Vineet Singh

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Vineet Singh

Vineet is Sr. Print and Broadcast Journalist, Author, Columnist, Strategist, Believer, Dreamer and Performer. who covers topics pertaining to Indian politics, Crime Higher Education, tourism, Archeology and Society. He is Presently Working with Leading Hindi News Paper.

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Started Career in Journalism As Trainee Reporter in Print Media and achieved Key Positions in Various Medium of Media Just Like Print, Electronic and Digital. As Journalist Exposed so many Scams like Pension Scheme, Scholarship Scheme and Drugs Mafia Network. During My Career Interviewed With Pm Narendra modi, Former PM Chandarshakhar, IK Gujral, VP Singh, Atal bihari vajpayee and so many National and International Political Leaders.I have also interviewed Dacoit Nirbhay Gujjar and Phoolan Devi.

work Experineces 18 Years As Journalist
Print Media 12 Year As Special correspondent With Rajasthan patrika, Outlook hindi, Danik Jagran, sahara samay
TV journalism 06 Year As Producer with CNEB, ANI, Janmat Tv (live india)
Digital media work with rajasthan patrika last 2 year

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Coverage for Rajasthan Patrika,Dainik Jagran,India Today,Live India, CNEB News, Outlook Hindi, ANI etc.

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PhD in Mass Communication and Master Degree in Journalism and Mass Communication And Ex Faculty, Department of Mass Communication and Journalism, Bareilly College bareilly india

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  • निरंकुश सत्ता पर जनता का अंकुश


    “जनता के लिए,जनता द्वारा, जनता का शासन।” कुछ यही परिकल्पना है लोकतंत्र के मायने की।

     भारतीय गणतंत्र की स्थापना के साठ दशक से भी अधिक के काल खंड में यह परिकल्पना बेमाइनी साबित होती रही है। जनता द्वारा एक बार चुने जाने के बाद सत्ता तक पहुंचते-पहुंचते हमारे जनप्रतिनिधि सेवा भाव भूलकर आमतौर पर शासकों जैसा व्यवहार करते नजर आते हैं।
    सुखद पहलू यह है कि अपनी स्थापना के 63 वें वर्ष तक का सफर तय करते-करते भारतीय गणतंत्र अब लोकशाही के अर्थ की सही व्याख्या करने लगा है। लोकतंत्र की असल ताकत पुनः जनता की पहुंच में आने लगी है। जिसका जरिया बना है “राइट टू रिकॉल”। हालांकि यह प्रयोग अभी लोकतंत्र की नर्सरी कहे जाने वाली पंचायती व्यवस्था में ही लागू हो सका है, वह भी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे चुनिंदा राज्यों में। इसके बावजूद वर्ष 2012 और 2013 के संधिकाल के दौरान उत्तर प्रदेश और राजस्थान में हुए राइट टू रिकॉल के दो सफल प्रयोग इसकी प्रासंगिकता को निरंतर बढ़ावा ही दे रहे हैं।
     यूं तो निर्वाचित प्रतिनिधियों के नकारा साबित होने पर उन्हें वापस बुलाने या उनकी सदस्यता खत्म करने जैसे नये प्रावधान लागू कर भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया को सुधारने की मांग अक्सर कर उठती रही है किन्तु वर्ष 2010 और 2011 में इस बाबत सर्वोच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिकाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। पहली याचिका एक गुमनाम पत्रकार द्वारा दायर की गयी थी, वहीं दूसरी याचिका देश के जाने माने राजनीतिज्ञ और चुनाव सुधार के हिमायती सुब्रहम्यम स्वामी द्वारा दायर की गयी। सर्वोच्च न्यायालय ने इन याचिकाओं का निस्तारण करते हुए निर्वाचन आयोग को इस संदर्भ में नई व्यवस्था लागू करने और उसकी समीक्षा कर, सफल पाये जाने की स्थिति में राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी रूप में लागू करने के निर्देश दिये।
    भारत निर्वाचन आयोग ने विस्तृत रूप रेखा तय करने के बाद वर्ष 2012 में राइट टू रिकॉल को प्रायोगिक तौर पर देश भर में लागू करने का प्रस्ताव सभी राज्यों और केन्द्र सरकार को भेजा। इस प्रावधान में स्थानीय निकायों (पंचायत और नगर निकाय के लिए) के पचास फीसदी से अधिक मतदाताओं द्वारा दस्तखत किया गया मांग पत्र नगर विकास विभाग या जिला निर्वाचन अधिकारी को देना होता है। इसके बाद उक्त मांग पर जनमत संग्रह कराया जाता है। इसमें दो विकल्प दिये जाते हैं,  मतदाता जनप्रतिनिधि को बनाये रखने के पक्ष में है या हटाने के। मतगणना के पश्चात यदि बहुमत जनप्रतिनिधि के पक्ष में आता है तो वह न सिर्फ अपने पद पर बना रहेगा बल्कि अगले दो वर्ष तक उसके खिलाफ दोबारा राइट टू रिकॉल का प्रयोग नहीं किया जा सकेगा। वहीं यदि बहुमत जनप्रतिनिधि के खिलाफ आता है तो उसे तत्काल प्रभाव से पद से न सिर्फ बर्खास्त कर दिया जायेगा बल्कि अगले दो वर्षों तक उक्त पर चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य भी घोषित कर दिया जायेगा।
     लेकिन इस प्रयोग का दुखद पहलू यह है कि इसके लागू करने या न करने का फैसला राज्य सरकारों को ही करना है। हालांकि सबसे पहले बिहार-छत्तीसगढ़ और फिर राजस्थान व उत्तर प्रदेश की सरकारों ने इसे अपने राज्यों में लागू कर दिया है।
    राइट टू रिकॉल के इस्तेमाल के अब तक दो मामले सामने आये हैं, जिनमें पहला राजस्थान से और दूसरा उत्तर प्रदेश के अति-पिछड़े इलाके से।
    राजस्थान के मांगरोल नगर पालिका के निर्दलीय अध्यक्ष अशोक जैन को उनके पद से हटाने के लिए दिसम्बर 2012 में कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों ने पहली बार इस अधिकार का इस्तेमाल किया। जनमत संग्रह के दौरान जैन के पक्ष में 7,248 और विरोध में 3,755 वोट डाले गये। जनता ने अशोक जैन की कार्यप्रणाली में आस्था दिखाते हुए उन्हें फिर से पालिका अध्यक्ष चुन लिया वहीं जन-विरोधी काम के चलते भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के स्थानीय नेताओं को मुंह की खानी पड़ी। अब जैन के खिलाफ दो साल तक अविश्वास प्रस्ताव भी नहीं लाया जा सकेगा।
    राइट टू रिकॉल का दूसरा सफल प्रयोग उत्तर प्रदेश के बेहद पिछड़े जिले बस्ती के फुलवरिया गांव में हुआ। गांव के बासिंदों ने नकारा प्रधान से आजिज आकर उसके खिलाफ इस अधिकार का इस्तेमाल किया। जनमत संग्रह के दौरान 809 मतदाताओं ने प्रधान को हटाने के लिए वोट डाला वहीं प्रधान को बनाये रखने के लिए सिर्फ 239 मत ही डाले गये। बहुमत अकर्मण्य प्रधान के खिलाफ आया और उसे तत्काल पद से न सिर्फ बर्खास्त कर दिया गया बल्कि अब वह अगले दो वर्ष तक प्रधानी का चुनाव भी नहीं लड़ सकेगा।
    जनता को अपनी चौखट की बांदी समझने वाले नकारा और भ्रष्ट राजनेताओं के लिए निश्चित ही यह खतरे की घंटी है। उन्हें वक्त रहते जनता से जुडी जिम्मेदारियों के प्रति सजग होकर उनका निर्वाहन प्रारम्भ कर देना चाहिए नहीं तो आने वाले दिनों में जनता उन्हें बेज्जत कर सत्ता से हटा फेंकने पर अमादा हो जायेगी। निश्चित ही जो चिंगारी गांव और कस्बों में लगी है वह एक दिन आग बनकर विधायक और सांसदों के खिलाफ जनमत संग्रह कराने पर अमादा होगी। तब न धन-बल चलेगा और न खानदान का सिक्का।
    अन्त में भारतीय जनमानस को गणतंत्र दिवस 2013 की अग्रिम शुभकामनाएं.......। 
    वंदे मातरम।  

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