है.
विकीलीक्स के हवाले से अमेरिका के एक केबल के बारे में ज़िक्र करते हुए यह लिखा कि लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे संगठन के आतंकवादी इस योजना का दुरुपयोग कर सकते हैं.
वैसे सच्चाई क्या है, इसके बारे में आधार के चीफ नंदन नीलेकणी ने खुद ही बता दिया. जब वह नेल्सन कंपनी के कंज्यूमर 360 के कार्यक्रम में भाषण दे रहे थे तो उन्होंने बताया कि भारत के एक तिहाई कंज्यूमर बैंकिंग और सामाजिक सेवा की पहुंच से बाहर हैं. ये लोग ग़रीब हैं, इसलिए खुद बाज़ार तक नहीं पहुंच सकते. पहचान नंबर मिलते ही मोबाइल फोन के ज़रिए इन तक पहुंचा जा सकता है. इसी कार्यक्रम के दौरान नेल्सन कंपनी के अध्यक्ष ने कहा कि यूआईडी सिस्टम से कंपनियों को फायदा पहुंचेगा. बड़ी अजीब बात है, प्रधानमंत्री और सरकार की ओर से यह दलील दी जा रही है कि यूआईडी से पीडीएस सिस्टम दुरुस्त होगा, ग़रीबों को फायदा पहुंचेगा, लेकिन नंदन नीलेकणी ने तो असलियत बता दी कि देश का इतना पैसा उद्योगपतियों और बड़ी-बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च किया जा रहा है. बाज़ार को वैसे ही मुक्त कर दिया गया है. विदेशी कंपनियां भारत आ रही हैं, वह भी खुदरा बाज़ार में. तो क्या यह कोई साज़िश है, जिसमें सरकार के पैसे से विदेशी कंपनियों को ग़रीब उपभोक्ताओं तक पहुंचने का रास्ता दिखाया जा रहा है. बैंक, इंश्योरेंस कंपनियां और निजी कंपनियां यूआईडीएआई के डाटाबेस के ज़रिए वहां पहुंच जाएंगी, जहां पहुंचने के लिए उन्हें अरबों रुपये खर्च करने पड़ते. खबर यह भी है कि कुछ ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडर इस योजना के साथ जुड़ना चाहते हैं. अगर ऐसा होता है तो देश का हर नागरिक निजी कंपनियों के मार्केटिंग कैंपेन का हिस्सा बन जाएगा. यह देश की जनता के साथ किसी धोखे से कम नहीं है. अगर देशी और विदेशी कंपनियां यहां के बाज़ार तक पहुंचना चाहती हैं तो उन्हें इसका खर्च खुद वहन करना चाहिए. देश की जनता के पैसों से निजी कंपनियों के लिए रास्ता बनाने का औचित्य क्या है, सरकार क्यों पूरे देश को एक दुकान में तब्दील करने पर आमादा है?

