


Vineet is Sr. Print and Broadcast Journalist, Author, Columnist, Strategist, Believer, Dreamer and Performer. who covers topics pertaining to Indian politics, Crime Higher Education, tourism, Archeology and Society. He is Presently Working with Leading Hindi News Paper.
Started Career in Journalism As Trainee Reporter in Print Media and achieved Key Positions in Various Medium of Media Just Like Print, Electronic and Digital. As Journalist Exposed so many Scams like Pension Scheme, Scholarship Scheme and Drugs Mafia Network. During My Career Interviewed With Pm Narendra modi, Former PM Chandarshakhar, IK Gujral, VP Singh, Atal bihari vajpayee and so many National and International Political Leaders.I have also interviewed Dacoit Nirbhay Gujjar and Phoolan Devi.
Coverage for Rajasthan Patrika,Dainik Jagran,India Today,Live India, CNEB News, Outlook Hindi, ANI etc.
Asia Pacific
PhD in Mass Communication and Master Degree in Journalism and Mass Communication And Ex Faculty, Department of Mass Communication and Journalism, Bareilly College bareilly india



ऐसे
में सवाल उठना लाजमी है कि
आखिर यह डरे सहमे लोग आते कहां
से हैं?
इसका
जवाब भी रवीश अपने इसी लेख में
देते हैं...
वह
लिखते हैं कि लोकतंत्र में
या तानाशाही में नागरिक कब
साइलेंट हो जाता है इसके अलग-अलग
कारण हो सकते हैं...अंग्रेजी
में वह साइलेंट वोटर के
आगमन को 'pluralistic
ignorance'
यानि,
बहुलवादी
अज्ञान में तलाशते
नजर आते हैं...
या
यूं कहें कि वह
हिंदुस्तानी आवाम
और लोकसभा चुनाव
2019
के
जनादेश का खुला
मजाक उड़ाते हुए तमाम साम्यवादी
लेखकों की किताबों का उदाहरण
देते हुए आगे लिखते हैं कि
यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारें
अचानक इसलिए भरभरा कर गिरीं
क्योंकि सार्वजनिक रूप से
जनता सरकार का समर्थन करती
थी,
मगर
अकेले में विरोध करती थी...
यानि
वह सभी लोग जो किसी खास विचारधारा
के समर्थकों के सामने उनकी
तारीफ करते
थे या यूं कहें कि हां में हां
मिलाता
रहे...
और
इसके उलट जब
वह अपने लोगों के
बीच में पहुंच कर
उनकी खामियां
गिनाता नजर आए...
उसे
ही बहुलवादी अज्ञानी कहा
जाएगा...
इस
विश्लेषण तक पहुंचने की जल्दबाजी
में वह सामाजिक
मनोविज्ञान के अहम अध्याय
सामाजिक सुरक्षा
और मानवीय संबंधों एवं व्यवहार
को न सिर्फ पढ़ना भूल जाते
हैं,
बल्कि
उन्हें समझ और महसूस तक नहीं
कर पाते...
वह
हिंदुस्तान के परिपेक्ष में
इस शब्द की मनचाही व्याख्या
करते हुए लिखते हैं कि...
जब
लोगों को पब्लिक में बोलने
की आजादी नहीं होती...
भय
होता है ...
तो
वे चुप हो जाते हैं...
और...
जब
कभी ऐसे लोगों को मौका मिलता
है बदलाव का...
तो
वह बड़ी से बड़ी सत्ताओं को
उखाड़ फेंकते हैं...
बावजूद
इसके,
वह
पिछले तमाम साम्यवादी उदाहरणों
को दरकिनार कर भारत जैसे
वृहद लोकतांत्रिक मुल्क
के साइलेंट वोटर को अलग से
समझाने के लिए राजनीतिक दलों
को प्रेरित करते हुए उन्हें
सलाह भी देते हैं कि...उसे
कैसे समझाया जाए,
या
इस व्यवहार को कैसे बदला जाए
इसकी समझ राजनेताओं और राजनीतिक
दलों को पहले विकसित कर लेनी
चाहिए...
यह
नंगा सच है कि,
भारत
के भाग्य का फैसला करने के लिए
हुए इस चुनाव में आम मतदाता
वाकई में डरा हुआ था...
उसे
डर था कि वह गलती से भी कहीं
भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे
सियासी सियारों को न चुन बैठे...
वह
इसलिए भी डरा हुआ था कि उसे
मंडल से लेकर कमंडल तक और गोधरा
से लेकर मुजफ्फर नगर तक की
सांप्रदायिक लपटें दिखाई पड़
रही थीं...
वह
इसलिए भी सहमा हुआ था क्योंकि
इस बार वह महज वोट
डालने की खाना पूर्ति न कर इस
जिम्मेदारी को सलीके से अंजाम
देना चाहता था...
उसे
इस बात का भी डर था कि कहीं उसका
एक और गलत फैसला भावी पीढिय़ों
पर भारी न पड़ जाए...
मानो
इस बार उसे चिढ़ सी हो गई थी
डर की सियासत और उसके ठेकेदारों
से...
23
मई...
ठीक
12
घंटों
की कशमकश...
और
घड़ी में रात के सवा आठ बजे...
नरेंद्र
मोदी एक बार फिर महाविजेता
के तौर पर जनता से मुखातिब
हुए...
और
बोले...
कि
सिर्फ सियासी पंडितों को ही
नहीं समाज शास्त्रियों को भी
अब अपनी पुरानी सोच पर विचार
करना होगा...
जनाब!
यही
वह शब्द हैं जिनमें साइलेंट
वोटर के मोदी मय रुख की असल
वजह छिपी हुई है...
सियासत
कहती है कि दूसरों
को कटघरे में घसीटो लेकिन,
खुद
का कॉलर तो ऊंचा रखो...
वहीं,
समाज
शास्त्र कहता है कि बदनाम
होंगे तो नाम न होगा क्या?
जबकि
मनोविज्ञान के मुताबिक शैतान
का नाम जितना ज्यादा लिया
जाएगा वह उतना ही मजबूत होता
जाएगा...
मोदी
के शब्दों और तीनों वैज्ञानिक
प्रक्रियाओं का अब भावार्थ
समझें...
आप
भी बड़े भाई रवीश कुमार जी की
तरह सिर्फ शब्दों के अनुवाद
में उलझ कर न रह जाएं...
विपक्षी
की आखिरी भूल खुद नरेंद्र
दामोदर दास मोदी ने बताई...
दूसरे
के अवगुण तलाशने की हड़बड़ाहट
और जोश अजमाईश में अपने गुण
मत भूल जाना...
मतलब
साफ है कि...
पूरे
चुनाव प्रचार में कांग्रेस
और कम्युनिस्टों समेत पूरा
विपक्ष देश के सामने राष्ट्र
के विकास और मतदाताओं के भले
का कोई ठोस रोड मैप नहीं रख
सका...
मोदी
खुद मुद्दे भी बताते हैं जिन
पर विरोधी
उन्हें घेर सकते थे...
वह
कहते हैं कि उन्हें
मंहगाई के मुद्दे पर घेरा
जा सकता था...
वह
उठा सकते थे एकता,
अखंडता
और राष्ट्रवाद का परचम...
वह
ला सकते थे सांप्रदायिक और
जातिवाद के टैग का नया प्रिंट
आउट...
अरे
भाई पटेल साब !
आपकी
लिस्ट के मुताबिक ये जो सारे
हारे हैं न,
वह
पहली बार नहीं हारे...
इससे
पहले 15
बार
और हार चुके हैं...
कभी
खानदान से...
कभी
विरासत से...
कभी
क्रांति की छलना से...
कभी
आतंकवाद से तो कभी...
जाति...
धर्म
और साम्प्रदाय से...
खेती,
किसानी,
मजदूरी,
गरीबी
और भुखमरी तो अब हार जीत के
ट्रेंड से ही बाहर हो चुके
हैं...
टोटली
आउट ऑफ फैशन...
ओ
भाई साहब,
जरा
कलेजा मजबूत कर लो...
फिर
सुनो...
जनता
के इस सिंहनाद को और समझो...
दक्षिणपंथियों
की दो सीटों से
लगातार दूसरी बार
पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने
की वजह...तो
वह थी सिर्फ और सिर्फ मोदी...
जिनकी
सियासी चाल में पूरा विपक्ष
इस कदर फंसा कि पुस्तैनी जमीन
तक गंवा बैठा...
साल
2014
के
चुनाव में तो मोदी ने उनसे महज
सियासी हिस्सेदारी ही छिनी
थी,
लेकिन
इस बार के नतीजे से तो उन्होंने
संपूर्ण विपक्ष के सामने
अस्तित्व का संकट भी खड़ा कर
दिया...
जनता
की हार का ट्वीट करने वाले
हार्दिक को नहीं पता था कि वह
जिस स्कूल में अभी पढ़ रहे
हैं,
मोदी
कभी उसके प्रिसिपल
रह चुके थे और आज
कुलपति बन चुके हैं...
इस
डरे सहमे वोटर को मोदी ने जीत
का पहला पैकेज चुनाव से पहले
सर्व किया था...
वही
आरक्षण जिस पर आजादी
के पहले से ही
सियासी रोटियां
सेकी जा रहीं हैं...
मोदी
ने सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी
के बावजूद न सिर्फ पुराने
आरक्षण को बचाए रखा,
बल्कि
दस फीसदी सवर्णों को भी आरक्षण
देकर सालों पहले बोई गई कटुता
की खाई को पाटने के लिए इसी
पुराने प्रोडक्ट की नई पैकेजिंग
कर डर के मार्केट में
फिर से लांच कर
दिया...
नतीजा,
क्या
अगड़ा और क्या पिछड़ा,
क्या
दलित और क्या सवर्ण सभी एक ही
कूपे के सवार हो गए...
बाकी
इलेक्शन पैकेज की परतें भी
वह भाजपा मुख्यालय के बाहर
ही यह कहते हुए खोल देते हैं
कि....
विपक्ष
ने पूरे चुनाव में सिर्फ मोदी
को घेरा...
क्योंकि
वह जानता था सेक्युलरिज्म के
टैग का प्रिंट आउटडेटिड हो
चुका है...
मतलब
साफ है कि पूरा विपक्ष भाजपा
से कथित रूप से डरे हुए अल्पसंख्यकों
के नाम पर भी एकजुट नहीं हो
सका...
नतीजन,
दशकों
पुराना यह वोट बैंक कई हिस्सों
में बंट गया...
और
उसके उलट सेक्युलरिज्म के
टैग से डरा हुआ साइलेंट वोट
अपने डर को खत्म करने के लिए
एक मंच पर उतर आया...
ऊपर
से जातिवादी राजनीति से डरे
हुए वोटर
ने भी उसका हाथ थाम लिया...
आगे,
मोदी
विपक्षी अकर्मण्यता को बेनकाब
करते हुए कहते हैं कि उन्हें
मंहगाई के मुद्दे पर घेरा जा
सकता था...
उन्हें
भ्रष्टाचार,
ईमानदारी,
40 करोड़
मजदूरों के हक,
युवाओं
के आत्मसम्मान और किसानों की
फाकापरस्ती,
बीमारों
के इलाज के मुद्दे पर भी घेरा
जा सकता था,
लेकिन
मोदी नाम की अफीम खाए विपक्ष
को इन सबका होश ही कहां था...
रण
तो था,
लेकिन
रणनीति नदारद थी...
मौका
तो था,
लेकिन
मोदी ने उसे मुमकिन नहीं होने
दिया...
इस
कमजोरी का सबसे सटीक आंकलन
किया राजस्थान पत्रिका के
प्रधान संपादक गुलाब कोठारी
ने...
वह
अपने अग्रलेख में लिखते हैं
कि...
चुनाव
किसी युद्ध की तरह हार जीत के
लिए नहीं होते...
विधायिका
के लिए अच्छे जनप्रतिनिधि
चुनने के लिए होते हैं...
सभी
दल अपनी-अपनी
नीतियों द्वारा अपनी श्रेष्ठता
सिद्ध करने का प्रयास करते
हैं,
तथा
अपने घोषणा पत्रों के जरिए
भविष्य की एक तस्वीर जनता के
समक्ष रखते हैं...लेकिन,
इस
बार चुनाव पूर्व ही देश खंडित
था...
मूल्य
और मर्यादाहीन था...
असहिष्णु
था....
जिनके
विकास के लिए चुनाव हुए उनके
सुख दुख की चर्चा तक नहीं हुई...
और
गिरावट इतनी कि पुराने मामले
खोद निकाले गए।
इन
सभी के बीच एक और बड़ा सवाल कि
चलो जीत गए,
लेकिन
जीत इतनी प्रचंड होगी यह किसी
ने क्यों नहीं सोचा...
तो
जनाब इसका जवाब भी मोदी खुद
ही देते हैं...
वह
अपनी जीत का क्रेडिट न तो भगवान
राम को देते हैं और न ही भोलेनाथ
को...
न
पार्टी के किसी आला
नेता को और ना ही
स्टार प्रचारकों को...
वह
क्रेडिट देते हैं पन्ना
प्रभारियों को...
असंख्य
लोग नहीं जानते कि यह
क्या बला है...
तो
जान लीजिए कि यही वो इंजन है
जिसने मोदी की माल गाड़ी को
राजधानी में तब्दील कर
दिया...
पार्टी
का सबसे निचला पदाधिकारी...
जिसने
बूथ स्तर पर मतदाता सूची के
पन्ने पर दशकों से दर्ज नामों
को मतदान केंद्र तक लाकर न
सिर्फ सबसे अहम
जिम्मेदारी निभाई
बल्कि विपक्षियों
को आइना भी दिखाया कि ...
आखिरी
समय तक जब तुम प्रत्याशी नहीं
तलाश पाए...
तो
भला तुम्हारे पास राष्ट्रीय
से लेकर बूथ स्तर तक पार्टी
का संगठनात्मक ढ़ांचा खड़े
करने की न तो फुर्सत थी
और न हीं तमीज...
और
मोदी ने इन पन्ना प्रमुखों
को नमन कर विपक्ष को नसीहत दी
कि अगले पांच साल तक ईवीएम को
कोसने के बजाय जाओ पार्टी का
संगठनात्मक ढ़ांचा फिर से
खड़ा करके आओ...
जाओ
संसद से लेकर सड़क तक नई लड़ाई
लड़कर आओ...
फिर
जनता सोचेगी कि तुम्हें सत्ता
सौंपे या नहीं....
अब
जो आखिरी सवाल उठ रहा है,
वह
यह है कि जो हुआ सो हुआ,
लेकिन
अब आगे क्या...
तो
प्यारे विपक्ष जान लो...
कि
आगे हिंद महासागर और मोदी
तुम्हें उसमें
डुबो-डुबो
कर मारने
की योजना बना चुका है...
यह
मैं नहीं कह रहा...
खुद
मोदी ही कह रहे हैं...
यकीन
न आए तो प्रचंड जनाधार हासिल
करने के बाद भाजपा मुख्यालय
के बाहर राष्ट्र को संबोधित
करने आए उस शख्स को एक बार फिर
सुन और देख लो...
यह
हिंदुस्तान का नया शासक नहीं
था...
और
ना ही जीत के नशे और दंभ से चूर
कोई फासीवादी
आताताई विजेता...
गुरुवार
रात सवा आठ बजे
जनता के सामने आए नमूदार हुए
नरेंद्र दामोदर दास मोदी...
गुजरात
के पूर्व मुख्यमंत्री या 16
वीं
लोकसभा में चुने गए पूर्व
प्रधानमंत्री भर नहीं थे...
पूरी
तरह से सधे और संभले हुए...
मंझे
राजनेता और भविष्य की समझ रखने
वाले समाज शास्त्री के पैराहन
में खड़े
नए भारत की नई सोच वाले भविष्य
की नई नींव रख रहे
देश के नए मुखिया
थे...
यानि
पूरी तरह से नए अवतार में उतरे
नए नरेंद्र मोदी थे...
यही
वजह थी जो मोदी ने संबोधन शुरू
करने के चंद सेकंड बाद ही अपने
दल भारतीय जनता पार्टी के भाव
को भारत माता की
सच्ची सेवा और संविधान
के असल
समर्थन में अर्पित
कर डाला...
उन्होंने
कट्टरता को परे धकेलने की भी
जबरदस्त
कोशिश करते हुए कहा कि दो से
दोबारा आने के बाद भी उनके लोग
नम्रता,
विवेक,
आदर्श
और संस्कारों को नहीं छोड़ेंगे...
इतना
ही नहीं उन्होंने भविष्य का
खाका उजागर करते हुए कहा कि
आम आदमी की किस्मत संवारने
के लिए न सिर्फ देश की एकता और
अखंडता जरूरी है...
बल्कि,
आवाम
की जिंदगी में सिर्फ दो ही
जातियां शेष रह जानी हैं...
पहली
गरीब और दूसरी देश को गरीबी
को मुक्त कराने के लिए अपना
योगदान देने वालों की...
उन्होंने
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी
यानि अहिंसा,
सत्य
और संघर्ष को अपनी मजबूती
बनाते हुए कहा कि राष्ट्र उनकी
सच्चे भाव के साथ उनकी 150वीं
जयंति मनाएगा और आजादी की 75
वां
जश्न....
उन्होंने
संकल्प मांगा हिंदुस्तानी
आवाम से कि 130
करोड़
लोग यदि संकल्प कर लें कि आने
वाले पांच सालों तक वह उसी
जज्बे
और भावना से
भारत को विकसित राष्ट्र बनाने
के लिए अपना सर्वस्व झौंक
देंगे जंगे आजादी
में दिखाई
पड़ा था...
उन्होंने
शुरुआती मिनटों में ही आर्थिक
और सामाजिक रूप से स्वतंत्र
भारत और समृद्ध भारत का ख्वाब
करोड़ों लोगों की आंखों में
भर दिया...
नरेंद्र
दामोदर दास मोदी ने माना कि
इन सबके बावजूद भी गलती हो
सकती है...
लेकिन,
वह
नहीं चाहते थे कि आवाम
उन्हें नजरंदाज कर फिर
से साइलेंट वोटर बन जाए...
इसीलिए
वह जनता जनार्दन
से अपील करते हैं कि कसौटी की
तराजू पर उन्हें हर रोज कसा
जाए और उनकी हर कमी के लिए
उन्हें न सिर्फ कोसा जाए,
बल्कि
बताया भी जाए,
ताकि
वह उसे वक्त रहते दुरुस्त कर
सकें...
मानता
हूं तमाम लोगों को यकीन नहीं
होगा...
खुद
मोदी को भी नहीं था...
इसीलिए
वह आखिर में यह कहने से भी नहीं
चूके कि जो कहा है उसे जीने की
भरपूर कोशिश करेंगे...
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